न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

January 4, 2021

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उच्च माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों में भविष्य को लेकर बढ़ते हुए तनाव का अध्ययन।

वर्तमान युग औद्योगिकरण, शहरीकरण, प्रौद्योगिक का युग है। इस युग में बदले सामाजिक मूल्यों के कारण पश्चिमी होड़ में शामिल होने के कारण, समाज में ज्ञान के स्थान पर ‘भौतिकवाद’ का प्रभाव ज्यादा हो गया है इन सब के कारण सामाजिक जटिलताएँ अधिक हो गई है इन सब से मानव जीवन में तेज रफ्तार से थकान और तनाव बढ़ता जा रहा है। वर्तमान समय में मनुष्य को प्राय: तनावजन्य स्थितियों का सामना करना पड़ता है। अपने भविष्य को लेकर हर मनुष्य के मन में कई प्रकार के प्रश्न होते हैं जिनमें आकांक्षा, उत्साह, प्रसन्नता, भय, तनाव हर स्थिति होती है।

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डॉ. रेखा जैन की कविता – ‘परिणय’

सुखद जीवन की अनुभूति से लजाई
दुल्हन बनी बैठी सजी सजाई
हाथों में मेहंदी रचाई
अपने साथ अनेक अरमान लाई
परिणय कर प्रिय संग ससुराल आई

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श्याम ‘राज’ की कविता – ‘गाँव की गलियों में बसा है मेरा मन’

जेबें भरी हैं
नोटों से
मगर
आज भी सिक्के
लेकर 
खनकाने का मन
करता हैं।

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नीरू सिंह की कविता – ‘श्राप’

जिस आँगन उठनी थी डोली
उस आँगन उठ न पाई अर्थी भी।
क्या अपराध था मेरा?
बस लड़की होना !
अर्थी भी न सजी इस आँगन !
कैसे सजाते? कैसे सजाते?
बटोरा होगा मेरा अंग अंग धरती से !
कफ़न में समेटा होगा मेरी आबरू को !

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एस. डी. तिवारी की कविता – ‘श्रमिक’

पत्थर तोड़कर भी, नाम मिला ना दाम मिला। बस छोटा सा काम मिला। सर्दी व बारिश गहरी में, गर्मी की दोपहरी में, कभी सड़क बनी, कभी महल बना, तनिक नहीं

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“कला बहुत कुछ देती है” – ये ब्रह्मवाक्य ही जीवन का वास्तविक सूत्र है : डॉक्टर संगम वर्मा

“कला बहुत कुछ देती है पर टीडीएस भी काट लेती है।” ये ब्रह्मवाक्य ही जीवन का वास्तविक सूत्र है। और इसी तर्ज पर अंधाधुन फ़िल्म की पूरी कहानी टिकी है

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मेरे द्वार आये,एक पाहुन की तरह

कभी मेरे नयनों में सपने की तरह, अब जीवन नैया के हो पतवार की तरह, माथे पे बिन्दी लगा ली तेरे नाम की, कभी मेरे गाँव आये एक पाहुन की

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सपना के ब्याह ने तोड़े बड़े-बड़ों के ‘सपने’

सुबह-सुबह आज पार्क में एक रिटायर्ड मास्टर जी से मुलाकात हो गई। मास्टर जी सपना चौधरी के जबरिया फैन है। रिटायरमेंट के बाद टाइमपास करने में सपना के डांस वीडियो महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। फोन मेमोरी में भले ही उन्हें किसी का कॉन्टेक्ट नंबर फीड करना न आता हो, पर यू ट्यूब पर सपना का कोई भी डांस का गाना चाहे आधी रात को सर्च करवा लो। राम-राम के बाद हुई बातचीत में मास्टरजी थोड़ा असहज से लगे। मैंने पूछा-क्या हुआ मास्टर जी। मास्टरनी से सबेरे सबेरे लठ बाजग्या कै। बोले-नहीं जी, वो अपने सत्संग, भजन कीर्तन में व्यस्त रहती है। सो बहस का अवसर ही नहीं मिलता। मैने पूछा-तो बात क्या हुई।

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फरहत परविन की कविता – ‘सोंधी सी मुस्‍कान’

गहन तिमिर के शांत कक्ष में सुलगाते ही एक चिंगारी हर लेती सारे अवसादों को रश्मिरथी ये तीव्र उजियारी सहेज सब कुछ अंतर्मन में रही बाँधती जिसे निष्काम बिना बोले

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शंकरदेव के रहस्यानुभूति और दर्शन में मानवता

प्रांजल कुमार नाथ शोध छात्र, गौहाटी विश्वविद्यालय, असम भूमिका : भारतीय संस्कृति में असम प्रांत के संत महापुरुष शंकरदेव असमीया सभ्यता और संस्कृति के बाहक है। उनका जन्म ऐसे संकटकालीन

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