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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

संघर्ष : पुरस्कार…! ( भाग २)

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पुरस्कार…!!!

सुबह सुबह राधेश्याम अखबार बांट कर घर पहुंचा ही था… कि रोहन स्कूल ना जाने की जिद्द लिए बैठा था। और जिद्द इतनी की वो रोने लगा कि वो आज स्कूल नहीं जाएगा।

“अरे क्यूं नहीं जाना बेटा स्कूल..?? आज तो तुम्हारा रिजल्ट आने वाला है ना…??” राधेश्याम ने समझाते हुए रोहन से कहा।

“पापा…हम स्कूल नहीं जाएंगे। कल मैडम ने मुझे क्लास से निकाल दिया। बोला तुम्हारी फीस नहीं जमा है। कल पापा को लेकर आना। आप मेरी फीस क्यूं नहीं जमा करते…???” रोहन रोते रोते बोला।

राधेश्याम खामोश सा खड़ा था। इस प्रश्न का जवाब तो था उसके पास…लेकिन रोहन का बाल रूप अभी उस जवाब को समझ पाने में असमर्थ था।

कैसी बेबसी है उस पिता की…??? एक ओर वो अपने बच्चे को सिखाता है कि झूठ बोलना गंदी बात है…वहीं खुद झूठ बोलने को मजबूर।

“बेटा…मेरी बात हो गई है…प्रिंसिपल मैडम से…!! तुम स्कूल जाओ…कोई कुछ नहीं बोलेगा तुम्हे।” राधेश्याम के इस झूठे दिलासे पर रोहन तुरंत तैयार हो गया स्कूल जाने को।

अपनी कक्षा में प्रथम श्रेणी में पास हुआ था…रोहन। चमचमाती हुई शील्ड मिली थी उसे पुरस्कार में। तालियों की गड़गड़ाहट थी पूरे स्कूल में। लेकिन घर आते ही रोहन के चेहरे पर ज़रा भी खुशी नहीं थी। बल्कि गुस्से से लाल रोहन शाम को अपने पापा के इंतजार में चुपचाप बैठा हुआ था। फीस ना जमा हो पाने के कारण…उसकी मार्कशीट नहीं मिली थी उसको। रोहन के गुस्से को आज फिर झेलना था…राधेश्याम को… हसते हुए…मुस्कुराते हुए।

भगवान की भी गजब लीला है। जब उस पिता की हार्दिक इच्छा है कि कोई उसकी मजबूरी को समझे…तो समझने वाले को बाल रूप दे दिया। अबोध की संज्ञा दी उसको। खाने का…पीने का…पढ़ने का..लिखने का, पिता को छोटी छोटी चीजों के लिए ताना मारने का ज्ञान दे दिया उस छोटे बच्चे को…बस नहीं दिया तो…उसकी मजबूरी समझ पाने का विवेक।

राधेश्याम, रोहन के गुस्से का कोपभाजन हो चुका था।

“नहीं मिला मेरा रिजल्ट। मैडम ने बोला जब फीस जमा होगी तब मिलेगा। ये मिला है।” रोहन ने अपनी शील्ड राधेश्याम के हांथों में रख दी।

“अरे वाह…यही तो असली चीज है। इनाम…!!! ये सबको नहीं मिलती। रिजल्ट तो सबको मिलता है…चाहे वो पास हो या फेल…लेकिन शील्ड सिर्फ उसे…जो फर्स्ट आता है क्लास में।” वाकपटुता में कोई दूसरा सानी नहीं था राधेश्याम का।

और हो भी क्यों ना…? आखिर अपने अभावों को ढक पाने के लिए कोई ना कोई चादर तो चाहिए थी उसे। अब वाकपटुता से अच्छी चादर क्या हो सकती है।

रोहन के बाल मन पर अपने पिता की यह बात छप गई थी। जो काम तालियों की गड़गड़ाहट नहीं कर पाई थी…वो राधेश्याम की बातों ने कर दिया था। रोहन अब खुश था। अब जा कर उसने अपने पापा मम्मी का पैर छू कर आशीर्वाद लिया था।

Last Updated on January 22, 2021 by rtiwari02

  • ऋषि देव तिवारी
  • सहायक प्रबंधक
  • भारतीय स्टेट बैंक
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