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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

नीरू सिंह की कविता – ‘श्राप’

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जिस आँगन उठनी थी डोली
उस आँगन उठ न पाई अर्थी भी।
क्या अपराध था मेरा?
बस लड़की होना !
अर्थी भी न सजी इस आँगन !
कैसे सजाते? कैसे सजाते?
बटोरा होगा मेरा अंग अंग धरती से !
कफ़न में समेटा होगा मेरी आबरू को !
रात के संनाटे में जली कि…
कही कोई सुन ना ले चीख मेरी।
कब तक नोचोगे मेरे जिस्म को,
अब तो जली अस्थियाँ भी न बची।
ये कैसी सजा पाई थी बेटी होने की?
आखरी विदाई पर मिल न पाई जननी से
सुनलो ऐ पुरुष प्रधान समाज !
रहा कर्ज तुम पर इस बेटी का,
करो फर्ज पूरा अपना इंसान होने का,
वरना जाते जाते दे जाऊँगी श्राप !
पुत्रीहीन हो यह समाज !
फिर न जन्मे गा किसी का कुलदीपक
न जिस्म और आबरू का भूखा कोई !
फिर न कोई बहन-बेटी होगी बेआबरू यूँ।

Last Updated on January 4, 2021 by srijanaustralia

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