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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

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राजभाषा के रूप में हिंदी की राष्ट्रीय गरिमा और गौरव

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राजभाषा के रूप में हिंदी की राष्ट्रीय गरिमा और गौरव

                                                                                                   

प्रो. सुशील कुमार शर्मा

          भाषा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। वह केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं, बल्कि उस देश की संस्कृति, इतिहास, परम्परा और अस्मिता का जीवंत दस्तावेज होती है। भारत जैसे विशाल और बहुभाषी देश में जहाँ 22 आधिकारिक भाषाएँ संविधान की आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध हैं और सैकड़ों बोलियाँ लोक जीवन में प्रवाहित हैं, वहाँ एक संपर्क भाषा की आवश्यकता स्वाभाविक थी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने हिंदी को राजभाषा के रूप में अंगीकार किया। राजभाषा के रूप में हिंदी की यह यात्रा केवल एक संवैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता, स्वाभिमान और गरिमा की यात्रा है।

         अक्सर सामान्य जन में राजभाषा और राष्ट्रभाषा को लेकर भ्रम रहता है। राष्ट्रभाषा वह भाषा होती है, जो पूरे राष्ट्र के जन-जन द्वारा स्वाभाविक रूप से बोली और समझी जाती है, जबकि राजभाषा वह भाषा है,  जिसे सरकार अपने कामकाज के लिए आधिकारिक रूप से उपयोग करती है। भारत के संविधान में कहीं भी ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। संविधान के भाग 17, अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा से संबंधित प्रावधान हैं।

         संविधान सभा में इस विषय पर दीर्घ और गंभीर बहस हुई। 14 सितंबर,  1949 का दिन इस दृष्टि से ऐतिहासिक है। इसी दिन संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया और इसीलिए हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। अनुच्छेद 343(1) स्पष्ट रूप से कहता है कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा।

         संविधान निर्माता इस सत्य से भली-भाँति परिचित थे कि एकदम से अंग्रेजी को हटाकर हिंदी को स्थापित करना व्यावहारिक नहीं होगा। इसलिए अनुच्छेद 343(2) में 15 वर्षों तक अर्थात 1965 तक अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रखने की व्यवस्था की गई। साथ ही अनुच्छेद 344 में राष्ट्रपति द्वारा राजभाषा आयोग और समिति के गठन का प्रावधान किया गया ताकि हिंदी के प्रगामी प्रयोग के लिए सिफारिशें की जा सकें। अनुच्छेद 351 हिंदी के विकास के लिए संघ का कर्तव्य निर्धारित करता है, जिसमें कहा गया है कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।

         हिंदी को राजभाषा बनाए जाने के पीछे केवल संख्याबल नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी ने पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया था। महात्मा गांधी ने 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। उन्होंने हिंदी को जनमानस की भाषा बताया। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल जैसे नेताओं ने भी हिंदी के समर्थन में अपने विचार रखे।

 

         हिंदी का साहित्यिक और सांस्कृतिक वैभव भी अतुलनीय है। सूरदास, तुलसीदास, कबीर, मीरा, प्रेमचंद, निराला और महादेवी वर्मा तक की एक अविच्छिन्न साहित्यिक परम्परा ने हिंदी को केवल भाषा नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों की संवाहक बनाया है। यह भाषा भक्ति आंदोलन की भाषा रही है, जिसने जाति और वर्ग की सीमाओं को तोड़कर पूरे भारत को एक भावनात्मक एकता दी। अतः जब इसे राजभाषा का दर्जा मिला तो यह किसी एक प्रदेश की भाषा का सम्मान नहीं, बल्कि भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का सम्मान था।

         1965 में जब 15 वर्ष की अवधि समाप्त होने वाली थी, तब हिंदीतर  भाषी राज्यों में, विशेषकर तमिलनाडु में, आशंका उत्पन्न हुई कि हिंदी थोप दी जाएगी। इस पृष्ठभूमि में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आश्वासन दिया कि हिंदीतर भाषियों पर हिंदी थोपी नहीं जाएगी। इसी आश्वासन को मूर्त रूप देने के लिए राजभाषा अधिनियम 1963 पारित किया गया। इस अधिनियम की धारा 3(3)  के अनुसार संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए जिनके लिए 1965 से पहले अंग्रेजी का प्रयोग होता था, उसके बाद भी अंग्रेजी का प्रयोग जारी रह सकता है। अर्थात द्विभाषिक व्यवस्था को अपनाया गया।

         बाद में राजभाषा नियम 1976 बनाए गए। इन नियमों के अंतर्गत पूरे देश को तीन क्षेत्रों में बाँटा गया – क्षेत्र ‘क’ में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली आते हैं। क्षेत्र ‘ख’ में गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब और चंडीगढ़ हैं। क्षेत्र ‘ग’ में शेष सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं। इन क्षेत्रों के लिए हिंदी में पत्राचार की अलग-अलग अपेक्षाएँ निर्धारित की गईं ताकि व्यावहारिक कार्यान्वयन हो सके।

         इसके क्रियान्वयन के लिए गृह मंत्रालय के अधीन राजभाषा विभाग की स्थापना 1975 में की गई। नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों, विभागीय राजभाषा कार्यान्वयन समितियों और हिंदी सलाहकार समितियों के माध्यम से सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाता है।

         राष्ट्रीय गरिमा का वास्तविक प्रकटीकरण तब होता है, जब शासन जनता की भाषा में जनता तक पहुँचे। राजभाषा के रूप में हिंदी का उद्देश्य यही है। आज केंद्र सरकार के अधिकांश मंत्रालय, विभाग, सार्वजनिक उपक्रम और बैंक अपना मूल कार्य हिंदी में करने का प्रयास कर रहे हैं। संसद की कार्यवाही हिंदी और अंग्रेजी दोनों में होती है, परन्तु हिंदी में बोलने वाले सांसदों की संख्या निरंतर बढ़ी है।

         यद्यपि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में अभी भी अंग्रेजी का ही प्रचलन है, परन्तु अनुच्छेद 348 के तहत राज्यपाल की सहमति से और राष्ट्रपति की अनुमति से राज्यों के उच्च न्यायालयों में हिंदी के प्रयोग की अनुमति का प्रावधान है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों ने अपने उच्च न्यायालयों में हिंदी में वैकल्पिक रूप से कार्य की अनुमति प्राप्त की है। यह न्याय को आम आदमी के करीब ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

         शिक्षा के क्षेत्र में भी राजभाषा का गौरव बढ़ रहा है। राष्ट्रीय  शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा और भारतीय भाषाओं में शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने कई इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों को हिंदी सहित आठ भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया है। प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे संघ लोक सेवा आयोग में भी हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों की सफलता दर बढ़ी है, जो यह सिद्ध करती है कि ज्ञान का माध्यम अंग्रेजी ही नहीं हो सकती।

         आज का युग डिजिटल युग है और इस युग में हिंदी ने अपनी राष्ट्रीय गरिमा को वैश्विक गरिमा में परिवर्तित कर दिया है। यह धारणा कि तकनीक और हिंदी साथ नहीं चल सकते, पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री की वृद्धि दर अंग्रेजी से कई गुना अधिक है।

         भारत सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘भाषिनी’ इस दिशा में मील का पत्थर है। जुलाई 2022 में प्रारंभ हुआ यह ए.आई. आधारित अनुवाद प्लेटफॉर्म 22 भारतीय भाषाओं में रियल टाइम अनुवाद की सुविधा देता है। प्रधानमंत्री का हिंदी में दिया गया भाषण अब तमिलनाडु का नागरिक तमिल में और बंगाल का नागरिक बांग्ला में सुन सकता है। यह तकनीक राजभाषा के उस संवैधानिक दायित्व को पूरा करती है, जिसमें सभी भारतीय भाषाओं के बीच सेतु बनाने की बात कही गई थी।

         यूनिकोड के आगमन ने देवनागरी लिपि को डिजिटल रूप से सशक्त बनाया है। आज गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अन्य सभी बड़े प्लेटफॉर्म पर हिंदी इनपुट टूल, वॉयस टाइपिंग और अनुवाद की सुविधा उपलब्ध है। यूपीआई, उमंग ऐप और डिजीलॉकर जैसी सरकारी सेवाएँ हिंदी में उपलब्ध होने से करोड़ों ग्रामीण और सामान्य जन को डिजिटल इंडिया से जोड़ा गया है। यह राजभाषा की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक सफलता है।

         इतनी प्रगति के बावजूद कुछ चुनौतियाँ शेष हैं। पहली चुनौती मानसिकता की है। आज भी एक वर्ग ऐसा है,  जो हिंदी को पिछड़ेपन का प्रतीक और अंग्रेजी को आधुनिकता का प्रतीक मानता है। यह हीन भावना औपनिवेशिक मानसिकता का अवशेष है। हमें समझना होगा कि जापान, जर्मनी, फ्रांस और चीन जैसे देशों ने अपनी ही भाषा में विज्ञान और तकनीक में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। दूसरी चुनौती हिंदी में उच्चस्तरीय तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली के सरल और बोधगम्य अनुवाद की है। वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग इस दिशा में कार्य कर रहा है, परन्तु ऐसे शब्द गढ़े जाने चाहिए जो बोलचाल में सहज हों, न कि केवल संस्कृतनिष्ठ क्लिष्ट शब्द। तीसरी चुनौती अनुवाद की गुणवत्ता की है। अक्सर सरकारी दस्तावेजों में अंग्रेजी से हिंदी में शाब्दिक अनुवाद किया जाता है, जो दुरूह हो जाता है। हमें मूल रूप से हिंदी में चिंतन और लेखन की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना होगा।

         इन चुनौतियों का समाधान इच्छा-शक्ति और सम्मान में निहित है। जब अधिकारी और कर्मचारी हिंदी में काम करने में गौरव महसूस करेंगे, जब फाइलों पर हिंदी में टिप्पणी लिखी जाएगी, जब बैंक के फॉर्म हिंदी में भरे जाएंगे, तभी राजभाषा का सच्चा सम्मान होगा। इसके लिए पुरस्कार और प्रोत्साहन योजनाओं के साथ-साथ प्रशिक्षण कार्यक्रमों को और प्रभावी बनाना होगा।

         राजभाषा के रूप में हिंदी केवल संविधान का एक अनुच्छेद नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की भावनात्मक एकता और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है। यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है और साथ ही भविष्य के डिजिटल विश्व में आत्मविश्वास के साथ खड़े होने की शक्ति देती है। हिंदी की गरिमा इस बात में है कि उसने कभी किसी भाषा का विरोध नहीं किया। वह भारत की सभी भाषाओं की बड़ी बहन की तरह है, जो सबको साथ लेकर चलती है। अनुच्छेद 351 में भी कहा गया है कि हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों और रूपों को आत्मसात करके समृद्ध होना चाहिए।

         अतः आज आवश्यकता है कि हम हिंदी को केवल एक दिन, एक सप्ताह या एक महीने के औपचारिक आयोजन तक सीमित न रखें। इसे अपने दैनिक व्यवहार, अपने कार्यालय, अपने डिजिटल संवाद और अपने चिंतन का हिस्सा बनाएँ। जब देश का युवा इंजीनियर हिंदी में कोड लिखेगा, जब डॉक्टर हिंदी में नुस्खा लिखेगा और जब न्यायाधीश हिंदी में फैसला सुनाएगा, तब राजभाषा के रूप में हिंदी की राष्ट्रीय गरिमा और गौरव का वास्तविक सूर्योदय होगा। यह गौरव किसी पर थोपा नहीं जा सकता, इसे आत्मसात करना होता है और यही भारतीय लोकतंत्र की सुंदरता है।

Last Updated on September 11, 2026 by srijanaustralia

  •  प्रो. सुशील कुमार शर्मा
  • वरिष्ठ आचार्य (हिंदी) एवं संकायाध्यक्ष, मानविकी एवं भाषा संकाय,
  • मिज़ोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय,  आईजोल- 796004
  • [email protected]
  • मिज़ोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय,  आईजोल- 796004
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