नि:स्वार्थ प्रेम
तुम्हारे आने से ज़िन्दगी में मेरी,
खुशियों ने ली अंगड़ाई है|
सनम तुम मानो या न मानो,
यही मेरे दिल की सच्चाई है|
मैं बस इतना चाहती थी देखना,
तेरे प्यार में कितनी गहराई है |
दिल में अपनी तस्वीर देखने को,
तेरे रास्ते में पलकें बिछाई हैं |
आख़िर तुम्हारी किस अदा ने
मेरी आँखों से नींद चुराई है|
तुम्हारे नि:स्वार्थ प्रेम को देख,
यह बात समझ में आई है |
तुम जो हो, जैसे भी हो|
तुझमें ही सारी कायनात समाई है|
तुमसे जुड़ी हर शय मेरी ‘उपासना’,
बाकी सारी दुनिया पराई है |
– डॉ. उपासना पाण्डेय, प्रयागराज
Last Updated on January 3, 2021 by pandeyupasana009
- डॉ.उपआसनआ पाण्डेय
- शिक्षिका
- जागृति लीला साहित्यिक मंच
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- 151 बाघम्बरी हाउसिंग स्कीम, भरद्वाजपुरम्, 211006 प्रयागराज, उत्तर उ







