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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

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रोला छंद “शाम’

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(रोला छंद)

रवि को छिपता देख, शाम ने ली अँगड़ाई।
रक्ताम्बर को धार, गगन में सजधज आई।।
नृत्य करे उन्मुक्त, तपन को देत विदाई।
गा कर स्वागत गीत, करे रजनी अगुवाई।।

सांध्य-जलद हो लाल, नृत्य की ताल मिलाए।
उमड़-घुमड़ कर मेघ, छटा में चाँद खिलाए।।
पक्षी दे संगीत, मधुर गीतों को गा कर।
मोहक भरे उड़ान, पंख पूरे फैला कर।।

मुखरित किये दिगन्त, शाम ने नभ में छा कर।
भर दी नई उमंग, सभी में खुशी जगा कर।।
विहग वृन्द ले साथ, करे सन्ध्या ये नर्तन।
अद्भुत शोभा देख, पुलक से भरता तन मन।।

नारी का प्रतिरूप, शाम ये देती शिक्षा।
सम्बल निज पे राख, कभी मत चाहो भिक्षा।।
सूर्य पुरुष मुँह मोड़, त्याग के देता जब चल।
रजनी देख समक्ष, सांध्य तब भी है निश्चल।।

*** *** ***

रोला छंद “विधान”

रोला चार चरणों का, प्रत्येक चरण में 24 मात्रा का छंद है। चरणान्त गुरु अथवा 2 लघु से होना आवश्यक है। तुक दो दो चरण में होती है।

कुण्डलिया छंद के कारण रोला बहु प्रचलित छंद है। कुण्डलिया में प्रथम दो पंक्ति दोहा की तथा अंतिम चार पंक्ति रोला की होती है। दोहा का चौथा चरण रोला की प्रथम पंक्ति के आरंभ में पुनरुक्त होता है, अतः रोला की प्रथम यति 11 मात्रा पर होना सर्वथा सिद्ध है। साथ ही इस यति का ताल (2 1) से अंत भी होना चाहिये।

परन्तु अति प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं से देखा गया है कि रोला छंद इस बन्धन में बंधा हुआ नहीं है। रोला बहुत व्यापक छंद है। भिखारीदास ने छंदार्णव पिंगल में रोला को ‘अनियम ह्वै है रोला’ तक कह दिया है। रोला छंद 11, 13 की यति में भी बंधा हुआ नहीं है और न ही प्रथम यति का अंत गुरु लघु से होना चाहिये, इस बंधन में। अनेक प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं के आधार पर रोला की मात्रा बाँट 8-6-2-6-2 निश्चित होती है।
8 = अठकल या 2 चौकल।
6 = 3+3 या 4+2 या 2+4
2 = 1 + 1 या 2
यति भी 11, 12, 14, 16 मात्रा पर सुविधानुसार कहीं भी रखी जा सकती है। प्रसाद जी की कामायनी की कुछ पंक्तियाँ देखें।

मैं यह प्रजा बना कर कितना तुष्ट हुआ था,
किंतु कौन कह सकता इन पर रुष्ट हुआ था।
मैं नियमन के लिए बुद्धि-बल से प्रयत्न कर,
इनको कर एकत्र चलाता नियम बना कर।
रूप बदलते रहते वसुधा जलनिधि बनती,
उदधि बना मरुभूमि जलधि में ज्वाला जलती।
विश्व बँधा है एक नियम से यह पुकार-सी,
फैल गयी है इसके मन में दृढ़ प्रचार-सी।

पर कुण्डलिया छंद में 11, 13 की यति रख कर ही रचना करनी चाहिए। इस छंद में रोला के मान्य रूप को ही रखना चाहिये जो रोला की चारों पंक्ति की प्रथम पंक्ति से अनुरूपता के लिए भी अति आवश्यक है।

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’
तिनसुकिया

Last Updated on May 27, 2021 by basudeo

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