रानू चौधरी की कविता – ‘नई शुरुआत’
बेटियों की नन्ही सी मुस्कान पहले देती थी माँ को सुकून अब डूबे हैं वह इस दुविधा में कैसे रखे बेटियों को दरिदों से दूर | बेटियों की नन्ही सी

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया
बेटियों की नन्ही सी मुस्कान पहले देती थी माँ को सुकून अब डूबे हैं वह इस दुविधा में कैसे रखे बेटियों को दरिदों से दूर | बेटियों की नन्ही सी
आचार्य गुरुदास प्रजापति महक जौनपुरी 23, मेहरावां, सोनिकपुर, जौनपुर उ0प्र0 [email protected] डॉ0 अम्बेडकर का जन्म मध्य प्रदेश इंदौर जनपद के महू नामक उपनगर में 14 अप्रैल, 1891 ई0 को हुआ था।
रोती होगी माँ धरती, आँचल अपनी फटती देख आदित्य, इन्दु हैं एक जहाँ, प्राकृतिक दिव्य ज्योति लिए हुए, फिर भी है परस्पर अद्भुत् मेल, लोक प्रकाशित करना है लक्ष्य एक,
भारत की आन है हिंदी,
देश का अभिमान है,हिंदी,
फ़िर क्यूँ एक दिन की मेहमान है हिन्दी.
अंग्रेज़ों की वाकपटुता में,
खो गयी अपनी शान है हिंदी,
आज अनपढ़ो की पहचान है हिन्दी।
प्रेम काव्य प्रतियोगिता प्रिय प्रेम ! तुम महान हो तुम अमर हो , तुम ओजस्वी होतुम सदियों पुराना विश्वास हो तुम दीपक हो , जो कालो सेजलता आ रहा
वर्तमान युग औद्योगिकरण, शहरीकरण, प्रौद्योगिक का युग है। इस युग में बदले सामाजिक मूल्यों के कारण पश्चिमी होड़ में शामिल होने के कारण, समाज में ज्ञान के स्थान पर ‘भौतिकवाद’ का प्रभाव ज्यादा हो गया है इन सब के कारण सामाजिक जटिलताएँ अधिक हो गई है इन सब से मानव जीवन में तेज रफ्तार से थकान और तनाव बढ़ता जा रहा है। वर्तमान समय में मनुष्य को प्राय: तनावजन्य स्थितियों का सामना करना पड़ता है। अपने भविष्य को लेकर हर मनुष्य के मन में कई प्रकार के प्रश्न होते हैं जिनमें आकांक्षा, उत्साह, प्रसन्नता, भय, तनाव हर स्थिति होती है।
सुखद जीवन की अनुभूति से लजाई
दुल्हन बनी बैठी सजी सजाई
हाथों में मेहंदी रचाई
अपने साथ अनेक अरमान लाई
परिणय कर प्रिय संग ससुराल आई
जेबें भरी हैं
नोटों से
मगर
आज भी सिक्के
लेकर
खनकाने का मन
करता हैं।
जिस आँगन उठनी थी डोली
उस आँगन उठ न पाई अर्थी भी।
क्या अपराध था मेरा?
बस लड़की होना !
अर्थी भी न सजी इस आँगन !
कैसे सजाते? कैसे सजाते?
बटोरा होगा मेरा अंग अंग धरती से !
कफ़न में समेटा होगा मेरी आबरू को !
पत्थर तोड़कर भी, नाम मिला ना दाम मिला। बस छोटा सा काम मिला। सर्दी व बारिश गहरी में, गर्मी की दोपहरी में, कभी सड़क बनी, कभी महल बना, तनिक नहीं
“कला बहुत कुछ देती है पर टीडीएस भी काट लेती है।” ये ब्रह्मवाक्य ही जीवन का वास्तविक सूत्र है। और इसी तर्ज पर अंधाधुन फ़िल्म की पूरी कहानी टिकी है
कभी मेरे नयनों में सपने की तरह, अब जीवन नैया के हो पतवार की तरह, माथे पे बिन्दी लगा ली तेरे नाम की, कभी मेरे गाँव आये एक पाहुन की
सुबह-सुबह आज पार्क में एक रिटायर्ड मास्टर जी से मुलाकात हो गई। मास्टर जी सपना चौधरी के जबरिया फैन है। रिटायरमेंट के बाद टाइमपास करने में सपना के डांस वीडियो महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। फोन मेमोरी में भले ही उन्हें किसी का कॉन्टेक्ट नंबर फीड करना न आता हो, पर यू ट्यूब पर सपना का कोई भी डांस का गाना चाहे आधी रात को सर्च करवा लो। राम-राम के बाद हुई बातचीत में मास्टरजी थोड़ा असहज से लगे। मैंने पूछा-क्या हुआ मास्टर जी। मास्टरनी से सबेरे सबेरे लठ बाजग्या कै। बोले-नहीं जी, वो अपने सत्संग, भजन कीर्तन में व्यस्त रहती है। सो बहस का अवसर ही नहीं मिलता। मैने पूछा-तो बात क्या हुई।
गहन तिमिर के शांत कक्ष में सुलगाते ही एक चिंगारी हर लेती सारे अवसादों को रश्मिरथी ये तीव्र उजियारी सहेज सब कुछ अंतर्मन में रही बाँधती जिसे निष्काम बिना बोले
प्रांजल कुमार नाथ शोध छात्र, गौहाटी विश्वविद्यालय, असम भूमिका : भारतीय संस्कृति में असम प्रांत के संत महापुरुष शंकरदेव असमीया सभ्यता और संस्कृति के बाहक है। उनका जन्म ऐसे संकटकालीन
कुछ जमी पर तन के टुकड़े कुछ जमी पर मन के मुखड़े कुछ जमी पर जन के दुखड़ो को बटोर ले हम वह किसी झरना का साहिल उसको हम कर
तन का सिंगार तो हजार बार होता है, पर प्यार तो जीवन में एक बार होता है, नाव की दिशा बदले पतवार की चाल से, हौले हौले बूँद चुनो जिन्दगी
बृजेश प्रसाद ‘बंबई में का बा’ डॉ. सागर द्वारा लिखा यह गीत अत्यंत मार्मिक और सशक्त गीत है; जो आज भारत ही नहीं पूरे विश्व में अपनी प्रसिद्धि और
साथ रहने का वादा किया था हमसे उन्होंने
भुला कर हमें अब उनके साथ रहने वाली हैं…
कभी यूँ खुशनुमा हो जाती,फूलों की सेज बनकर, प्रभा सी चमकती कभी,रवि मडल की तेज बनकर, स्वेद की बूँद बन,ठंड देती है,तपती देह को अपनी, कभी आंसुओं की धारा बन,
मोल-भाव यहां तुम मत करना
बस दो रूपये का है एक दीया |
पिता,पिता होता है पिता का रिश्ता अजीब होता है। संसार में रिश्ता दूजा नहीं होता फिर बाप का रिश्ता अनमोल होता है । वह उस बरगद के पेड़ जैसा होता
कभी यूँ खुशनुमा हो जाती,फूलों की सेज बनकर, प्रभा सी चमकती कभी,रवि मडल की तेज बनकर, स्वेद की बूँद बन,ठंड देती है,तपती देह को अपनी, कभी आंसुओं की धारा बन,
1.तुम कहाँ समझोगे तुम हँस लोगे रो लोगे उसे अपनाकर नवीव जीवन कल्प बो लोगे अर्धांग बन बाटोगे सुॖ:ख-दु:ख नवीन भूमिकाएं नवीन ज़िम्मेदारियां होंगे नित नयी संभावनाओं को
कविता क्रमांक 1 शीर्षक- भारत देश निराला है यूं तो धरती पर देश कई ,पर भारत सबसे न्यारा है| है ,मातृभूमि भारत मेरी मुझको प्राणों से प्यारी है| है ,अलग-अलग
स्त्री जब खुश होती है बर्तन माजते माजते कपड़े धोते-धोतेरोटी बेलते बेलते सब्जी में छोका लगाते लगातेभी गुनगुनाती है कभी अकेले खामोश चारदीवारी में भी गुनगुनाती है सुबह से शाम
अंतरराष्ट्रीय मानव एकजुटता पुरस्कार से नवाजे गए साहित्यकार गोविंद अवस्थी Last Updated on January 4, 2021 by gauriawasthi72 रचनाकार का नाम: Sahity पदनाम: Seva संगठन: सच की दस्तक ईमेल पता:
अंतरराष्ट्रीय मानव एकजुटता पुरस्कार से नवाजे गए साहित्यकार गोविंद अवस्थी उत्तर प्रदेश राज्य के अलीगढ़ शहर के युवा साहित्यकार एवं समाजसेवी गोविंद अवस्थी जी वर्तमान में इंजीनियरिंग के छात्र हैं
छुई मूई के भाँति अप्रत्याशित और खूबसूरत है प्रेम की प्रकृति जिसमें लज्जा है, सज्जा है और औषधीय प्रवृति भी,मगर इतना सुलभ नहीं है किसी का प्रेम पाना,अगर सच में
अंतरराष्ट्रीय देशभक्ति-काव्य लेखन प्रतियोगिता तव चरणार्पित बाईस अनमोल भाषा रत्नों से जड़ी अनोखा हार, अर्पित है हे माँ तव चरणों में उपहार। बीच में चमक रही है राजभाषा हिन्दी। जैसे
अंतरराष्ट्रीय देशभक्ति-काव्य लेखन प्रतियोगिता तेरे मेरुता तो है ही अमित महान अगाध- अनंत भूमंडल की- आभा हो तुम हे भारत माता। तेरी अगम्य अमित चेतना की कैसी
।। ग़ज़ल ।।बचपन से भरा कौन मेरा ख्वाब ले गया ।अम्मा की गोद जन्नत-ए-नवाब ले गया ।। कागज़ की कई कश्तियां पानी का किनारा ।।ये कौन दुश्मनी में बेहिसाब ले
मेरी कविताओं के बस सिरे नहीं मिलते.. शुरुआत मिलती है क्यूँ अंत नहीं मिलते.. रंगीन पतंग सी उड़ के पहुँचती है दूर… पीछे लौट नहीं पाती,है कैसी मजबूर.. मुरझाये फूलों
कोरोना काल अवसर या अभिशाप माना कि करोना काल ने कहर है बरसाया। न जाने कितने लोगों को घर पर बैठाया, कई लोगों को अपनों से बिछड़ाया, उन्हें रुलाया,
नि:स्वार्थ प्रेम तुम्हारे आने से ज़िन्दगी में मेरी, खुशियों ने ली अंगड़ाई है| सनम तुम मानो या न मानो, यही मेरे दिल की सच्चाई है| मैं बस इतना चाहती थी
अतुल्य भारत भारत माँ की हम सन्तान, मिला हमें है यह वरदान | देव भी जन्म लेने को आतुर, ऐसी है भारतभूमि की शान | राष्ट्र प्रहरी हैं इसका मान,
रचना -1 पग में मेरे नूपुर बंध गए ,मन में ठहरे साज बजे,हर धक पर भैरवी बजी,हर धड़कन राग सजे ,संदल सा महका है तन मन,रोम रोम उद्गार बसे, पग
नववर्ष में छत्तीसगढ़ बस्तर के चर्चित अन्तर्राष्ट्रीय खोजी लेखक युवा हस्ताक्षर विश्वनाथ देवांगन उर्फ मुस्कुराता बस्तर की पंक्तियां पढ़िये आज…. *”पधारो तुम-2021″* *”पधारो तुम* उमंग,पुलकित, प्रखर-सौम्य,अल्हड़-पावन,स्वागत,वंदन,अभिनंदन,मुस्कुराइये,,,नव वर्ष है,चहुं ओर हर्ष
मानव के भीतर की पशुता,पशुता के अंदर की सभ्यता,पशु के भीतर की मानवता,मानवता भीतर की महानता,देख लिया है अब सब तुमने,सब कुछ समझ लिया हमने।1। सभ्य बनाने में लगी मजहबें,फिर
कविताएँ –———– प्रेम——— नयनों के झरोखों सेउन्हें निर्निमेष निहारना।चिरंतन साहचर्य कीअसीम उत्कंठा लिए,उनके आसपास मंड़राना।और – अंकुराते मन मेंस्वप्नों के –असंख्य दीपों काजल जाना।क्या प्रेम नहीं है? * *उनके आते ही
नारी तूं सच में बलशाली। नारी हर परिवार की धुरी, सुबह से शाम, सबको घुमाती, सारा प्रबंध करती, फिर आखिर में आराम करती, इसलिए ये परिवार की सीईओ कहलाती, नारी
ग़ज़ल,,, उस घड़ी हमने नहीं की फिक्र,अपनी जान की।। बात आगे आ गई जब देश के सम्मान की।। आईनों में बिम्ब उनके उम्र भर जिंदा रहे। देश की खातिर जिन्होंने
1. मैं नारी……… मैं नारी सदियों से स्व अस्तित्व की खोज में फिरती हूँ मारी-मारी कोई न मुझको माने जन सब ने समझा व्यक्तिगत धन जनक के घर में कन्या
परिवर्तन ही नियति का सनातन नियम है, जल प्रवाहित होना ही नदी का संयम है, निश्चल खडा पर्वत ही दृढता का सूचक है, चलता काल चक्र ही लयता का द्योतक
उच्च भाव यह उस मां के प्रति
जिसके मन में प्रतिदिन होता।
वही पुत्र सच्चा कहलाता
अन्य सभी बस मिथ्या मिथ्या।
बोल रहे बढ़ चढ़ के उन्हीं के हत्यारे,
फिर आ जाओ हमें ये सिखाते हुए,
जिंदा हैं बहू बेटियों को यूं डराते हुए,
घूम रहे इज्जत को तार तार करते हुए,
भूल गए वहीं आज नारा लगाया जो,
जी रहे सरकार का मौज उड़ाते हुए।
एक रात जब मैं घर पहुँचा तो मेरी पत्नी ने मेरे लिए खाना परोसा। मैंने उसका हाथ पकड़ कर कहा कि मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। वह बैठ गई
घनघोर बरसातों के बाद तृप्त धरा ही, मनोहर हरियाली की चादर चढती है, चिलचिलाती धूप से खलिहान में रखी, फसल ही लोगों की थाल परोसती है, युगों से लिखा इतिहास
🌺नव वर्ष २०२१अभिनंदन🌺 नव वर्ष हम करते अभिनंदन तुम्हारा हैं,नव चेतना व आशा में झूमे जग सारा है,प्रगति पथ पर सतत् आगे बढ़ते रहे हम,चेहरों पे मुस्कान हो ये उद्येशय
आजादी की पहली सुबहनवोन्मेष से पुर्ण थीमुक्त हुई थी भारत भुमिजंजीरें तोड़ गुलामी कीनव सपनें लेकर के आयीआजादी की सुबह सुहानीपर उससे पहले लिखीविभाजन की कहानीनवभारत के निर्माण को लेकरआशाओं
(चीन एक बढ़ती और आक्रामक महाशक्ति भारत के लिए बड़ा रणनीतिक खतरा है और पाकिस्तान के साथ चीन के कंटेनर भारत की रणनीति के लिए खतरा है। इसे देखते हुए,
जिस विश्व व ब्रम्हाण्ड के अन्तर्गत हमारा अस्तित्व विद्यमान है ,उसके संरचना, उसमें सतत् परिवर्तनव गति पर यदि अपना ध्यान केन्द्रित करें तो उसमें एक नियम या
पुरुषों से समानता की चाह में, नारी महानता क्यों भूल रही? आधुनिकता की होड़ में, अपनी मर्यादाएँ क्यों तोड़ रही? प्रभु ने जन्मजात पृथक् गुण दिए, फिर कैसे मानूं कि
पेट की गड्ढे को भरने
जलती आग को
बुझाने के लिए
तुमसे कितना प्रार्थना किया
एक मुट्ठी भोजन के लिए
बार -बार गया तुम्हारे पास
पर तुम
बचा हुआ भोजन को
अधखाया और जूठन को
मुझे देने में
तुम्हे नागवार लगा
एक 5-6 वर्ष की लड़की जो सड़क किनारे दो बाँसों पर बँधी एक रस्सी पर हाथ में लकड़ी का डंडा लिए हुए करतब दिखा रही है | कभी साईकिल की रिंग को रस्सी पर चलाती है तो कभी सिर पर मटकी रखकर रस्सी पर चलती है | और भी खतरनाक करतब दिखाती है |
नारी शक्ति के क्या कहने, सारे जग में सब जानेसेना हो या हो पुलिस, दौड़ हो या हो अंतरिक्ष! हर जगह लहरा रही, नारी अपना परचमशिक्षा हो या हो मेडिकल, स्थल
शब्द तो भाव के भूखे है, अभाव है,तो पूरी तरह से रखे हैं, भावना है,तो निश्चित उसमें शक्ति है, शक्ति का मनुहार ही उसकी भक्ति है, सशक्त संबोधन से संज्ञायूं
भले ही मजधार में, जीवन की नौका हो, मैं हूँ और तुम भी हो बस इतना ही बहुत है ।1। नीरव में ठहरी कश्ती, साहिल का पता नहीँ, तुम हो
<span;>जिन्दगी की शाम पर: मुस्कुराना है हाथ में हाथ डालकर<span;>,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,<span;>जब से जीवन की डोरी से,मैंने <span;>तेरे साथ का गठबंधन जोडा है।<span;>चलते इन राहों पे न जाने,कितने<span;>इन सुनामियों ने हमें झिझोडा
सुशील कुमार ‘नवीन ‘ किसी रिपोर्टर ने हरियाणा के रामल से पूछा कि आप लोग बार-बार कहते सुनाई देते हो कि भई, स्वाद आग्या। ये स्वाद क्या बला है और
Last Updated on December 25, 2020 by dranupamasrivastava.jmc रचनाकार का नाम: Dr.Anupama पदनाम: Srivastava संगठन: Jesus and Mary College, Delhi University ईमेल पता: [email protected] पूरा डाक पता: 34 B, Pocket
http://antrashabdshakti.com/2020/12/19/साहित्य-साधक-सम्मान-2020-ओमप्/ Last Updated on December 25, 2020 by opgupta.kdl रचनाकार का नाम: ओमप्रकाश गुप्ता बैलाडिला (अवकाश प्राप्त प्रवक्ता गणित पदनाम: बैलाडिला संगठन: किरंदुल ईमेल पता: [email protected] पूरा डाक पता: डी0एस0/II/596,बारसा
जब देर रात तक,भीगी पलकों से,जागती रहती हूं,तो मेरे अपनों को शिकायत रहती है। कभी मेरी तन्हाई,मुझसे रूठ कर,कोने में रोती रहती है,तो मेरे अपनों को शिकायत रहती है। जब
सुशील कुमार ‘नवीन’ दिल्ली बॉर्डर पर हिमपात सी शीतलहर में लगातार डेरा जमाए बैठे किसानों से बड़ा वर्तमान में कोई राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है। आंदोलन की शुरुआत से अब तक
जब दहलीज पर आऊँ <span;>,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, <span;>जब हम रवि सा दिन भर संतप्त हो,<span;>त्रसित संध्या की दहलीज पर आऊँ,<span;>तो श्रम बिन्दु पर ठंडी बयार सा बन,<span;>प्रिये! तुम मेरे रोम रोम में
“आकाश चाहती है
हर लड़की –
सोचती है सूरज चाँद तारों के बारे में
सपनों में आता है चाँद पर अपना घर -घर
उसके पैर धरती पर जमें हैं ।
तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लगो : मख़दूम मुही-उद-दीन डॉ. वसीम अनवर असिस्टेण्ट प्रोफेसर उर्दू और फ़ारसी विभाग डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश [email protected], 09301316075 ग़ज़ल इशारे किनाए, तशबीह वा
ईमेल पता [email protected] सार शादी के बाद लड़कियाँ, लड़के को पति और उससे ज़्यादा परमेश्वर मानने लगती हैं। हमारे समाज की बनावट-बुनावट ही कुछ ऐसी है कि लड़कों को बचपन
तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लगो : जाँ निसार अख़्तर डॉ. वसीम अनवर असिस्टेण्ट प्रोफेसर उर्दू और फ़ारसी विभाग डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश [email protected], 09301316075 ग़ज़ल उर्दू शायरी की
तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लगो : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ डॉ. वसीम अनवर असिस्टेण्ट प्रोफेसर उर्दू और फ़ारसी विभाग डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश [email protected], 09301316075 फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की
तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लगो : मजरुह सुल्तानपुरी डॉ. वसीम अनवर असिस्टेण्ट प्रोफेसर उर्दू और फ़ारसी विभाग डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश [email protected], 09301316075 तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लगो
सुंदरवन नाम के गाँव में एक लड़का रहता था जिसका नाम रघु था। रघु अक्सर नहाने ने वक़्त नल को खुला छोड़कर भाग जाता था। इसी तरह हाथ धुलने के
सृष्टि में जीवन का संचार किया।मानव मन में दया धर्म का भाव दिया।चारों और मानवता का प्रसार किया।हे ईश्वर, आपका आभार है। जन्म दिया और पाल- पोस कर बड़ा किया।हर
माँ, या पा, दोनों में दर्द छिपा उठे हूक में, दिल के टूक में, अन्जाने तार जुडे, कुछ आँसू में चू पडे, ये कह पाना है मुश्किल , होता किस
काव्य-मंच (मापनी:- 2122 2122 212) काव्य मंचों की अवस्था देख के,लग रहा कविता ही अब तो खो गयी;आज फूहड़ता का ऐसा जोर है,कल्पना कवियों की जैसे सो गयी। काव्य-रचना की जो प्रचलित मान्यता,तोड़ उनको जो रचें वे श्रेष्ठ हैं;नव-विचारों के वे संवाहक बनें,कवि गणों में आज वे ही ज्येष्ठ हैं। वासनाएँ मन की जो अतृप्त हैं,वे बहें तो काव्य में रस-धार है;हो अनावृत काव्य में सौंदर्य तो,आज की भाषा में वो शृंगार है। रूप की प्रतिमा अगर है मंच पर,गौण फिर तो काव्य का सौंदर्य है;फब्तियों की बाढ़ में खो कर रहे,काव्य का ही पाठ ये आश्चर्य है! चुटकलों में आज के श्रोता सभी,काव्य का पावन रसामृत ढूंढते;बिन समझ की वाहवाही करके वे,प्राण फूहड़ काव्य में भी फूंकते। मूक कवि, वाचाल सब लफ्फाज हैं,काव्य के सच्चे उपासक खो रहे;दुर्दशा मंचों की ऐसी देख कर,काव्य-प्रेमी आज सारे रो रहे। बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’तिनसुकिया Last Updated on December 13, 2020 by basudeo रचनाकार का नाम: नमन पदनाम: बासुदेव संगठन: अग्रवाल ईमेल पता: [email protected] पूरा डाक पता:
गीतिका (अभी तो सूरज उगा है) प्रधान मंत्री मोदी जी की कविता की पंक्ति से प्रेरणा पा लिखी गीतिका।(मापनी:- 12222 122) अभी तो सूरज उगा है,सवेरा यह कुछ नया है। प्रखरतर यह
हम तो चाॅद सितारे, उस परिवार के, जिसमें पिता एक आकाश होता है। जिसके रोशनी से दमकते पूरा घर, वह तो पिता का ही प्रकाश होता है।1। आसमां से ऊंची
“जो बुंद से गयी वो” [ लघु कथा ] निले आकाश मे लाल, सुनहरे रंग बिखरे तब ही पायल घर से
अंचल सक्सेना, उप प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय कानपुर केण्ट कानपुर मो.: 8004912415, ईमेल पता : [email protected] शोध सारांश- बाल साहित्य वह साहित्य है जो बच्चों के मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन, जिज्ञासावृत्ति, मानसिक
तेरी गली से शब ओ रोज़ मुस्कुराते हुएमै जा रहा था फ़क़त तित्लीयाँ उड़ाते हुए !! तेरे हुज़ूर जो आया तो ये ज़रूर हुआतु रो पड़ा था मेरा क़द ज़रा
मै क्या कहूं की साथ मेरे क्या नहीं हुआअच्छा भला किया था पर अच्छा नहीं हुआ !! कैसे करेगा मुझसे नदामत का तज़किराजिसको कभी यक़ीन भी पक्का नहीं हुआ !!
सुशील कुमार’नवीन’ खाने को पिज्जा, लच्छा परांठा, तंदूरी नान,तवा नान, चिल्ला, डोसा वो सब हैं। जो मसालेदार खाने वालों को चाहिए। देसी चटखारे के लिए मक्के की रोटी, सरसों का
नज़ीर अकबराबादी की ग़ज़लगोई डॉ वसीम अनवर सहायक प्रोफेसर उर्दू और फ़ारसी विभाग डॉ हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश [email protected], 09301316075 नज़ीर अकबराबादी उर्दू के पहले अवामी शायर
बनेगा कुछ ना कुछ…….तुम देख लेना —————————————– जीवन के परिधि के, अंदर-बाहर, यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ, बिखरे हुए दर्द के टुकड़ों को, शिद्धत से जीने दो मन को, इसे बहलाओ मत, झुठलाओ
मैं और तुम हर बार हम बनने को मिलते है,हमारे अहम से टकरा कर,हम चकनाचूर हो जाता है,और इसके अणु पुरे ब्रह्मांड में बिखर जाते है, एक लम्बे समयांतराल के बाद,
रिमझिम रिमझिम बरसे फुहार मन नाचे मेरा करे पुकार l रिमझिम रिमझिम बरसो पानी भू पर लिख दो फिर नई कहानी रिमझिम रिमझिम कदम बढ़ाए डालों को तुम चलो भिगोएं
हाइकु (ये बालक कैसा) अस्थिपिंजरकफ़न में लिपटाएक ठूँठ सा। पूर्ण उपेक्ष्यमानवी जीवन काकटु घूँट सा। स्लेटी बदनउसपे भाग्य लिखेमैलों की धार। कटोरा लिएएक मूर्त ढो रहीतन का भार। लाल लोचनअपलक
सार छंद “भारत गौरव” जय भारत जय पावनि गंगे, जय गिरिराज हिमालय;सकल विश्व के नभ में गूँजे, तेरी पावन जय जय।तूने अपनी ज्ञान रश्मि से, जग का तिमिर हटाया;अपनी
सुशील कुमार ‘नवीन’ तेज प्रवाह से बहते नदी के पानी से टकराव मूर्खता ही तो होगी। कड़ाहे में खौलते तेल में हाथ डाल ऊष्मता को जांचना समझदारी थोड़े ही न
पोपट भावराव बिरारीसहायक प्राध्यापककर्मवीर शांतारामबापू कोंडाजी वावरे कला,विज्ञान व वाणिज्य महाविद्यालय सिडको, नासिकईमेल – [email protected], मो. – 9850391121 प्रस्तावना विश्व में अनेक भाषाएं बोली जाती हैं। व्यक्ती अपनी बात दूसरों
पोपट भावराव बिरारीसहायक प्राध्यापककर्मवीर शांतारामबापू कोंडाजी वावरे कला,विज्ञान व वाणिज्य महाविद्यालय सिडको, नासिकईमेल – [email protected], मो. – 9850391121 सार अनुवाद का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत महत्त्व बढ़ा है। विश्व में
पोपट भावराव बिरारी सहायक प्राध्यापक कर्मवीर शांतारामबापू कोंडाजी वावरे कला, विज्ञान व वाणिज्य महाविद्यालय सिडको, नासिक ईमेल – [email protected], मो. – 9850391121 सार बाल साहित्य का आधार बाल मनोविज्ञान है।
लखीमपुर-खीरी (उत्तर प्रदेश) के साहित्यकार राष्ट्रकवि पंडित वंशीधर शुक्ल व्यक्तित्व एवं कृतित्व यह कैसी विडंबना है, कि स्वतंत्रता संग्राम के उठ जाग मुसाफिर भोर भई ,तथा -उठो सोने वालों सबेरा
हालात ए किसान यह जो तेरे घर में अन्न आया है। जरा सोचो किसने पसीना बहाया है। चाह मिटायी , चिन्ता पाई , चैन की नींद ना आई, तुझे दिया,
पूरब से पश्चिम तक उत्तर से दक्षिण तक सबको पिरोती एक डोर में इसलिए सूत्रधार बनके चमकेगी हिंदी की बिंदी। अलग-अलग जाति, धर्मों के लोग यहाँ भिन्न-भिन्न प्रांतों के भिन्न
जिन्दगी एक गीत है गीत जिस पर लिखे गए अनेकों गीत हैंजी रहे हैं हम जिसेवह जिन्दगी एक गीत है ।गुनगुनाते अनेकों अधरअपने प्रणय की गीति कोआलाप करते प्रफुल्ल मनआप उपजी
जिस दिन तुम खुद को अकेला पाओ, घबराओ ,डर जाओ और उसका सामना ना कर पाओ। उस दिन एक बार हिम्मत करके अपने माता -पिता के पास जाना हो सकता
वरिष्ठ प्राध्यापिका डा. वजिरा गुणसेन और सहाय प्राध्यापिका सरसि रणसिंह श्री जयवर्धनपुर विश्वविद्यालय, श्री लंका [email protected] आजकल संसार भर में मुख्य रूप से 6500 भाषाएँ बोली जाती हैं। उनमें