रचनात्मकता, संस्कार और रंगमंच का समन्वित अभिव्यक्ति के व्यक्तित्व डॉ ० उमेश कुमार चौरसिया
भारतीय साहित्य और रंगमंच की समृद्ध परंपरा में कुछ ऐसे सृजनधर्मी व्यक्तित्व हैं, जो केवल लेखन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अपने समय, समाज और संस्कृति के सक्रिय संवाहक बन कर खुद की एक अलग पहचान स्थापित की है। उमेश कुमार चौरसिया ऐसा ही एक बहुआयामी और प्रयोगधर्मी नाम है, जिन्होंने न केवल साहित्य के विविध क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है, बल्कि रंगमंच, बाल साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है।
उमेश कुमार चौरसिया का व्यक्तित्व एक साधारण रचनाकार का व्यक्तित्व नहीं, बल्कि एक ऐसे कर्मयोगी का व्यक्तित्व कहा जा सकता है, जो अपनी लेखनी को समाज-निर्माण का माध्यम बनाते हैं। लगभग चार दशकों से अधिक समय तक सक्रिय रहते हुए आपने अपने लेखन और मार्गनिर्देशन के माध्यम से समाज के विभिन्न आयामों को स्पर्श किया है। वे एक साथ नाट्य लेखक व निर्देशक, बाल साहित्यकार, कवि, गीतकार, लघुकथाकार, लघुफिल्म निर्देशक, समीक्षक और संपादक जैसे अनेक रचनात्मक क्षेत्रों में सक्रिय हैं। यह बहुआयामी प्रतिभा उनके व्यक्तित्व की व्यापकता और उनकी दृष्टि की गहराई को प्रमाणित करती है।
उनकी रचनात्मकता का सबसे सशक्त पक्ष यह है कि वह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह मूल्यपरक और संस्कारनिष्ठ दृष्टि को भी अपने साथ लेकर चलती है। विशेष रूप से बाल साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके द्वारा रचित बाल नाटक और कहानियाँ केवल कथानक का विस्तार नहीं करतीं, बल्कि बच्चों के भीतर नैतिक मूल्यों, सामाजिक संवेदनाओं, भीतरी चेतना, मानव मूल्यों और जीवन के व्यावहारिक पक्ष को विकसित करने का कार्य करती हैं। वे बाल मनोविज्ञान को भली प्रकार समझते हैं और उसी के अनुरूप अपनी रचनाओं को आकार देते हैं, यही कारण है कि उनके बाल नाटक देशभर में मंचित होते रहे हैं और दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से भी प्रसारित हुए हैं।
उमेश जी का रंगमंच से जुड़ाव केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक और अनुभवसमृद्ध है। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध कलाकार रहे हैं और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् ‘एनसीईआरटी‘ के मान्य नाट्य विशेषज्ञ के रूप में विद्यार्थियों और शिक्षकों को शिक्षा में रंगमंच के प्रयोग का प्रशिक्षण भी ग्यारह वर्ष से निरन्तर दे रहे हैं। उन्होंने संगीत नाटक अकादमी सहित अनेक संस्थाओं के साथ बच्चों और युवाओं को नाट्य प्रशिक्षण दिया है। रंगमंच के क्षेत्र में चालीस से अधिक वर्षाें का अनुभव उनके द्वारा रचित नाटकों में शिल्पगत कसावट, संवादों की प्रभावशीलता और मंचीय संरचना की सजीवता के रूप में स्पष्ट दिखाई देता है। उनके नाटक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और मानवीय मूल्यों को आकार प्रदान करने के लिए होते हैं। वे मंच को समाज का दर्पण ही नहीं मार्गदर्शक भी मानते हैं और उसी के अनुरूप अपने नाट्य लेखन को आकार देते हैं।
उनकी लेखनी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वे हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में समान अधिकार के साथ लेखन करते हैं। यह द्विभाषिक सृजन उन्हें व्यापक पाठक वर्ग से जोड़ता है और उनकी सांस्कृतिक जड़ों की गहराई को भी प्रकट करता है। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति, परंपरा और आधुनिक जीवन के बीच सहज संतुलन दिखाई देता है। वे विवेकानंद के आदर्शों से विशेषरूप से प्रभावित हैं, और यह प्रभाव उनके अनेक ग्रंथों में स्पष्ट परिलक्षित होता है।
उमेश कुमार चौरसिया की रचनात्मक यात्रा अत्यंत समृद्ध और व्यापक है। उनकी पचास से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन स्वयं में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। इनमें बाल नाटक, बाल उपन्यास, बाल कहानियाँ, नाटक संग्रह, लघुकथाएँ, काव्य संग्रह और संपादित कृतियाँ सम्मिलित हैं। उनकी कृतियाँ केवल संख्या की दृष्टि से नहीं, बल्कि विषयवस्तु और प्रभाव की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनके नाटक समाज की विसंगतियों, मानवीय संघर्षों और नैतिक द्वंद्वों को केवल उजागर ही नहीं करते हैं बल्कि एक सच्चे पथ प्रदर्शक का कार्य भी करते हैं, वहीं बाल साहित्य में वे प्रेरणा, संस्कार और जीवन-दृष्टि का संचार करते हैं।
उनके कार्य को समय≤ पर विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया गया है। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा प्रदान किया गया शंभुदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार, नाटक विधा के लिए मिला देवीलाल सामर पुरस्कार, तथा अन्य अनेक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान उनके रचनात्मक योगदान की स्वीकृति के प्रमाण हैं। राजस्थान साहित्य अकादमी ने उमेशजी पर मोनोग्राफ भी प्रकाशित कर उन्हें देश के प्रमुख नाटककार के रूप में प्रतिष्ठित किया है। उनके कार्यों पर शोध होना, विश्वविद्यालय स्तर पर अध्ययन होना, और उनकी कृतियों का पाठ्यक्रम में सम्मिलित होना, ये सभी उनकी साहित्यिक महत्ता को स्थापित करते हैं।
उमेश जी का व्यक्तित्व केवल एक लेखक या कलाकार का नहीं, बल्कि एक सस्कृतिकर्मी भी हैं। वे सच्चे निर्भीक और खरे व्यक्तित्व के धनी हैं। वे विभिन्न सामाजिक और साहित्यिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और निरंतर साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनका यह सामाजिक दायित्व उनके व्यक्तित्व को और अधिक व्यापक और समृद्ध बनाता है।
यदि उनके संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व को एक वाक्य में अभिव्यक्त करना हो, तो कहा जा सकता है कि वे ऐसे सृजनधर्मी व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी को समाज, संस्कृति और राष्ट्र के उत्थान का माध्यम बना लिया है। उनकी रचनाएँ केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों और मूल्यों की सजीव अभिव्यक्ति कही जा सकती हैं।
अतः यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि उमेश कुमार चौरसिया समकालीन हिंदी और राजस्थानी साहित्य तथा रंगमंच के ऐसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं, जिनका योगदान बहुआयामी, प्रभावशाली और प्रेरणास्पद है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता रहेगा, जो यह सिखाता रहेगा कि सृजन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व भी है।
आशाः- लेखन से कब और कैसे जुड़ाव हुआ?
इसका एक रोचक प्रसंग है। तब मैं कक्षा पांच में सरकारी स्कूल में पढ़ रहा था। उस समय प्रत्येक शनिवार को बालसभा हुआ करती थी और उसमें किसी विद्यार्थी को सभा अध्यक्ष बनाया जाता था। तो ऐसी ही बालसभा में एक बार मुझे बाल अध्यक्ष बनाया गया। सभा के अन्त में मुझे भी कुछ सुनाना/बोलना था। मुझे कुछ और तो नहीं सूझा बस एक फिल्मी गीत की कुछ पंक्तियां सुना दीं, खूब सारी तालियां बजीं तो मन उत्साहित हो गया। बाद में विचार आया कि खुद भी कविता लिखने का प्रयत्न करना चाहिए। मन में गहरे रोपित इस बीज का यथार्थ प्रस्फुटन हुआ लगभग छ वर्ष बाद। कई बार सुधाऱ करते हुए एक कविता लिखी ‘मेरा नौजवान कहां है?‘ और काॅलेज जाते समय मार्ग में पड़ने वाले एक अखबार के कार्यालय में दे दी। आनन्द की अनुभूति तब हुई जब अगले ही रविवार को यह कविता मेरी फोटो के साथ प्रकाशित हो गयी। बस उसकी कटिंग लेकर मैंने परिवार, पड़ौस, स्कूल-काॅलेज के मित्रों को दिखाई, सबने सराहा। बस फिर लेखन की गति और नैपुण्य धीरे-धीरे बढ़ता रहा। 1989 के आस-पास राजस्थानी लोक कथाओं के नाट्यरूपान्तर का प्रयत्न हुआ। ईशकृपा और वरिष्ठजनों के मार्गदर्शन से मेरी पहली कृति एकांकी संग्रह ‘सिराध रो दिन‘ का प्रकाशन 1991 में राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी से हुआ।
आशा:- बाल साहित्य की ओर आपका विशेष झुकाव कैसे विकसित हुआ?
स्कूल-काॅलेज के समय से ही मुझे नाटकों में विशेष रूचि थी। कई नाटक देखे, कहीं प्रयास कर कुछ में अभिनय भी किया। तब यह ध्यान में आया कि अधिकांशतः नाटकों के चयन में ही कठिनाई होती है, कभी अच्छे नाटक नहीं मिलते तो कभी नाटक के अनुरूप अभिनय कलाकार उपलब्ध नहीं होते। इसीलिए अधिकतर स्कूलों में विदेशी लेखकों के एकांकीं/नाटक ही रूपान्तरित कर मंचित हुआ करते थे। आज भी कई बार ऐसा ही होता है। तब मुझे लगता कि यदि भारतीय परिवेश के अनुरूप और कम संख्या के पात्रों वाले बाल नाटक स्वयं ही लिखना चाहिए। मुझ पर बचपन से ही पंचतंत्र और पौराणिक व ऐतिहासिक कथानकों का प्रभाव रहा, सो ऐसे ही कथानक चुनकर लिखना आरंभ कर दिया।
आशा:- आपके नाटकों में नैतिक मूल्यों और साहस का समावेश स्वाभाविक रूप से आता है या यह एक सचेत प्रयास होता है?
हितोपदेश में श्रीमन् नारायण पण्डित लिखते हैं कि ‘यन्नवे भाजने लग्नः संस्कारो नाऽन्याथा भवेत्।‘ अर्थात जैसे नए घट पर बनायी गयी रेखाएं उसके फूटने तक नहीं जाती, वैसे ही बालकों के अन्तःकरण पर स्थापित शुभसंस्कार जीवनपर्यनत उनसे दूर नहीं होते। संभवतः ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। हमारे बुजुर्गाें से बचपन में बारम्बार सुनी पंचतंत्र, हितोपदेश, कथासरित्सर, जातककथाएं, बेताल पचीसी, चन्द्रकांता संतति, रामकथा, महाभारतकथा, मारवाड़ी लोककथाएं और अनेक महापुरूषों के रोचक प्रसंगों का ही प्रभाव मन-मस्तिष्क पर रहा। जब भी लिखने बैठता हूं तो मन में एक यही विचार रहता है कि इस रचना से पाठक को क्या लाभ मिलेगा। निरूद्देश्य कुछ लिखना होता ही नहीं। आचार्य भरतमुनि भी कहते हैं कि ‘लेखन में लोकहित का समावेश होना चाहिए।‘ मेरा मानना है कि लेखन में स्वांत सुखाय के साथ सर्वजन हिताय का भाव भी होना चाहिए। और सच मानिये, यह सब मेरे करने से नहीं होता सब ईश्वरीय प्रेरणा से ही संभव होता है।
आशा:- रंगमंच और साहित्य इन दोनों के बीच आप किस प्रकार संतुलन स्थापित करते हैं? दोनों में से खुद को कहाँ पर अधिक सहज पाते हैं, क्या ठीक से अभिव्यक्त कर पाते हैं?
दोनों एक दूसरे के पूरक भी हैं और सहायक भी। अच्छे नाट्य मंचन के लिए अच्छा नाट्य लेखन आवश्यक है। नाट्यलेखन साहित्यिक विधा है और मंचीय प्रस्तुति कला विधा। जैसा मैंने पहले कहा कि मेरे जीवन में व्यवस्थित लेखन की शुरूआत नाट्य लेखन से ही हुई और रंगमंच के ़क्षेत्र में अभिनय, निर्देशन से भी गहरा जुड़ाव रहा, इसलिए नाटक ही मेरी प्रिय विधा है। इसमें बाल नाटक भी हैं, लघु व नुक्कड नाटक भी और पूर्णांकी नाटक भी।
आशा:- आपके अनुसार आज के समय में बाल रंगमंच की क्या भूमिका है?
वर्तमान समय सांस्कृतिक विभ्रम का बड़ा ही विकट समय है, निर्मूल भौतिकता का प्रभाव अनियंत्रित बढ़ता जा रहा है और नैतिकता का निरन्तर हृास हो रहा है, ऐसे में नयी पीढ़ी को वर्तमान परिस्थितियों से अवगत करवाते हुए मूल्यों को बचाए रखने के सशक्त प्रयत्नों में नाटक विधा महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। आज विश्वभर में नाटक एक सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है, इसलिए बच्चों के लिए नाटक लिखा जाना और उन्हें विविध शिक्षा व सामाजिक संस्थानों में मंचित किया जाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण भी है। जब हम बाल रंगमंच कहते हैं तो यह चितंन भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि बाल नाटकों के विषय क्या हो। इसमें दो तरह के विचार बाल साहित्यकारों में दृष्टिगत होते हैं, एक यह कि बच्चों के लिए नाटक का ध्येय केवल मनोरंजन हो, और दूसरा ये कि बच्चों के लिए नाटक उन्हें सीख देने वाले हों। मुझे दोनों का समन्वित विचार ही वर्तमान परिप्रेेक्ष्य में यथोचित और उपयोगी लगता है, अर्थात बच्चों के लिए नाटक ऐसे हों जो मनोरंजन के साथ-साथ रोचकता व सहजता से कोई न कोई मूल्य भी स्थापित कर सकें। श्रीमन नारायण पण्डित कहते हैं कि ‘मैं बालकों को मनोरंजक, नीतियुक्त कथाएंँ कहकर उपदेश देने का प्रयत्न करता हूँ।‘ यही समय की आवश्यकता है, मनोरंजन-रोचकता के साथ नीति शिक्षण भी बाल नाटकों के माध्यम से हो। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में भी कहा है कि ‘नाट्य रसों, भावों तथा इन सभी रसभाव आदि के कार्य और क्रियाओं के द्वारा उपदेश प्रदान करने वाला होगा।‘ यही बात विशेष तौर पर बाल नाटकों पर भी लागू होती है। वर्तमान की चुनौतियों के प्रति सजग करते हुए अपनी संस्कृति, अपने गौरवपूर्ण इतिहास और अपने परिवेश का भान कराने वाले कथानक बाल नाटक में होने चाहिए।
आशा:- आपने हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में लेखन इन दोनों क्षेत्रों में अनुभव में क्या भिन्नता रही?
राजस्थानी भाषा को अपना सरस रस लावण्य है, माधुर्य है, अपनत्व है। हमारे घर में मुझे बचपन से ही मारवाड़ी का सानिध्य मिला, व्यवहार में होने से ‘आपणी मायड़ भासा‘ में समझना, कहना सहज रहा। सरकारी विद्यालयों में शिक्षण हुआ तो वहां हिंदी का प्रयोग प्रमुखता से होता रहा। इसलिए दोनों भाषाओं में लिख पाने में कठिनाई नहीं आयी। हां यह भी कहने भी संकोच नहीं कि राजस्थानी भाषा को रचनाकर्म की भाषा बनाने, राजस्थानी में रचित कृतियों को पढ़ने-पढ़ाने में हम राजस्थानियों की भी रूचि कुछ खास नहीं है। संभवतः राजस्थानी भाषा की मान्यता में विलम्ब का कारण भी यही है।
आशा:- विवेकानंद के विचारों का आपके जीवन और लेखन पर क्या प्रभाव पड़ा?
मैं जो भी, जैसा भी बन पाया हूं, उसमें स्वामी विवेकानन्द के जीवन और विचारों का ही प्रभाव अधिक रहा है। बचपन से ही विवेकानन्द के विषय में पढ़ने-सुनने में रूचि रही, महाविद्यालय में आने पर अधिक गहनता से ‘मनुष्य निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण‘ के स्वामीजी के ध्येय को समझा। उनकेयुवाओं को प्रदत्त व्याख्यान-आह्वान और विश्व समुदाय के समक्ष भारत गौरव की अद्भुत व्याख्या ने मन-मस्तिष्क को बहुत प्रभावित किया। 1892 में कन्याकुमारी स्थित श्रीपाद शिला पर स्वामी विवेकानन्द द्वारा भारत के उत्थान के लिए किये गए ध्यान के सौ वर्ष होने पर देशभर में निकाली गयी ‘विवेकानन्द भारत परिक्रमा‘ जब 1991 में अजमेर आयी तब उन्हीं के प्रभाव से नाटक ‘नरेन्द्र से विवेकानन्द‘ लिख पाया, उसका मंचन भी हमने किया। तब से विवेकानन्द केन्द्र में विविध दायित्वों का निर्वहन करते हुए स्वामीजी पर विस्तृत अध्ययन का अवसर मिला। विवेकानन्द ही मेरे जीवन आदर्श हैं, इसलिए निश्चित ही मेरे लेखन पर बड़ा प्रभाव विवेकानन्द के विचार-चिंतन का रहा ही है।
आशा:- एक सफल बाल नाटक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता क्या होती है?
मेरी राय में सफल बाल नाटक तो वही हो सकता है जो नाटक बाल मन के निकट हो। इसके लिए हर रचना समय के बाल मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है। हमारे समय के बचपन और वर्तमान समय के बचपन में बड़ा अन्तर है, इसे जानना होगा। बाल नाटक रोचकता लिए हुए होना चाहिए, संवाद छोटे-छोटे और सरल हों (क्लिष्ट भाषा की विद्वता से बचना चाहिए), दृश्यों में लयात्मकता और सहज गति हो, संवाद बालसुलभ और काव्यात्मक रस लिए हों, कथानक परिवेश से जुड़़ा हुआ और जिज्ञासा जगाने वाला हो, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि बाल नाटक विषय आधारित और ध्येयपरक हो, कहीं कुछ व्यवहार, मूल्य, संस्कार सीखने का अवसर भी वहां मिल सके। वर्तमान डिजिटल युग और उपलब्ध तकनीकी सुविधाओं के परिप्रेक्ष्य में बाल नाटक अत्यधिक काल्पनिकता लिए हुए नहीं वरन् तार्किक, वैज्ञानिक तथ्य आधारित होना चाहिए, जो बच्चों में स्वीकार्य हों। ये अनुभव आधारित कुछ बिन्दु हैं, और भी हो सकते हैं।
आशा:- वर्तमान पीढ़ी में साहित्य के प्रति घटती रुचि को आप किस प्रकार देखते हैं?
इसके दो पहलू हैं। एक तो कैरियर के प्रति बच्चों, युवाओं और अभिभावकों की बढ़ती अपेक्षाओं के कारण साहित्य पढ़ने का समय ही नहीं होता, और दूसरा यह कि पुस्तकों की भीड़ में ऐसा साहित्य मिलना कठिन हो गया है जिसमें नयी पीढ़ी की रूचि हो। हालांकि बच्चों और युवाओं के साथ अनेक बार चर्चा में यह तो स्पष्ट हुआ है कि साहित्य के प्रति रूचि का कम होना उतना नहीं है जितनी श्रेष्ठ साहित्य की उपलब्धता कम हुई है। नयी पीढ़ी चाहे पुस्तकें खरीदकर कम पढ़ती हो पर विविध डिजिटल, आॅडियो-वीडियो माध्यम से प्रसारित कृतियों की जानकारी तो उनको रहती ही है।
सौ पृष्ठ पढ़ने पर एक पृष्ठ लिखने के बजाय बिना पढ़े केवल और केवल लिखने के इस दौर में साहित्य की प्रामाणिकता और लोकप्रियता का हृास भी हुआ है। अभिभावक घर में श्रेष्ठ साहित्य की पुस्तकें और पत्रिकाएं नियमित लाएं, स्वयं पढ़ें और बच्चों को प्रेरित करें, इसी तरह युवाओं के लिए उपयोगी श्रेष्ठ कृतियों की जानकारी उन्हें मिले, महाविद्यालयो के पुस्तकालय जीवंत हों, वहां पुस्तकों पर चर्चा की प्रक्रिया फिर से बढ़े, यह करना होगा। लेखक अपने अध्ययन को विस्तार देते हुए वर्तमान युग की सोच व आवश्यकता के अनुरूप श्रेष्ठ कृतियों की रचना करें, साथ ही युवाओं को साहित्य लेखन के लिए प्रेरित करे, यह भी आवश्यक है। पाठ्यपुस्तकें कैरियर में तो सफल बना सकती हैं किन्तु श्रेष्ठ साहित्य ही जीवन को सार्थक बना सकता है।
आशा:- आप द्वारा रचित प्रमुख नाटक कौनसे हैं आपको सबसे अधिक प्रिय कौनसा नाटक है, उनके सृजन की पृष्ठभूमि क्या रही?
किसी भी रचनाकार को तो सभी रचनाएं प्रिय होती हैं। हां कुछ नाटकों का उल्लेख कर सकता हूं जिनका मंचन अधिक हुआ है। राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत हुए दो नाटक संग्रह हैं, एक ‘विद्यालय रंगमंच के देशभक्तिपूर्ण नाटक‘ और दूसरा ‘शौर्य प्रधान नाटक‘, इनमें मत चूके चैहान, वीरांगना पन्नाधाय, दाहरसेन का बलिदान, नन्ही हवा, वीर दुद्धा, कुंभा का बलिदान, बालमन आदि नाटक हैं। एनबीटी से प्रकाशित विवेकानन्द के बाल्यकाल पर केन्द्रित बाल नाटक ‘मेधावी नरेन्द्र‘ चार राज्यों के समग्रशिक्षा में शामिल है। जवाहर कला केन्द्र से प्रकाशित ‘राम कबीरा एक है‘ और ‘सूर्यपुत्र करण‘ तथा नरेन्द्र से विवेकानन्द, इदं राष्ट्राय स्वाहा, लोकमाता अहिल्याबाई, ओ! अहिल्या, एकलव्य, कर्तव्यपथ, ओ! शर्मिष्ठा, आजादी की कहानी, बापू की बालपोथी, टूटता भ्रम, दानवीर भामाशाह, केशव, वीर शिवा और हास्य एकांकी संग्रह ‘अतिथि देवो भव‘, राजस्थानी एकांकी संग्रह ‘सुख सै दुखी‘ व विवेकानन्द केन्द्र प्रकाशन विभाग से प्रकाशित ‘लक्ष्य की ओर‘ इत्यादि। राजस्थानी नाटक ‘म्हूं तो भूलगो‘ के तो देशभर में 150 से अधिक मंचन हुए हैं।
आशा:- नाट्य लेखन और मंचन के दौरान आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों/पात्रों पर नाटक लिखना दुरूह कार्य है। विस्तृत और गहन अध्ययन करना होता है ताकि तथ्यात्मक और प्रामाणिक कथानक बुना जा सके, फिर उसे वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक बनाने के लिए सामयिक परिस्थितियों का आंकलन भी करना होता है। कई बार तो एक वर्ष से अधिक का समय लग गया नाटक पूरा होने में। नाट्य लेखन धैर्यपूर्वक विषय केन्द्रित रहकर काम की एक लम्बी प्रक्रिया है। मंचन की बात करूं तो जब हमने शुरू किया तब नब्बे के दशक में महिला कलाकारों की उपलब्धता बहुत कम रहती थी इसलिए कई बार नाटक के कथानक, संवाद और दृश्यों को सीमित करना पड़ता था। अब ऐसी कठिनाई तो नहीं है पर नाटक के लिए कर्मठ टीम जुटाने में समय लगता है। एक बड़ी चुनौति होती है अर्थव्यवस्था की। नाटक की रिहर्सल और प्रस्तुति बेहद खर्चीला उपक्रम है। जहां सरकारी संस्थानों का सहयोग मिल जाता है वहां तो आसानी रहती है, पर स्वयं के स्तर पर नाटक कर पाना आज भी बहुत ही कठिन है। टिकिट खरीदकर नाटक देखने का तो प्रचलन ही नहीं दिखता, वरन् दर्शकों को मिन्नत करके बुलाना पड़ता है। इसीलिए आज भी नाटक सर्वाधिक प्रभावी विधा होने पर भी लोकप्रिय विधा नहीं बन पायी है।
आशा:- आपने 40 वर्षों की अपनी साहित्यिक और रंगमंचीय यात्रा में, साहित्य और रंगमंच में क्या विशेष बदलाव महसूस किए?
पहले नवलेखन पर परस्पर चर्चा हुआ करती थी, नयी रचना पर वरिष्ठ साहित्यकारों से मार्गदर्शन लेकर सुधार की ललक रहती थी। किन्तु आज अधिकांशतः देखने में आता है कि लेखक स्वकेन्द्रित हो गए हैं, उनकीे न तो श्रेष्ठ साहित्य के नियमित अध्ययन में रूचि है और न ही अपनी रचना पर आलोचना सुनने की साहस। अपने लिखे को श्रेष्ठ मान लेने की प्रवृत्ति से सृजन का स्तर घटा है। जैसा मैंने पहले कहा, साहित्य में पाठकों की रूचि कम होने का एक बड़ा कारण यह भी है। रंगमंच के क्षेत्र में देखें तो आज अधिकांशतः नए कलाकारों में भी तुरंत ही निर्देशक व फिल्म अभिनेता बनने की महत्वाकांक्षा रहती है, इससे नाट्य अनुशासन प्रभावित होता है। साथ ही रील, यूट्यूब, शार्टफिल्मों के इस दौर में कलाकारों की आर्थिक अपेक्षाएं भी बढ़ गयी हैं। सरकारी संस्थानों का सहयोग केवल चंद कलाकारों को ही मिल पाता है, कई योग्य रंगकर्मी श्रेष्ठ प्रतिभा होने पर भी नाट्य प्रस्तुतियां कर पाने में असमर्थ होते हैं।
आशा:- क्या आपको लगता है कि बाल साहित्य को अभी भी पर्याप्त महत्व नहीं मिल सका?
मैं अक्सर कहता हूं कि छोटी गोष्ठियों से लेकर बड़े-बड़े साहित्यिक सम्मेलनों तक में भी बाल साहित्य पर चर्चा बाल साहित्यकारों और वरिष्ठजनों के मध्य ही होती है, उनमें अक्सर बच्चों की सहभागिता का अभाव ही रहता है। लिखा जा रहा बाल साहित्य बच्चे के मन के अनुरूप है अथवा नहीं, और बच्चें के लिए कैसा साहित्य रचा जाए, इस पर सार्थक प्रतिक्रिया बच्चे ही बेहतर दे सकते हैं। इसलिए बाल साहित्य पर चर्चा बच्चों के मध्य होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने से सामयिक परिप्रेक्ष्य में बाल मनोविज्ञान को, बच्चों की अपेक्षाओें को समझे बिना लिखा गया साहित्य बच्चों में पढ़ने की रूचि नहीं जगा पाता। समाचारपत्रों व पत्रिकाओं में भी बाल साहित्य को अत्यल्प स्थान मिलता है। विद्यालयों में बाल पुस्तक मेलों का आयोजन भी होना चाहिए।
आशा:- आपके अनुसार एक अच्छे लेखक के लिए कौन सा गुण सबसे आवश्यक हैं?
मुंशी प्रेमचन्द कहा करते थे कि ‘एक अच्छा व्यक्ति ही अच्छा लेखक हो सकता है।‘ तो स्पष्ट है कि अच्छा लेखक बनने के लिए अच्छा मनुष्य बनना प्रथम आवश्यकता है। व्यक्तित्व और कृतित्व में असमानता होने पर कृति परायी सी लगती है। संभवतः यही वह कारण भी है कि मैं कभी भी किसी प्रकाशक या संस्थान की मांग के अनुरूप नहीं लिख पाया। अन्तर्मन से किसी विषय पर लिखने की प्रेरणा ही उत्तम कृति की रचना का मार्ग प्रशस्त करती है। साथ ही जिस समाज में हम रह रहे हैं, जो राष्ट्र हमारा पोषण कर रहा है, उसके हित के प्रति लेखकीय कत्र्तव्य का भान सदैव रहना चाहिए। रोज लिखने के बजाय, रोज श्रेष्ठ साहित्य पढ़ना-चिंतन करते रहना, और जब लोकमंगल के ध्येय को पुष्ट करने वाला उपयुक्त सार्थक विषय दृष्टिगत हो तभी लिखना, यह प्रक्रिया मुझे उचित लगती है, इसी का पालन भी करता हूं।
आशा:-आपके जीवन में मिला कोई ऐसा सम्मान जो आपके लिए विशेष रूप से मायने रखता हो जिसने आपको यह एहसास दिलाया हो कि आपकी रचना धर्मिता का सही मूल्यांकन हुआ है?
सम्मान को रचनाधर्मिता के मूल्यांकन के तौर पर देखना उचित नहीं है। किसी पुरस्कार या सम्मान का कोई विशेष प्रभाव मुझे कभी अनुभूत नहीं हुआ। हां राजस्थान साहित्य अकादमी ने पहली बार नाटककार के नाते मोनोग्राफ प्रकाशित किया तो लगा कि कहीं तो नाट्य विधा को साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठा मिली।
आशा:- लेखन में कौन सा बिंदु अधिक महत्वपूर्ण है सामाजिक सरोकार अथवा कलात्मकता?
दोनों ही। सरोकार से जुड़े होंगे तो पाठक के मन को छू सकेंगे और कलात्मकता या शिल्पगत वैशिष्ट्य रहेगा तो रोचकता और विधा अनुकूलता बनी रहेगी।
आशा:- आपके लिए ‘सृजन’ का वास्तविक अर्थ क्या है?
महर्षि अरविन्द कहते हैं कि ‘साहित्य सृजन मानव की अतुल शक्तिमयी अभिव्यक्ति की पिपासा है।‘ यह अभिव्यक्ति कैसी हो, इस पर कहा है कि ‘साहित्य में सत्यम् और शिवम् की सुन्दरतम् अभिव्यक्ति होती है।‘ समय के सच को कल्याण और शुभता के शिवत्व के साथ मानवीय संवेदना, कल्पना और अभिव्यंजना की अभिव्यक्ति, इसे ही यथार्थ सृजन कहेंगे। मुंशी प्रेमचन्द ने भी कहा है कि ‘जो कुछ लिख दिया जाए वह सबका सब साहित्य नहीं है। साहित्य उसी रचना को कहेंगे जिसमें कोई सच्चाई प्रकट की गई हो और जिसकी भाषा समृद्ध, परिमार्जित और सुन्दर हो तथा जिसमें मन व मस्तिष्क को प्रभावित करने का गुण हो।‘ किसी भी राष्ट्र का साहित्य उसकी सभ्यता और संस्कृति का संवाहक होता है, आज नवाचार, नवप्रयोग के दौर में इसका ध्यान रखना भी रचनाकारों का दायित्व है।
आशा:- साहित्य में नाटक विधा का स्थान कहानियों और कविताओं की तुलना में कैसा है? क्या इसे समान महत्त्व मिल पाता है?
मेरी राय में नहीं। गोष्ठियों, साहित्य सम्मेलनों, पत्र-पत्रिकाओं, पुरस्कारो इत्यादि सभी जगह कविता-कहानी की तुलना में नाटक विधा को प्राप्त स्थान नगण्य सा ही है। यह भी तब जब आचार्य भरतमुनि नाट्यविधा को सर्वश्रेष्ठ विधा मानते हुए लिखते हैं कि ‘न तज्ज्ञानं न लच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला। नासौ योगो न तत्कर्म यन्नाट्येस्मिन्न दृश्यते।।‘ अर्थात ऐसा कोई ज्ञान नहीं, ऐसा कोई शिल्प नहीं, ऐसी कोई विद्या नहीं, ऐसी कोई कला नहीं, ऐसा कोई योग नहीं, और ऐसा कोई कर्म नहीं, जो इस नाट्य में दिखाई न देता हो।
आशाः-कहानियों और कविताओं की अपेक्षा नाटकों का लेखन अपेक्षाकृत कम क्यों हो रहा है? इसके मुख्य कारण क्या हो सकते हैं?
अभी जो कहा उसी क्रम में यह भी जोड़ लें कि एक तो कम महत्व मिलने के कारण लेखकों की रूचि भी नाट्यविधा की ओर कम ही है। दूसरे नाट्यविधा का शिल्प कठिन है, इसे नाट्यमंचन को दृष्टिगत रखते हुए समझना होता है, साथ ही नाट्यलेखन में अतिरिक्त श्रम, समय और धैर्य की अपेक्षा भी होती है।
आशा:- बाल नाटकों के मंचन में बच्चों की भागीदारी उनके मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है?
बच्चे जब नाटक में भाग लेते हैं तो इसकी तैयारी प्रक्रिया में उनका बौद्धिक व भावनात्मक विकास भी निश्चित ही होता है। नाट्य प्रस्तुति की प्रक्रिया में सबसे पहले होता है एक नाट्यालेख या स्क्रिप्ट। नाटक की जब रीडिंग होती है तब बच्यों को उसके कथानक के माध्यम से इतिहास, काल, प्रसंग और सामाजिक परिवेश की जानकारी होती है। फिर रिहर्सल के दौरान इसका बार-बार दोहरान होता है तो बच्चों को इसे बेहतर समझने का अवसर मिलता है। जो पात्र मिलता है उसके अभ्यास में बच्चा उस पात्र की आदतों, कार्याें, अन्य पात्रों के साथ संबंधों-रिश्तों को जानता है, अन्य पात्रों और समाज के अन्य लोगों के साथ व्यवहार को समझता है। रिहर्सल में सभी कलाकार बालक-बालिकाएं साथ-साथ रोज अभ्यास करते हैं तो सामूहिकता में रहने, परस्पर सहयोग-समन्वय, अनुशासन की समझ विकसित होती है। संवादों के माध्यम से भाषा, उच्चारण, स्थानीय बोलियों-शब्दों और भाव-परिस्थिति के अनुरूप स्वर-विन्यास या वाइस मोड्यूलेशन को भी समझता-सीखता है। फिर नाटक की प्रस्तुति बच्चों की क्षमताओं का आंकलन ही तो है, इससे आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति कौशल, निडरता, सकारात्मकता और गल्तियों से सीखने का गुण विकसित होता है। इसीलिए बाल रंगमंच को बाल व्यक्तित्व के विकास का आधार भी माना गया है।
आशा:- साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर सरकारों का रवैया कैसा रहता है, सहयोगात्मक या उदासीन?
प्रत्येक राज्य/राष्ट्र के सांस्कृतिक विकास में कला और साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान होता है, सांस्कृतिक उन्नति ही राज्य प्रगति का आधार भी है। इसलिए कला और साहित्य को सरकारी प्रश्रय व प्रोत्साहन तो मिलना ही चाहिए, यह कला-साहित्य के संरक्षण और विकास के लिए आवश्यक भी है। किन्तु इनका राजनीतिकरण नहीं हो तो सांस्कृतिक प्रगति और वैचारिक संबलीकरण अधिक प्रभावी रूप से हो सकेगा।
Last Updated on September 21, 2026 by srijanaustralia
- आशा पाण्डेय ओझा
- साहित्यकार
- स्वतंत्र
- [email protected]
- दिल्ली, भारत











