2. नारी-परीक्षा
मत लेना कोई परीक्षा अब
मेरे सब्र की
बहुत सह लिया
अब न सहेंगे
हम अपने आप को
सीता न कहेंगे
न ही तुम राम हो
जो तोड़ सको शिव-धनुष
या फिर डाल सको पत्थरों में जान
नहीं बन्धना अब मुझे
किसी लक्ष्मण रेखा मे
यह रेखाएँ पार कर ली थी सीता ने
भले ही गुजरी वो
अग्नि परीक्षा की ज्वाला से
भले ही भटकी वो जन्गल-जन्गल
भले ही मिला सब का तिरस्कार
पर कर दिया उसने नारी को आगाह
कि तोड़ दो सब सीमाएँ
अब नहीं देना कोई परीक्षा
अपनी पावनता की
नहीं सहना कोई अत्याचार
बदल दो अब अपने विचार
नारी नहीं है बेचारी
न ही किस्मत की मारी
वह तो आधार है इस जगत का
वह तो शक्ति है नर की
आधुनिक नारी हूँ मैं
नहीं शर्म की मारी हूँ मैं
बना ली है अब मैने अपनी सीमाएँ
जिसकी रेखा पर
कदम रखने से
हो सकता है तुम्हारा भी अपहरण
या फिर मैं भी दे सकती हूँ
तुम्हें देश-निकाला
कर सकती हूँ तुम्हारा बहिष्कार
या फिर तुम्हें भी देनी पड सकती है
कोई अग्नि परीक्षा
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पहली बार नारी की आजादी की पहल की थी तो जानकी सीता ने लक्षमण-रेखा को लाँघ कर
और कर दिया आज की नारी को आगाह कि नहीं देना कोई परीक्षा |प्रणाम है उस नारी को
जिसने आधुनिक नारी को राह दिखाई
Last Updated on January 2, 2021 by nanhaman
- seema sachdeva
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