कथेतर गद्य साहित्य की वह विधा है, जिसमें रचनाकार कल्पना की अपेक्षा जीवन के यथार्थ, अनुभव, विचार और सामाजिक सरोकारों को अधिक महत्त्व देता है। संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रा-वृत्तांत, लेख, समीक्षा, विचार-निबंध और सांस्कृतिक टिप्पणियाँ इसके विविध रूप हैं। इसी व्यापक कथेतर परंपरा में हरिहर झा की पुस्तक ‘दृष्टि’ अपने विषय-विस्तार और अनुभव-संपन्नता के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करती है। पुस्तक की विषय-सूची से स्पष्ट होता है कि लेखक ने साहित्य को केवल सौंदर्य-बोध का क्षेत्र न मानकर उसे समाज, संस्कृति, राजनीति, धर्म, भाषा, तकनीक और मनुष्य के दैनिक जीवन से जोड़कर देखा है। यही व्यापकता इस कृति की केंद्रीय विशेषता है। किसी भी पुस्तक की रचना का आधार उसकी विषयवस्तु अथवा लेखक का प्राक्कथन या पूर्वपीठिका में निहित होता है; इसी को पढ़कर पाठक पुस्तक की उत्कृष्टता का पता लगा सकता है । हरिहर झा ने ‘दृष्टि’ की भूमिका में शुरुआत में ही स्पष्ट करते हैं विचारधाराओं से परे रहकर यह पुस्तक लिखी गयी है, इसे किसी भी गुट के समर्थन में कोई बात नहीं लिखी गयी है । कुछ भी सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया गया है । एक अनुशासित लेखक की तरह मैंने निष्कर्ष को सही रूप में रखा है । आगे लिखते हैं कि अवैज्ञानिक लेखन पर उनकी कलम रुक जाती है । उन्होंने परदेस में रहकर भारतीय आत्मा को जीवित रखकर लेखन किया यह बहुत बड़ी बात है । ऑस्ट्रेलिया की बरखा से लेकर वहाँ की शिक्षा और धर्म तथा लोकभाषाओं पर लेखन उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है ।
पुस्तक में ‘सीता का व्यक्तित्व’ शीर्षक से स्त्री-विमर्श से संबंधित आलेख शामिल है। ‘दृष्टि’ में इस विषय का समावेश यह संकेत देता है कि लेखक पौराणिक पात्रों को केवल धार्मिक आख्यानों के स्तर पर नहीं देखते, बल्कि उनके व्यक्तित्व और सामाजिक अर्थों की आधुनिक संदर्भ में पड़ताल करते हैं। रामायण की प्रसिद्धि का कारण बड़े ही सुंदर तरीके से एक लाइन में लिखा है- इसमें सीता और राम दोनों के जीवन से दुख घनीभूत होकर निकला है । सीता भारतीय सांस्कृतिक चेतना में आदर्श नारी की पारंपरिक छवि से जुड़ी रही हैं, किंतु आधुनिक विमर्श में उनके व्यक्तित्व को स्वायत्तता, संघर्ष, निर्णय और अस्मिता के प्रश्नों से जोड़कर देखने की आवश्यकता है। इस दृष्टि से यह आलेख पुस्तक के वैचारिक आयाम को विस्तार देता है।
‘दृष्टि’ का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष प्रवासी जीवन से जुड़े आलेख हैं। ‘ऑज़ी ऑज़ी ओय ओय’, ‘भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समाज में महिलाएँ’, ‘भारतवंशियों पर हमले’, ‘पहचान का संकट’, ‘ऑस्ट्रेलिया की लोक भाषाओं का संसार’, ‘ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा और धर्म के संदर्भ’ तथा ‘अमेरिकन-ऑस्ट्रेलियन संस्कृति के बिम्ब’ जैसे शीर्षक पुस्तक के प्रवासी विमर्श को व्यापक बनाते हैं। इन आलेखों का महत्त्व केवल इस कारण नहीं है कि इनमें ऑस्ट्रेलिया का उल्लेख है। इनका वास्तविक महत्त्व उस दृष्टि में है, जिसके माध्यम से लेखक प्रवास को भौगोलिक परिवर्तन के साथ-साथ सांस्कृतिक और मानसिक अनुभव के रूप में देखते हैं। प्रवासी व्यक्ति एक ओर नई भूमि और नई सामाजिक व्यवस्था से जुड़ता है, दूसरी ओर अपनी भाषा, संस्कृति, स्मृति और पहचान को बचाए रखने की चुनौती से गुजरता है। इस द्वंद्व की अभिव्यक्ति ‘पहचान का संकट’ जैसे शीर्षक में विशेष रूप से दिखाई देती है।
‘भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समाज में महिलाएँ’ प्रवासी विमर्श में लैंगिक प्रश्न को जोड़ता है। प्रवासी समाज का अध्ययन केवल पुरुष अनुभवों तक सीमित नहीं रह सकता। परिवार, रोजगार, शिक्षा, सांस्कृतिक संक्रमण और सामाजिक सुरक्षा के संदर्भ में महिलाओं की स्थिति प्रवासी समाज की वास्तविक संरचना को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार पुस्तक प्रवासी साहित्य को अधिक व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान करती है। ‘भारतवंशियों पर हमले’ जैसा आलेख प्रवासी जीवन के उस कठोर यथार्थ की ओर संकेत करता है, जिसमें सांस्कृतिक विविधता के बावजूद नस्लीय तनाव और असुरक्षा की स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसके साथ ‘ऑस्ट्रेलिया की लोक भाषाओं का संसार’ जैसा विषय भाषा और संस्कृति की बहुलता को सामने लाता है। इस प्रकार प्रवासी खंड में केवल भारतीय समुदाय की समस्याएँ नहीं हैं, बल्कि ऑस्ट्रेलियाई समाज की बहुसांस्कृतिक संरचना को समझने का प्रयास भी है। ‘ऑस्ट्रेलिया में बरखा’, ‘ओज़ी कविताओं में दर्द’, ‘डाउन अंडर का समतावाद’, ‘आस्ट्रेलिया की आवाज़’, ‘असफल कानून’, ‘मूल निवासी – आस्ट्रेलिया के’, ‘गंभीर जुआरी – युधिष्ठिर के अवतार’ और ‘ओज़ी स्टाइल में विनोद’ जैसे शीर्षक इस अनुभव को और विविध बनाते हैं। यहाँ प्रकृति, साहित्य, सामाजिक व्यवस्था, आदिवासी समुदाय, लोक व्यवहार और हास्य-बोध एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। विशेष रूप से ‘मूल निवासी – ऑस्ट्रेलिया के’ विषय ऑस्ट्रेलिया के इतिहास और वहाँ के मूल निवासियों के प्रश्न को भारतीय पाठक के सामने लाता है। इसी प्रकार युधिष्ठिर के संदर्भ को ऑस्ट्रेलियाई सामाजिक व्यवहार से जोड़ना लेखक की तुलनात्मक सांस्कृतिक दृष्टि का परिचायक है। भारतीय मिथकीय संदर्भों के माध्यम से विदेशी समाज को समझने की यह पद्धति पुस्तक को विशिष्ट बनाती है।
पुस्तक में धर्म को रूढ़ धार्मिकता के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसके सामाजिक और नैतिक सरोकारों को समझने का प्रयास दिखाई देता है। ‘धर्म के सरोकार – ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ’, ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’, ‘कबीर का समाज’, ‘तुलसी-साहित्य का लौकिक स्वरूप’ और ‘चार पुरुषार्थ – आधुनिक नजरिया’ जैसे आलेख इस वैचारिक धरातल को मजबूत करते हैं। ‘कबीर का समाज’ में कबीर की प्रासंगिकता को सामाजिक दृष्टि से समझने की संभावना निर्मित होती है। कबीर की वाणी धार्मिक आडंबर, सामाजिक विभाजन और बाह्याचार के विरुद्ध एक मानवीय चेतना प्रस्तुत करती है। इसी क्रम में ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ धर्म के नैतिक पक्ष को सामने लाता है। लेखक की दृष्टि में धर्म का मूल्य केवल कर्मकांड में नहीं, बल्कि जीवन के आचरण और सामाजिक उत्तरदायित्व में निहित है। ‘तुलसी-साहित्य का लौकिक स्वरूप’ शीर्षक विशेष उल्लेखनीय है। तुलसीदास के साहित्य को केवल धार्मिक या भक्तिपरक दृष्टि से देखने की अपेक्षा उसके सामाजिक, मानवीय और लौकिक पक्षों की पड़ताल करना तुलसी-साहित्य की व्यापकता को सामने लाता है। इसी प्रकार ‘चार पुरुषार्थ – आधुनिक नजरिया’ भारतीय दार्शनिक परंपरा को समकालीन जीवन से जोड़ने का प्रयास है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अवधारणाएँ भारतीय चिंतन की आधारभूत संरचना का हिस्सा हैं। आधुनिक संदर्भ में उनकी पुनर्व्याख्या वर्तमान जीवन-मूल्यों को समझने में उपयोगी हो सकती है।
पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष समकालीन सामाजिक जीवन की समस्याओं पर केंद्रित आलेख हैं। ‘समकालीन जीवन मूल्यों की कसौटी’, ‘आचरण और दिखावे का द्वंद्व’, ‘फुर्सत नहीं!’, ‘कानून या न्याय’, ‘आजादी क्यों?’ और ‘भारत या इंडिया’ जैसे शीर्षक आज के समाज की अंतर्विरोधपूर्ण स्थिति को रेखांकित करते हैं। ‘आचरण और दिखावे का द्वंद्व’ आधुनिक सामाजिक जीवन की उस प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाता है, जिसमें व्यक्ति के वास्तविक व्यवहार और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। इसी तरह ‘फुर्सत नहीं!’ केवल समयाभाव की शिकायत नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन-शैली की विडंबना का संकेत बन जाता है। तकनीकी सुविधा और संचार के विस्तार के बावजूद मनुष्य के पास स्वयं से और अपने निकट संबंधों से संवाद के लिए समय कम होता जा रहा है। ‘कानून या न्याय’ शीर्षक कानून और न्याय के बीच के अंतर की ओर ध्यान आकर्षित करता है। कानून व्यवस्था का औपचारिक पक्ष है, जबकि न्याय उसका नैतिक लक्ष्य। दोनों के बीच दूरी पैदा होने पर सामाजिक असंतोष जन्म लेता है। इस प्रकार पुस्तक के आलेख तत्कालीन सामाजिक अनुभवों को व्यापक नैतिक प्रश्नों से जोड़ते हैं। ‘भारत या इंडिया’ शीर्षक सांस्कृतिक अस्मिता, आधुनिकता और बदलती भारतीय मानसिकता के प्रश्न को सामने लाता है। यह बहस केवल नाम की नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक आत्मछवि और आधुनिक जीवन-दृष्टि के बीच चल रहे संवाद की भी है।
‘राजधर्म बनाम महत्वाकांक्षा’ पुस्तक के राजनीतिक चिंतन का प्रतिनिधि आलेख माना जा सकता है। भारतीय परंपरा में राजधर्म का अर्थ सत्ता के उपभोग से अधिक प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व रहा है। आधुनिक लोकतंत्र में भी सत्ता की सफलता का मूल्यांकन जनहित, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के आधार पर किया जाना चाहिए। राजधर्म और निजी महत्वाकांक्षा के बीच उत्पन्न तनाव आज भी प्रासंगिक है। इसी संदर्भ में ‘आजादी क्यों?’ शीर्षक स्वतंत्रता के अर्थ पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर लेने के बाद भी सामाजिक, आर्थिक, मानसिक और सांस्कृतिक स्तर पर स्वतंत्रता के प्रश्न बने रहते हैं। लेखक का दृष्टिकोण ऐसे प्रश्नों को पाठक के सामने विचार के लिए रखता है।
‘दृष्टि’ की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि पुस्तक पारंपरिक साहित्यिक और सांस्कृतिक विषयों तक सीमित नहीं रहती। ‘सोशल मीडिया और हिंदी कविता’, ‘कृत्रिम बुद्धि के विविध आयाम’, ‘भारतीय बैंकिंग और अर्थ-व्यवस्था’ तथा ‘एक भाषाई विवाद’ जैसे आलेख समकालीन ज्ञान-विमर्श से पुस्तक को जोड़ते हैं। ‘सोशल मीडिया और हिंदी कविता’ विशेष रूप से वर्तमान साहित्यिक परिवेश को समझने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। सोशल मीडिया ने कविता के सृजन, प्रकाशन और पाठक तक पहुँचने की प्रक्रिया को बदल दिया है। अब कविता के लिए पारंपरिक प्रकाशन माध्यम ही एकमात्र विकल्प नहीं है। इससे रचनाकारों को व्यापक पाठक-वर्ग मिला है, लेकिन साथ ही गुणवत्ता, तात्कालिकता और साहित्यिक अनुशासन से जुड़े नए प्रश्न भी पैदा हुए हैं। ‘कृत्रिम बुद्धि के विविध आयाम’ पुस्तक को भविष्य की तकनीकी दुनिया से जोड़ता है। कृत्रिम बुद्धि आज भाषा, शिक्षा, साहित्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर रही है। इस विषय का समावेश यह प्रमाणित करता है कि लेखक साहित्यिक दृष्टि को तकनीकी परिवर्तन से अलग करके नहीं देखते। इसी प्रकार ‘एक भाषाई विवाद’ भाषा और सामाजिक-राजनीतिक संबंधों की जटिलता को सामने लाता है। भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है; वह पहचान, संस्कृति और सत्ता से भी जुड़ी होती है। इसलिए भाषाई विवादों को समझने के लिए भाषिक संवेदना के साथ सामाजिक दृष्टि भी आवश्यक है।
पुस्तक में साहित्यकारों और साहित्यिक विषयों से जुड़े आलेख भी हैं। ‘कुँवर नारायण श्रद्धांजलि’ तथा ‘अंतर्यात्रा का समय’ जैसे शीर्षक लेखक की साहित्यिक संवेदना को व्यक्त करते हैं। कुँवर नारायण आधुनिक हिंदी कविता के महत्त्वपूर्ण रचनाकार रहे हैं। उन्हें श्रद्धांजलि देना केवल किसी साहित्यकार के निधन पर औपचारिक स्मरण नहीं, बल्कि उनकी साहित्यिक चेतना और मानवीय दृष्टि को पुनः स्मरण करना भी है। ‘अंतर्यात्रा का समय’ शीर्षक पुस्तक के दार्शनिक पक्ष को रेखांकित करता है। बाहरी दुनिया की यात्रा जितनी आवश्यक है, उतनी ही महत्त्वपूर्ण मनुष्य की आंतरिक यात्रा भी है। आत्मपरीक्षण, स्मृति, अनुभव और आत्मसंवाद के माध्यम से व्यक्ति अपने अस्तित्व को समझता है। इस प्रकार पुस्तक में बाह्य सामाजिक यथार्थ के साथ अंतर्मन की दुनिया भी उपस्थित है।
‘दृष्टि’ की विषय-वस्तु जितनी विविध है, उसकी संभावित भाषिक संरचना भी उतनी ही बहुरंगी है। पुस्तक के शीर्षक बताते हैं कि लेखक ने गंभीर वैचारिक विषयों के साथ व्यंग्यात्मक, संवादात्मक और आत्मपरक शैली को भी स्थान दिया है। ‘फुर्सत नहीं!’, ‘ओज़ी स्टाइल में विनोद’, ‘गंभीर जुआरी – युधिष्ठिर के अवतार’ जैसे शीर्षक पाठक में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं, जबकि ‘कानून या न्याय’, ‘राजधर्म बनाम महत्वाकांक्षा’ और ‘कृत्रिम बुद्धि के विविध आयाम’ जैसे शीर्षक गंभीर चिंतन की अपेक्षा जगाते हैं। इस दृष्टि से ‘दृष्टि’ का शिल्प एकरैखिक नहीं है। कहीं संस्मरणात्मक आत्मीयता है, कहीं सामाजिक टिप्पणी, कहीं सांस्कृतिक विश्लेषण और कहीं समकालीन विषयों पर विचार। कथेतर गद्य की यही बहुविधता पुस्तक को पाठकीय स्तर पर रोचक बनाती है।
पुस्तक का अंतिम खंड ‘प्रवासी साहित्य विविधा : एक पागल जीनियस’ संस्मरणात्मक और रेखाचित्रात्मक स्वरूप की ओर संकेत करता है। कथेतर साहित्य में संस्मरण का विशेष महत्त्व इसलिए है कि उसमें इतिहास या समाज किसी निर्जीव तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि जीवित अनुभव के रूप में सामने आता है। किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को उसके व्यवहार, स्मृतियों और लेखक के साथ संबंधों के माध्यम से प्रस्तुत करना रेखाचित्र की विशिष्टता है। ‘एक पागल जीनियस’ जैसा शीर्षक अपने आप में जिज्ञासा पैदा करता है। इसमें व्यक्ति के व्यक्तित्व की असाधारणता और उसकी जटिलताओं दोनों को समझने की संभावना है। इससे पुस्तक का कथेतर संसार अधिक मानवीय और आत्मीय बनता है। इसके अलावा संस्मरण ‘रूबी’ और ‘बेबूझ’ भी इस पुस्तक के एक अलग ढंग के आकर्षण हैं । व्यंग्य लेखन को हरिहर झा जी ने बहुत तरीके से लिखा है । ‘जाएँ भाड़ में’, ‘हर ताल पर हड़ताल’, ‘दुखी होने का नाटक’ ये लेखक की कलात्मक दृष्टि के परिचायक हैं । हिम और ज्वालामुखी के संयोग से निकली सुंदरता – न्यूजीलैंड का संस्मरण भी इस पुस्तक का एक अलग आकर्षण है ।
‘दृष्टि’ की सबसे बड़ा विशेषता इसकी विषय-विविधता और समकालीन संवेदना है। पुस्तक में भारतीय परंपरा और आधुनिकता, देश और प्रवास, साहित्य और समाज, धर्म और नैतिकता, भाषा और राजनीति, तकनीक और मनुष्य—इन सभी के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास दिखाई देता है। लेखक की दृष्टि किसी एक अनुशासन की सीमाओं में बँधी हुई नहीं है। पुस्तक की दूसरी बड़ी विशेषता इसका तुलनात्मक सांस्कृतिक दृष्टिकोण है। ऑस्ट्रेलियाई समाज के संदर्भों को भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों और अनुभवों से जोड़ना पाठक को दो भिन्न सांस्कृतिक संसारों के बीच संबंध देखने का अवसर देता है। इससे प्रवासी साहित्य का क्षितिज भी विस्तृत होता है। तीसरी विशेषता समसामयिकता है। सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धि, बैंकिंग, भाषा-विवाद और बदलते सामाजिक मूल्यों जैसे विषयों को साहित्यिक और सामाजिक दृष्टि से देखना पुस्तक को वर्तमान समय से जोड़ता है। फिर भी विषयों की इतनी अधिक विविधता एक चुनौती भी उत्पन्न करती है। इतने अलग-अलग विषयों के कारण पुस्तक को किसी एक निश्चित विधागत या वैचारिक खाँचे में रखना कठिन हो सकता है। किंतु यही उसकी सीमा एक अर्थ में उसकी शक्ति भी बन जाती है। ‘दृष्टि’ को किसी एक विषय की पुस्तक की अपेक्षा लेखक की बहुआयामी जीवन-दृष्टि का दस्तावेज मानना अधिक उचित होगा।
कुल मिलाकर ‘दृष्टि’ कथेतर गद्य की उस परंपरा को आगे बढ़ाने वाली कृति के रूप में देखी जा सकती है, जिसमें साहित्य जीवन से अलग नहीं होता। इसमें भारतीय मिथकीय परंपरा से लेकर ऑस्ट्रेलियाई प्रवासी जीवन तक, कबीर और तुलसी से लेकर सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धि तक, राजधर्म से लेकर व्यक्तिगत अंतर्यात्रा तक अनेक विषय एक साथ उपस्थित हैं। पुस्तक का केंद्रीय आग्रह मनुष्य और उसके समय को समझना है। लेखक बाहरी घटनाओं के पीछे छिपे सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक अर्थों को पहचानने का प्रयास करते हैं। इसी कारण ‘दृष्टि’ केवल आलेखों का संकलन नहीं रह जाती; वह अपने समय को देखने, परखने और उसके साथ संवाद करने का माध्यम बनती है। इस पुस्तक का विशेष महत्त्व उन पाठकों के लिए है जो प्रवासी साहित्य, कथेतर गद्य, भारतीय सांस्कृतिक चिंतन और समकालीन सामाजिक सरोकारों को एक साथ समझना चाहते हैं। विषयों की बहुलता, अनुभव की प्रामाणिकता और प्रश्नाकुल दृष्टि इसे समकालीन हिंदी कथेतर गद्य की एक उपयोगी और विचारोत्तेजक कृति बनाती है। मेरी दृष्टि में इस पुस्तक में कहीं भी कोई वर्तनी संबंधी त्रुटि अथवा वाक्य-रचना संबंधी अनावधानता देखने को नहीं मिलती है । सरल और सुबोध वाक्य-प्रयोग इस पुस्तक की सार्थकता को स्वयं सिद्ध करते हैं । शब्दशः प्रकाशन, नयी दिल्ली ने अच्छे कागज़ का प्रयोग करते हुए सुंदर और त्रुटिरहित इस पुस्तक का सुंदर प्रकाशन किया है ।
_________
संपर्क –
हिंदी-विभाग
संपर्क – ओड़िशा राज्य मुक्त विश्वविद्यालय
बड़सिंगरी-गोशाला चौक
संबलपुर-768025 ओड़िशा
मोबाइल 9013201191
ईमेल- [email protected]
Last Updated on October 1, 2026 by hariharjha2007
- - डॉ. नवनीत कुमार
- सहायक प्रोफेसर हिंदी-विभाग ओड़िशा
- ओड़िशा राज्य मुक्त विश्वविद्यालय, संबलपुर
- [email protected]
- ओड़िशा राज्य मुक्त विश्वविद्यालय बड़सिंगरी-गोशाला चौक संबलपुर-768025 ओड़िशा









