न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक विस्तार: विरासत, विकास और भविष्य का विराट विमर्श

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हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक विस्तार: विरासत, विकास और भविष्य का विराट विमर्श

डॉ. शैलेश शुक्ला

 
भोपाल। हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी समकालीन हिंदी पत्रकारिता : परंपरा, परिवर्तन और भविष्य के अंतर्गत विदेश में हिंदी पत्रकारिता : अतीत, वर्तमान और भविष्य विषय पर आयोजित विशेष सत्र ने वैश्विक हिंदी पत्रकारिता की उपलब्धियों, चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर, सार्थक और दूरदर्शी विमर्श प्रस्तुत किया। देश-विदेश से आए विद्वानों, संपादकों, पत्रकारों, शोधकर्ताओं तथा प्रवासी हिंदी साहित्यकारों की सहभागिता से यह सत्र केवल विचारों का आदान-प्रदान भर नहीं रहा, बल्कि हिंदी पत्रकारिता के वैश्विक स्वरूप, उसकी सामाजिक भूमिका और भविष्य की दिशा को लेकर एक नई दृष्टि प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ।

 

 
इस महत्वपूर्ण सत्र की अध्यक्षता डॉ. नवीन चंद्र लोहनी, कुलपति, हल्द्वानी मुक्त विश्वविद्यालय, उत्तराखंड ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि हिंदी अब केवल भारत की भाषा नहीं रही, बल्कि विश्व समुदाय के सांस्कृतिक संवाद की प्रभावशाली भाषा के रूप में निरंतर अपनी पहचान मजबूत कर रही है। उन्होंने विशेष रूप से चीन सहित एशियाई देशों में हिंदी अध्ययन और हिंदी पत्रकारिता की बढ़ती संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर हिंदी मीडिया की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है। उनके अनुसार डिजिटल तकनीक ने सीमाओं को समाप्त कर दिया है और आज हिंदी पत्रकारिता विश्व के विभिन्न देशों में बसे भारतीयों तथा हिंदी प्रेमियों को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ने का सशक्त माध्यम बन चुकी है।
 
सत्र के शुभारंभ में वरिष्ठ लेखक, पत्रकार एवं शोधकर्ता डॉ. शैलेश शुक्ला की नवीन पुस्तक हिंदी भाषा और तकनीक का गरिमामय लोकार्पण किया गया। पुस्तक का विमोचन मंचासीन अतिथियों द्वारा किया गया, जिसमें डॉ. सिद्धार्थ चतुर्वेदी, कुलाधिपति, स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय, डॉ. नवीन चंद्र लोहनी, कुलपति, हल्द्वानी मुक्त विश्वविद्यालय, डॉ. जवाहर कर्नावट, निदेशक, टैगोर अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र, प्रो. आनंद वर्धन, तेजेन्द्र शर्मा, अनिल जोशी सहित देश-विदेश से पधारे अनेक विद्वान एवं साहित्यकार उपस्थित रहे।
 
सत्र का बीज वक्तव्य डॉ. जवाहर कर्नावट, निदेशक, टैगोर अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र ने प्रस्तुत किया। उन्होंने विदेशों में हिंदी पत्रकारिता के विकास का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य रखते हुए बताया कि प्रवासी भारतीयों ने अपनी भाषा, संस्कृति और सामाजिक पहचान को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से विभिन्न देशों में हिंदी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं की समृद्ध परंपरा विकसित की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि विदेशों में प्रकाशित हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ केवल समाचारों का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने भारतीय संस्कृति, साहित्य, सामाजिक मूल्यों और भाषा संरक्षण का महत्वपूर्ण दायित्व भी निभाया है।
 
इस अवसर पर डॉ. जवाहर कर्नावट द्वारा विगत दो दशकों के गहन शोध एवं संग्रह के आधार पर तैयार 27 देशों की लगभग 150 हिंदी पत्रपत्रिकाओं पर केंद्रित एक विशाल और दुर्लभ प्रदर्शनी भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही। प्रदर्शनी में विभिन्न देशों से प्रकाशित ऐतिहासिक एवं समकालीन हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की प्रतियाँ, उनके आवरण, संपादकीय सामग्री तथा विकास यात्रा का दस्तावेजी स्वरूप प्रस्तुत किया गया।
 
इस अनूठी प्रदर्शनी का लोकार्पण डॉ. सिद्धार्थ चतुर्वेदी, कुलाधिपति, स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय, भोपाल ने किया। उन्होंने इसे हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के संरक्षण और भावी शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी पहल बताते हुए कहा कि ऐसी प्रदर्शनियाँ आने वाली पीढ़ियों को हिंदी पत्रकारिता की वैश्विक यात्रा से परिचित कराती हैं।
विचार गोष्ठी में विभिन्न देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे विद्वानों और संपादकों ने अपने-अपने अनुभवों तथा शोधपरक विचारों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि आज हिंदी पत्रकारिता विश्व के अनेक देशों में सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना के प्रसार का प्रभावी माध्यम बन चुकी है। अनिल जोशी, अध्यक्ष, विश्व हिंदी परिवार ने विभिन्न देशों में हिंदी पत्रकारिता की संस्थागत भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रवासी समाज ने सीमित संसाधनों के बावजूद हिंदी भाषा और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित रखने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्वभर में कार्यरत हिंदी पत्रकारों और संपादकों के बीच अधिक समन्वय स्थापित किया जाए ताकि वैश्विक स्तर पर हिंदी पत्रकारिता को नई शक्ति मिल सके।
ब्रिटेन से प्रकाशित प्रतिष्ठित पत्रिका पुरवाई के संपादक तेजेन्द्र शर्मा ने ब्रिटेन की हिंदी पत्रकारिता के विकास क्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रवासी समाज की नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़ना आज सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ हिंदी पत्रकारिता को तकनीक, गुणवत्ता और विषय-वस्तु—तीनों स्तरों पर स्वयं को निरंतर विकसित करना होगा, तभी वह नई पीढ़ी के पाठकों तक प्रभावी ढंग से पहुँच सकेगी।
प्रो. आनंद वर्धन, निदेशक, मालवीय मिशन, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने बुल्गारिया सहित यूरोपीय देशों में हिंदी अध्ययन और हिंदी पत्रकारिता की स्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला।
प्रो. आनंद वर्धन  ने कहा कि विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और भाषा केंद्रों के सहयोग से हिंदी पत्रकारिता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल रही है। उनके अनुसार हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं, बल्कि वैश्विक ज्ञान-विज्ञान और सांस्कृतिक संवाद की भी सशक्त भाषा बनने की दिशा में अग्रसर है।
न्यूजीलैंड से प्रकाशित प्रतिष्ठित पत्रिका भारत दर्शन के संपादक रोहित कुमार हैप्पी ने न्यूजीलैंड में हिंदी पत्रकारिता की उपलब्धियों और चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि डिजिटल माध्यमों ने प्रवासी समाज को अभूतपूर्व अवसर प्रदान किए हैं। उन्होंने कहा कि आज ऑनलाइन पत्रिकाओं और वेब मंचों के माध्यम से विश्व के किसी भी कोने में बैठा पाठक हिंदी सामग्री तक तत्काल पहुँच सकता है।
नीदरलैंड से रामा तक्षक ने अपनी पत्रिका साहित्य का विश्वरंग के अनुभव साझा करते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर हिंदी पत्रकारिता केवल समाचारों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह साहित्य, संस्कृति, कला और सामाजिक संवाद का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। जापान से आए प्रवासी रचनाकार वेदप्रकाश सिंह ने जापान में हिंदी भाषा और पत्रकारिता की स्थिति का विस्तृत परिचय देते हुए बताया कि वहाँ हिंदी सीखने और भारतीय संस्कृति को समझने की उत्सुकता लगातार बढ़ रही है।
कतर से आईं शालिनी वर्मा ने खाड़ी देशों में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए।

 

 
उन्होंने बताया कि कतर सहित खाड़ी क्षेत्र में हिंदी माध्यमों ने प्रवासी भारतीय समुदाय को एक साझा मंच प्रदान किया है, जहाँ सामाजिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक सरोकारों को प्रभावी अभिव्यक्ति मिलती है। उन्होंने कहा कि प्रवासी पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का भावनात्मक सेतु भी है।
यूक्रेन से आए हिंदी रचनाकार यूरी बोत्विंकिन ने विशेष रूप से इस तथ्य पर प्रकाश डाला कि यूक्रेन के अनेक स्थानीय नागरिक भी हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। उन्होंने बताया कि वहाँ के अनेक विद्वान हिंदी सीख रहे हैं, हिंदी में लेखन कर रहे हैं और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनका वक्तव्य इस बात का सशक्त प्रमाण था कि हिंदी की स्वीकार्यता अब केवल भारतीय मूल के लोगों तक सीमित नहीं रही, बल्कि विदेशी समाज भी इसे आत्मसात कर रहा है।
अपने विचार रखते हुए वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार डॉ. शैलेश शुक्ला ने विश्वभर में तेजी से विकसित हो रही ऑनलाइन हिंदी पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में अधिकांश हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ केवल पारंपरिक पाठ आधारित प्रस्तुति तक सीमित हैं, जबकि आज का पाठक बहुआयामी और संवादात्मक सामग्री की अपेक्षा करता है।
 
डॉ. शुक्ला  ने सुझाव दिया कि हिंदी पत्रिकाओं को केवल टेक्स्ट पर निर्भर रहने के बजाय वीडियो, ऑडियो, पॉडकास्ट, इन्फोग्राफिक्स, इंटरैक्टिव रिपोर्टिंग, डेटा पत्रकारिता तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित नवाचारों जैसे आधुनिक अभिव्यक्ति माध्यमों को अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि वैश्विक हिंदी पत्रकारिता को नई पीढ़ी से जोड़ना है, तो उसे तकनीकी रूप से अधिक सशक्त, आकर्षक और बहु-माध्यमीय स्वरूप प्रदान करना होगा। साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विश्वभर में प्रकाशित हिंदी ऑनलाइन पत्रिकाओं के बीच सहयोग, सामग्री आदान-प्रदान और साझा डिजिटल मंचों की आवश्यकता समय की महत्वपूर्ण मांग है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी ने चीन में हिंदी पत्रकारिता की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। 
संजय सिंह राठौर, सचिव, विश्व रंग फाउंडेशन ने संस्था द्वारा विश्वभर में हिंदी पत्रकारिता, साहित्य और सांस्कृतिक संवाद को सुदृढ़ बनाने के लिए किए जा रहे विविध प्रयासों की विस्तृत जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि विश्व रंग फाउंडेशन लगातार ऐसे मंच तैयार कर रहा है, जहाँ विभिन्न देशों में सक्रिय हिंदी पत्रकार, लेखक और शोधकर्ता एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकें तथा वैश्विक स्तर पर हिंदी की नई संभावनाओं को आगे बढ़ा सकें।
कार्यक्रम का प्रभावी संचालन डॉ. विशाखा राजुरकर ने किया, जिन्होंने पूरे सत्र को अत्यंत व्यवस्थित और जीवंत बनाए रखा। अतिथियों का स्वागत डॉ. सितेश सिन्हा, कुलसचिव, स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय, भोपाल ने किया तथा सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय, भोपाल तथा विश्व रंग फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह तीन दिवसीय संगोष्ठी हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्षों की गौरवशाली यात्रा का स्मरण करने के साथ-साथ उसके भविष्य की दिशा तय करने का भी महत्वपूर्ण अवसर सिद्ध हुई। संगोष्ठी में देश-विदेश के प्रतिष्ठित पत्रकारों, संपादकों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय भागीदारी रही।
समापन में यह भावना स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई कि हिंदी पत्रकारिता अब भौगोलिक सीमाओं में बंधी हुई अभिव्यक्ति नहीं रही। वह विश्व के अनेक देशों में भारतीय संस्कृति, भाषा, लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं की सशक्त प्रतिनिधि बन चुकी है। बदलती तकनीक, डिजिटल माध्यमों और वैश्विक संवाद के इस युग में हिंदी पत्रकारिता के सामने चुनौतियाँ अवश्य हैं, किंतु उससे कहीं अधिक व्यापक संभावनाएँ भी हैं। यदि परंपरा और तकनीक का संतुलित समन्वय स्थापित किया जाए, गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए तथा वैश्विक सहयोग की भावना को मजबूत किया जाए, तो आने वाले वर्षों में विदेशों में हिंदी पत्रकारिता नई ऊँचाइयों को प्राप्त करेगी और विश्व समुदाय के बीच हिंदी की प्रतिष्ठा को और अधिक सुदृढ़ बनाएगी।
 

Last Updated on July 15, 2026 by srijanaustralia

  • डॉ. शैलेश शुक्ला
  • प्रधान संपादक
  • सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय पत्रिका
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