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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

चाय भाग ३ : चाय की तासीर…!!

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चाय की तासीर…!!!

चाय के दीवानों का भी क्या कहना है। गर्म से गर्म चाय की तासीर को भी वे ठंडी ही बताते हैं। ठंडी हो चुकी चाय में कोई रस नहीं होता यहां। पांच रुपए भी कोई खर्च नहीं करता…ठंडी चाय पर।  हमारे समाज में प्रायः एक व्यक्ति और एक चाय में एक विरोधाभास पाया जाता  है। चाय गर्म पसंद होती है सबको…लेकिन तासीर उसकी ठंडी है। व्यक्ति ठंडे स्वभाव के अच्छे माने जाते हैं…तो देखो…तासीर सबकी गर्म ही होती जा रही है आजकल।

खैर, आज प्रीती की बारी थी चाय बनाने की। सो,
समय का बिल्कुल पाबंद विद्यार्थी, जैसे अपने गुरुजी के आने से पांच मिनट पूर्व ही अपनी जरूरी किताबों को लेकर यथा स्थान उनके इंतजार में बार बार दरवाज़े पर झांकता रहता है…ठीक उसी तरह प्रीती भी बार बार मानसी के दरवाजे की ओर झांक रही थी।

“दीदी….अरे ओ दीदी…कहां हो…आ जाओ..!! बन गई चाय…” प्रीती ने आवाज़ लगाई।

उदास सी बैठी मानसी, प्रीती की आवाज़ सुनते ही जैसे एक ऊर्जा से पूर्ण हो गई। बैठ गए दोनों…चाय की प्याली लिए हुए।

“प्रीती…तुमने दुबारा शादी क्यूं नहीं की…?” मानसी ने एक मुक्त प्रश्न छेड़ दिया था। “इतनी सुंदर हो तुम…फिर नौकरी भी करती हो…बहुत सी शादियां मिल जाती तुम्हें…दुवाह…!!”

“दुवाह….ये दुवाह क्या होता है दीदी….???” प्रीती ने बड़ी उत्सुकता से पूछा।

“अरे…मतलब ऐसे आदमी जिनकी पत्नियां नहीं होती या ऐसी औरतें जिनके पति नहीं होते…सेकंड मैरिज वाले लोग यार….!!!” मानसी ने जवाब दिया।

प्रीती का चेहरा जैसे एक उदासी से भर गया।
“क्यूं दीदी… मैं इतनी बुरी हूं क्या?? सिर्फ सेकंड मैरिज वाले ही मुझसे शादी कर सकते हैं…नॉर्मल लड़के नहीं…???” प्रीती ने मजाक भरे लहजे में बोला।

“बात तो सही है…! एक विधवा के लिए एक विधुर ही क्यूं…?? या फिर एक विधुर के लिए एक विधवा ही क्यूं??? ऐसे सामाजिक विभाजन का क्या अभिप्राय हो सकता है…?? ऐसे वैवाहिक विधानों की स्थापना क्यूं हुई??? क्यूं लोग आगे आ कर, पूर्ण सामाजिक सम्मान के साथ ऐसी वीर वधुओं का वरण नहीं करते…?? अभी उम्र ही क्या है बेचारी की…?? पच्चीस वर्ष…!! आजकल यही तो एक सामान्य उम्र है शादी की। फिर ऐसी सोच…क्यूं है समाज की….???” मानसी अंतर्युद्ध से घिरी हुई थी।

“अरे दीदी…कहां खो गई…?? इतना ना सोचो आप…!!” प्रीती ने विषय को बदलने की कोशिश की।

“लेकिन दीदी…ये बताओ…ये पुनर्विवाह जरूरी है क्या…?? एक स्त्री का अस्तित्व क्या एक पुरुष के साथ ही सार्थक हो सकता है..?? विवाह एक संस्कार है…मेरा इससे तनिक भी विरोध नहीं…और उस संस्कार का मैंने वरण भी कर लिया। अब दुबारा उसी संस्कार को निभाना क्यूं जरूरी है…??भगवान की इच्छा होती तो…आज मेरे पति मेरे साथ होते। विवाह के तीन माह बाद ही…मुझे यूं अकेला छोड़ क्यूं चले जाते।” प्रीती ने अपने मन के भावों को मानसी के हवाले कर दिया था।

“ऐसा नहीं है बहन…विवाह सिर्फ सामाजिक रीतियों की बात नहीं है। वंश वृद्धि की एक राह है…ये विवाह। मातृ, पितृ, भाई, बहन, सास, ससुर जैसे अनगिनत रिश्तों का आधार है…ये विवाह। जीवन के इक पड़ाव पर जब कोई तुम्हारे साथ नहीं होता…जीवनसाथी ही तो होता है…जो तुमसे बात करता है…तुम्हे ढांढस देता है…तुम्हारे सुख दुख में साझीदार बनता है…!” मानसी कह तो रही थी ये बातें…लेकिन एक हद तक वो खुद पूर्णतया सहमत नहीं थी उन बातों से…।

“उम्र के इस पड़ाव पर कहां है…मेरा जीवनसाथी?? धन की लोलुपता…!!! हां…इसी धनलोलुपता ने ही दूर कर रखा है अमित को…मुझसे…!! कहां है मेरे सुख दुख का साझीदार…?? मैं भी तो प्रीती की ही तरह हूं। बस मेरी मांग में सिंदूर है…और उसके नहीं..!! जीवनसाथी का अभाव तो दोनों को ही है। ऐसे विवाह से तो अविवाहित होना ही ठीक है।” मानसी अपने किए हुए सवालों में ही घिरती जा रही थी।

“लेकिन इसका मतलब क्या…पुनर्विवाह बुरी चीज है…??? बड़े बड़े महापुरुष हुए हैं…जिन्होंने इसी के लिए लड़ाइयां लड़ी…समाज का विरोध झेला…निरुद्देश्य तो नहीं रहा होगा ये सब। सिर्फ संतानोत्पत्ति या वंश वृद्धि ही इतने बड़े जन आंदोलनों का आधार तो नहीं रही होगी।” मानसी को अपने ही विचारों से विरोधाभास हो रहा था।

विचारों के इसी विरोधाभास में, आज फिर मानसी की चाय ठंडी हो गई थी…!!! आज फिर वो चाय अपना सम्मान खो बैठी थी…!!! क्यूं??? क्यूं कि अब वो ठंडी हो चुकी थी।  लेकिन आज उस ठंडी चाय ने मानसी को एक संकल्प लेने पर मजबूर कर दिया था।

“मैं अपने बेटे का विवाह… प्रीती से ही करूंगी। भले ही मुझे भगवान का विरोध भी क्यूं ना झेलना पड़े। विवेक, मेरा बेटा है…मेरा अंश है…। मेरी भावनाओं से उसका विरोध हो ही नहीं सकता। एक साल ही तो छोटा है वो प्रीती से। ऐसा कोई लिखित विधान है क्या…की लड़की छोटी ही होनी चाहिए।”
मानसी बहुत दिनों बाद आज हृदय से प्रसन्न हुई थी। चलते चलते उसने प्रीती को गले से लगा लिया था। भावुक सी हो गई थी वो।

जारी है…..

😊😊🙏🙏

Last Updated on January 22, 2021 by rtiwari02

  • ऋषि देव तिवारी
  • सहायक प्रबंधक
  • भारतीय स्टेट बैंक
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