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जीवन का मौलिक मूल्य

जीवन का मौलिक मूल्य राष्ट्र

जीवन यात्रा का एक अहम पड़ाव अविरल निर्मल निश्छल निरपेक्ष निर्विकार समाज राष्ट्र हित अनुष्ठान।।

त्याग तपस्या सोच कर्म धर्म दायित्व बोध प्रखर निखर परिणाम।पल प्रति पल वर्तमान पीढ़ी युग की संस्कृति सांस्कार प्रेरक पुरस्कार।।

उद्घोष हर हृदय आल्लादित भाव बोध कर्म क्रांति का संबाद सांचार नित निरंतर नव युग मर्यादा मुल्यों
के नैतिकता पथ का दिग्दर्शक प्रकाश।।

युवा युग चेतना जागरण राष्ट्र निर्माण
सांस्कृतिक पूंजी धन्य धरोहर चल मनोहर मनुहार।।

आभा मंडल से दैदीप्यमान शब्द स्वर समन्वय साहित्य वास्तव वास्तविकता की अतीत वर्तमान का दर्पण भाव।।

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश।।




साहित्य और समय

साहित्य और समय

समय प्रबाह परिस्थिति परिवेश वर्त्तमान की दृष्टि दिशा मार्ग है।।

साहित्य भाव झरना झील नदियां
सिंधु समागम नित्य निरंतता अक्षुण अक्षय उजियार है।।

शब्द ओजस्वी ओज जन जन
मन का आनंद अनुराग राष्ट्र चेतना
क्रांति है।।

संगठित वैचारिक मंथन का अमृतपान
भाँवो की अभिव्यक्ति जन जन का
आवाहन नित्य निरंतर संस्कृति सांस्कार है।।

वर्तमान जन मन की अभिव्यक्ति नित्य निरंतर जीवन मे कल्पना का याथार्त संसार है।।

युग सृष्टि दृष्टि सत्यार्थ महायज्ञ पल
पल जीवन अनंत ईश्वर सत्य प्रदत्त
का आचरण व्यवहार प्रतिविम्ब उजियार है।।

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश।।




हिन्दू नव वर्ष

हिन्दू नव वर्ष मनाए–

चलो हिन्दू नव वर्ष मनाए
आशाओं, विश्वास का
उत्साह उमंग चाह प्रसंग के
नए सुबह का अलख जगाए
चलो हिन्दू नव वर्ष मनाए।।

उत्कर्ष,हर्ष दुःख दर्द के बीते पल
कि यादों के संग कदम बढ़ाए
चलों उत्कृष्ट नव वर्ष बनाए
चलो हिन्दू नव वर्ष मनाए ।।

त्यागो घृणा द्वेष को प्रेम
शांति निर्मल, निर्झर ,अविरल
धारा बहाए अखिल ब्रह्मांड में
प्रकृति ,प्राणि ब्रह्म सत्य का
संदेश जगाए।
चलो हिन्दू नव वर्ष मनाए।।

साहस शक्ति के युवा युग
मानवता मूल्यों के पथ प्रकाश में
नव युग का दीप जलाए भय भ्रम
अंधकार मिटाए।
चलों हिन्दू नव वर्ष मनाए।।

धर्म ,सद्कर्म ,से अभिनंदन
नव वर्ष का मानव मुख
मण्डल पर मुस्कान जगाए
मानव मुल्यों की गमग गीत
गाये।
चलो हिन्दू नववर्ष मनाए।।

सांसों में आश धड़कनों में
उठती तरंग है भाग्य भगवान
राम आगमन का जागृति जागरण
मधुर बयार बहाए।
चलों हिन्दू नव वर्ष मनाएं।।

साध्य साधना के पग पग
माँ की आराधना के पल पहर शक्ति की भक्ति भाव नवदुर्गा दुर्लभ भान भाष्कर नव वर्ष उगाए।
चलों हिन्दू नव वर्ष मनाएं।।

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश।।




है माँ

आदि शक्ति अम्बे जगदम्बे

आराधना खंड

हे देवी माँ

तू भय भव भंजक
जगत कल्याणी
दुष्टो की दुर्गा काली
भक्तो की रखवाली
शक्ति दे मुझे अपनी
भक्ति का भाव भाग्य दे !!

माँ शारदेय
मैं आया तेरे द्वार
तुझे पुकारते
मैं तेरी संतान
सुन पुकार
मेरी कामना का वर
वरदान दे!!

खोजता भटकता
सारे जहां में
आ गया हूँ
तेरे द्वार
तेरे ज्योति के
उजियार में !!

जिंदगी की दुस्वारिया
बहुत मैं आ गया
जिंदगी चाहतों
की राह में
तेरी ममता
आँचल की छाव में !!

माँ शारदेय
मैं आया तेरे
द्वार तुझे पुकारते
मैं तेरी संतान
सुन पुकार
मेरी कामना का
वर वरदान दे!!

माँ शारदेय
मैं आया
तेरे द्वार
तुझे पुकारते
मैं तेरी संतान
सुन पुकार
मेरी कामना का
वर वरदान दे!!

माँ शारदेय
मैं आया
तेरे द्वार
तुझे पुकारते
मैं तेरी संतान
सुन पुकार
मेरी कामना का
वर वरदान दे!!

हो गया हो
गर कही
अपराध
तेरी सेवा पूजा
सत्कार में
तेरा ही वात्सल्य हूँ
कर छमा
दया का आशिर्बाद दे !!

तू तो जग
जननी सद्गुण ही
जानती तू
अपनी संतान में
मेरे दुर्गुणों को
सद्गुणों में निखार दे !!

माँ शारदेय
मैं आया तेरे द्वार
तुझे पुकारते मैं
तेरी संतान सुन पुकार
मेरी कामना का
वर वरदान दे!!

लालसा बहुत
मानवीय स्वभाव मैं
तेरी भक्ति का भाव
शक्ति धन धान्य में ,
मेरी चाहत
सिर्फ तू रहे
आत्म प्रकाश में
आत्म के प्रकाश में !!

माँ शारदेय
मैं आया तेरे द्वार
तुझे पुकारते
मैं तेरी संतान
सुन पुकार
मेरी कामना का
वर वरदान दे!!

साध्य साधना
आराधना मेरी
कर्म धर्म ज्ञान
के बैभव
बैराग्य में ,
माँ मेरी तू अपनी
ध्यान ज्ञान की भक्ति
की शक्ति का
मुझे वर दान दे !!

माँ शारदेय
मैं आया तेरे द्वार
तुझे पुकारते मैं
तेरी संतान सुन
पुकार
मेरी कामना का वर
वरदान दे!!

तू भय भव
भंजक जग कल्याणी
दुष्टो की दुर्गा काली
भक्तो की रखवाली
शक्ति दे अपनी
भक्ति का भाव
भाग्य दे !!

माँ शारदेय
मैं आया तेरे द्वार
तुझे पुकारते
मैं तेरी संतान
सुन पुकार
मेरी कामना का वर
वरदान दे!!

नन्दलाल मणि त्रिपाठी (पीताम्बर )




हे माँ

हे माँ

तू अवनि अवतारी
पर्वत की बाला
दुःख हरने वाली
जग कल्याणी
जय अम्बे जय जगदम्बे !!

तू सीता सावित्री
पार्वती विघ्नेश्वरी
भुनेश्वरी बाघम्बरी
चंडी चंडिका
मनसा महिमा
मनोकामना!!

तू अवनि अवतारी
पर्वत की बाला
दुःख हरने वाली
जग कल्याणी
जय अम्बे जय जगदम्बे !!

तू लक्ष्मी गौरी
शिवा वैष्णवी
रुक्मणि राधा
राधा ब्राह्मी
भाग्य विधाता !!

तू अवनि अवतारी
पर्वत की बाला
दुःख हरने वाली
जग कल्याणी
जय अम्बे जय जगदम्बे !!

तू माँ शारदा
स्वप्नेश्वरी वगलामुखी
कर्णिका काली
तू छाया माया
निद्रा क्वचिदपि
न भवति कुमाता !!

तू अवनि अवतारी
पर्वत की बाला
दुःख हरने वाली
जग कल्याणी
जय अम्बे जय जगदम्बे !!

तू रिद्धि सिद्धि
हरसिद्धि सत्य
सप्त श्रृंगी माता
तू कामाख्या
जग जननी
जग विख्याता !!

तू अवनि अवतारी
पर्वत की बाला
दुःख हरने वाली जग
कल्याणी जय
अम्बे जय जगदम्बे !!

तू सर्वेश्वरी कमलेश्वरी
ब्राह्मणी रुद्राणी
ज्वाला माता
दक्षिणेश्वर काली
महालक्मी
मुम्बा देवी धन धान्य
सुतान्यहम की दाता !!

तू अवनि अवतारी
पर्वत की बाला दुःख
हरने वाली जग
कल्याणी जय
अम्बे जय जगदम्बे !!

तू सुरेश्वरि अशुरेश्वरी
इंद्राणी करुणेश्वरी
माहेश्वरी दिगम्बरी
श्वेताम्बरी
ललितेश्वरी नारायणी
क्रोध छमा की माता !!

तू अवनि अवतारी
पर्वत की बाला दुःख
हरने वाली जग कल्याणी
जय अम्बे जय जगदम्बे !!

तू भ्रामरी भैरवी
शनिश्चरी मीनाक्षी
अनसूया धात्री
धारिणी जग
तारणी माता!!

तू अवनि अवतारी
पर्वत की बाला दुःख
हरने वाली जग
कल्याणी जय
अम्बे जय जगदम्बे !!

तू चिंत्तपूर्णी
छिन्नमस्तिका
सिद्धेश्वरी चामुंडा
चामुंडेश्वरी
रामेश्वरी मातेश्वरी !!

तू अवनि अवतारी
पर्वत की बाला
दुःख हरने वाली
जग कल्याणी
जय अम्बे जय जगदम्बे !!

नन्दलाल मणि त्रिपाठी (पीताम्बर )




अटूट विश्वास

अटूट  विश्वास 

मंजिल को ढूंढ़ने सभी 

घर के तारे निकल पड़े 

आंखों मे जो इक ख्वाब है

उसे पाने निकल चले

गम की अँधेरी रातों में

जलना होगा तुझे 

कांटो भरी राह मे भी 

चलना होगा तुझे 

हिम्मत ना खोना 

राह में बाधायें देखकर 

मंजिल को ढूंढ़ने सभी 

घर के तारे निकल पड़े ।।

स्वरचित कविता

ज्योतिका शाही सक्सेना

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

 

 




वर्तमान समय में नैतिक शिक्षा क्यूँ आवश्यक है ?

  • वर्तमान समय मे नैतिक शिक्षा की अनिवार्यता क्यूँ जरुरी है ?

    हमारा देश अपनी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति के कारण आज पूरे विश्व मे सिरमोैर बना हुआ है, किंतु कुछ बातों के कारण आज हमारी संस्कृति का दिनों दिन पतन होता जा रहा है ।
    इस पतन का कारण नैतिक शिक्षा का ना होना है। आज के युग मे हम अपनी संस्कृति को छोड़ करके पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव की ओर निरंतर कदमो को बढ़ाये चलें जा रहे हैं। हम उन संस्कृतियों को देखकर ही अपना रहे हैं। केवल हमारे देश में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में भ्रष्ट नैतिकता का जाल फैलता जा रहा है। पहले कभी परिवार में दादा – दादी, चाचा -चाची, माता -पिता व बच्चे एकजुट होकर रहते थे किंतु आज संयुक्त परिवार एकल परिवार मे परिवर्तित होते जा रहे हैं।
    “कच्ची मिट्टी के घड़े,सोच समझकर ढाल,
    उत्तम बचपन जो गढ़े,नैतिक होगा काल।
    नैतिक मूल्यों से मिटे,गद्दारी का जाल।”
    पहले परिवारों मे बच्चे अपने माता पिता के चरण स्पर्श कर उनका अशीर्वाद लेते थे उनको ईश्वर की भांति पूजते थे जबकि आज के जमाने के बच्चे उनकी बातें सुनने से भी कतराते हैं आज ये संस्कृति शायद कहीं देखने को मिले। अब तो जिसको देखो वही अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगा है। इन सारे दुष्परिणामों से बचने के लिए केवल एक ही उपाय है “नैतिक शिक्षा” ।
    बच्चे देश का भविष्य होते है, यदि बच्चे अच्छे हुए तो देश का भविष्य अवश्य अच्छा होगा। सभी विद्यालयों और विश्व विद्यालयों में नैतिक शिक्षा का विषय अनिवार्य होना चाहिए क्योकि यह शिक्षा अत्यंत आवश्यक है । हमें खुद अपने बच्चों के लिए खुद एक उदाहरण बनना होगा तभी यह दुनिया सुचारु रूप से चल सकेगी हमें बच्चों को नैतिक शिक्षा रोमांचक रूप से सिखानी होगी।

    ज्योतिका शाही सक्सेना, स्वतन्त्र लेखिका , कवयित्री एवं नवोदित गीतकार
    लखनऊ, उत्तर प्रदेश




थर्ड जेंडर

 

तुम क्या कहोगे मुझे? 

पहचान के लिए एक अदना सा शब्द तो दे ना सके

और दे भी क्या सकते हो तुम 

मैं क्यों मांगू

नाम थोड़े ही मांगा जाता है

या तो रखा या कमाया जाता है 

गर मुझे खुद ही अपने हिस्से की लड़ाई लड़नी पड़े 

तो कोई और क्यों..? 

ओ मतलबी तूं मुझे एहसानमंद न बना  

प्रकृति ने मुझे पूर्ण बनाया है

चाहिए ना तेरा संग और साथ

देख तुझे से भी आगे निकल गई

है नहीं मेरी रंग-नस्ल-धर्म और जात 

 

 

 




सौ सौ अफसाने हैं

नवगीत

सबका अपना तौर-तरीका
सबके अपने पैमाने हैं।

हैं कई सभ्यताएँ
और उनमें संघर्ष है।
कैसे होगा फिर
इंसानियत का उत्कर्ष है।।

अगर हमारा पंथ निराला
उसके सौ-सौ अफसाने हैं।

एकीकृत करने का अब
कोई वक्त नहीं है।
औ देशभक्ति में
बहने वाला रक्त नहीं है।।

अगर यहाँ है फिल्मी दुनिया
तो कैसे फिल्मी गाने हैं।

देश नहीं है मानो
मात्र भूमि का टुकड़ा है।
चंदा जैसे सुंदर-सुंदर
उसका मुखड़ा है।।

सबका अपना-अपना भाग्य
मोहर लगे दाने-दाने हैं।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर मप्र




अफलातून लगा है

22 22 22 22
ग़ज़ल

वह तो अफलातून लगा है।
पशुता गर नाखून लगा है।।

भ्रष्टाचार बढ़ाने वाले,
उनके मुँह में खून लगा है।

जाड़े के दिन पाँव पसारे,
यानि सलाई-ऊन लगा है।

सोच-विचार अगर होता है,
तो मुझको मजमून लगा है।

बात अगर पानी की है तब,
मोती-मानुष-चून लगा है।

झूठा सच्चा एक बराबर,
तब अंधा कानून लगा है।

लू-लपटों का राज हुआ है,
क्योंकि महीना जून लगा है।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर मप्र