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डॉ. शैलेश शुक्ला

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डॉ. शैलेश शुक्ला

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यूँ मायूस मत बैठो

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यूँ मायूस मत बैठो ।

यूँमायूस मत बैठो, हँसों मुस्कुराओं दोस्तों ।
ख़्वाब से निकलो हक़ीक़त में आओ दोस्तों ।।

एक उम्र गुज़ार दी ज़माने वालों के काम देखते-देखते;
अब बारी तुम्हारी है-कुछ कारगुज़ारी करके दिखाओ दोस्तों ।

फूलों की मासूम-महक़ती वादियों में बहुत रह लिए;
अब काँटों में रहने का हुनर भी सीखों और सिखाओ दोस्तों ।

चाँद-सितारों को घर तक लाना जब ना हो मुमकिन;
तो जुगनुओं से ही अपने सहन को सजाओ दोस्तों ।

दौलत और शोहरत के ढेर लगा कर क्या करोगे;

बस,सदाकत-हक़गोई पर फ़ना हो जाओ दोस्तों ।

दुनियाँ वाले तो चाहेंगे ही-आपको हर बार गिराने की;
पर ख़ुद को ख़ुद की नज़र से कभी मत गिराओ दोस्तों ।

मंदिर मस्जिद में जाकर क्यों वक़्त ज़ाया करते हो;
जब क़ाबलियत है तुममें , पहले ख़ुद को ख़ुदा बनाओ दोस्तों ।

खैर इस ‘दीप के साये तले भी अंधेरे ही पनपते हैं;
बेहतर होगा ख़ुद को चाँद-सूरज की तरह चमकाओ दोस्तों ।

यूँ मायूस मत बैठो, हँसों मुस्कुराओं दोस्तों ।
ख़्वाब से निकलो हक़ीक़त में आओ दोस्तों ।।

रचनाकार – संदीप कटारिया (करनाल,हरियाणा)

Last Updated on February 18, 2021 by sandeepk62643

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