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प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु – नि:स्वार्थ प्रेम

नि:स्वार्थ प्रेम

तुम्हारे आने से ज़िन्दगी में मेरी, 

खुशियों ने ली अंगड़ाई है|

सनम तुम मानो या न मानो, 

यही मेरे दिल की सच्चाई है|

मैं बस इतना चाहती थी देखना, 

तेरे प्यार में कितनी गहराई है |

दिल में अपनी तस्वीर देखने को, 

तेरे रास्ते में पलकें बिछाई हैं |

आख़िर तुम्हारी किस अदा ने

मेरी आँखों से नींद चुराई है|

तुम्हारे नि:स्वार्थ प्रेम को देख, 

यह बात समझ में आई है |

तुम जो हो, जैसे भी हो|

तुझमें ही सारी कायनात समाई है|

तुमसे जुड़ी हर शय मेरी ‘उपासना’, 

बाकी सारी दुनिया पराई है |

– डॉ. उपासना पाण्डेय, प्रयागराज