1.तुम कहाँ समझोगे
तुम हँस लोगे
रो लोगे
उसे अपनाकर
नवीव जीवन कल्प बो लोगे
अर्धांग बन
बाटोगे सुॖ:ख-दु:ख
नवीन भूमिकाएं
नवीन ज़िम्मेदारियां
होंगे नित
नयी संभावनाओं को उन्मुख
नवीन सुखद क्षणों की
स्मृतियां सहेजोगे
पर बांट न सकोगे
उसका दुःख
जो उसका अपना है
नहीं चुका पाओगे
उसके बलिदानों की कीमत
जो औरत होने पर
वह देती आई है
नहीं झांक पाओगे
वह कोना
जिसमें वह रहती है
अपना मैं लिये
नहीं पढ़ पाओगे
उसकी चमकती आँखों के
पीछे की हर बात
नहीं समझ पाओगे
उसके थरथराते
होठों के
पीछे की व्यथा
न कुछ कह सकने
की तड़प को
तुम कहाँ समझोगे
Last Updated on January 4, 2021 by sarikathakur406
- BPSP BB.Ed. clg daudnagar aurangabad bihar
- सारिका ठाकुर
- सहायक प्रोफेसर,बी.पी.एस.पी.बी.एड. कॉलेज दाउदनगर,औरंगाबाद,बिहार 824113
- [email protected]
- आकांक्षा धर्म कांटा,पटेल नगर,पटना रोड,पोस्ट-भकरुआ मोर,दाउदनगर,औरंगाबाद,बिहार,824113







