न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

इश्क का चांद

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[2/2, 8:49 PM] Pitamber: खुद खड़े कतार अपने वक्त का
करते इंतज़ार फिर भी वक्त नही है।।

भीड़ का मेला चहुँ और सिर्फ
मुङो का झमेला एक दूजे को
धरती का धुल चटाता अपनी वाऱी की खातिर मारा मारी करता इंसान क्योकि वक्त नही है।।

धक्का मुक्की मारा मारी आगे बढ़ने की कोशिश करता अपनी वारी की खातिर सारे जतन करता मानव मानवता की मान भाई वक्त
नही है।।

माँ की कोख
ने पाला नौ माह जब मौका
आया देखु युग संसार कहने
लगे रिश्ते नातेदार काहे का
इंतज़ार वक्त नही है।।

माँ गयी डाक्टर के पास
प्रसव पीड़ा से बेहाल डॉक्टर
बोली खतरे में जच्चा बच्चा
अब मत करो इंतज़ार खुशियो
का सत्कार क्योकि वक्त नही है।।

सीजर बच्चा
देखे युग संसार विलम्ब काहे
वक्त नहीं है।।

दुनियां में आया खुशियों की
दौलत लाया बीते दिन दो चार
माँ ही रह गयी पास बाकी सब
कह गए मिलेंगे हर वर्ष गाँठ
काम बहुत है वक्त नही
है।।

धीरे धीरे बढ़ता जाता
माँ मुझे गोद लिये खड़ी
कतार कभी अस्पताल में
कभी मंदिर में करती अपनी
वारी का इंतज़ार भागम भाग क्योकि वक्त नही है।।

जब मैंने होश संभाला
दुनियां समाज रिश्तें नातो
खास खासियत
जाना नही कोइ जिम्मेदारी
काम फिर भी वक्त नही है।।

हर जगह है मारा मारी
हर कोई करता अपनी वारी
का इंतज़ार फिर भी वक्त नहीं है।।
स्कूल में दाखिले का सवाल या
बस ट्रेन हो या हॉट बाज़ार
सब खड़े कतार फिर भी वक्त नही है।।

जाने कितने है बीमार शायद
पूरी दुनियां ही बीमार अस्पताल
में भाग्य भगवान् भरोसे खड़े सब्
अपनी बारी का करते इंतज़ार
फिर भी वक्त नही है।।

दफ्तर सरकारी है तो क्या बात
पूछों मत हाल कुर्सी पर बैठा बाबू या अधिकारी पीता चाय पर चाय
कोई काम नही फिर भी वक्त नही है।।
आफिस में दाखिल होते ही
बाबू हो या अधिकारी आपस
में चर्चा करते राजनीती टी वीऔर
अखबार।।

पीते फिर चाय आ
जाए गर कोई फरियादी लेकर
कोई कार्य झट बोलते कितना है
काम वक्त नही है।।

राशन की कतार गैस सिलेंडर
की कतार बैंको में पैसा देने लेने
की कतार कतार दर कतार
इंतज़ार दर इंतज़ार फिर भी
वक्त नही है।।

जीवन बिता
खड़े कतार मरने के बाद
खड़ा पड़ा मुर्दा कतार है।।

अपने
श्मशान कब्र की कब
आएगी बारी पता नही करता
इंतज़ार फिर भी वक्त नही है।।

जीवन में देखा शिक्षक को वक्त
नहीं डॉक्टर को वक्त नही ।।
माँ बाप ने कितनी कठिनाई
दुःख पीड़ा से बच्चों को पाला
बच्चे गर लायक तो वक्त नही नालायक तो वक्त नही है।।

जीवन में वक्त नही मरने के
बाद करते है कब्रिस्तान श्मशान
का इंतज़ार फिर भी वक्त नही है।।

दुनियां की दौलत से कीमती
वक्त जीवन के प्रिय प्रियतमा
से लेते फेरे ।।

पंडित से कहते
दक्षिणा दर ज्यदा कर लो
संक्षिप्त करो वैवाहिक संस्कार
वक्त नही है।।

वक्त नही के चक्कर में बढ़
गया भ्रष्टाचार कतार का
चक्कर नियम क़ानून का
मैटर कर नही सकते इन्तज़ार
कुछ दे ले कर शीघ्र निपटाते
काम क्योकि वक्त कीमती
वक्त नही है।।

अब और कठिन दौर है
माँ बाप भी जन्म देने के
बाद बच्चे को देते सौंप
किड्स हाउस वक्त नही
है की नई संस्कृति इज़ाद।।

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर
[2/3, 7:24 PM] Pitamber: वादे तो वादे वादों का क्या
वक्त से मोहलत मिली
निभा दिया।।
निभा नहीं पाये तो हालत
वयां किया।
हालत तो हलात का क्या
कभी माकूल कभी
दुश्मन ,नामाकूल सा होता।।
हालत ,हालात बदल सकते
गर वादा
जुबान ,जज्बे , जज्बात का
बयां इरादा होता।।
इरादे तो इरादे है, इरादों का क्या
हारते हिम्मत का शर्मशार
कश्ती का मज़ाक तो शेर की दहाड़ होता।।
हौसलों की हद नहीं होती पस्त
हौसला नहीं होता
इरादों के जद में ,हौसलो
की हद ,वादों का वजूद कद होता।।
वक्त जहाँ में सबके लिये
बराबर मुंसिफ मिज़ाज़ वक्त खुदा भगवान होता।।

वक्त ना किसी का दोस्त् ना किसी का दुश्मन।।
वक्त का दुश्मन इंसान खुद को धोखा देता।।

वक्त कद्रदान पर मेहरबान
जाया करता जो मिले वक्त को
वक्त ही कर देता बेमोल परेशान।।
शख्स जो को खुद को वक्त में खोजता हो जाता वक्त के थपेड़ो भंवर भ्रम के जाल में शर्म शार।।

बीत जाती जिंदगी कोषते
तक़दीर ,वक्त, खुदा ,भगवान् को
तकदीर खुदा भगवान् का क्या?
उनके लिये सारा संसार होता।।
तदवीर के तरासे इंसान की चमक
ईमान वादे की हैसियत वक्त की
कीमत वक्त का जर्रा जमीं जिगर होता।।

हौसलो इरादों के इंसान की
लब्ज जुबान कीमती होता
वादे निभाने की ताकत
तकदीर खुदा भगवान् से मिल
जाने की आशिकी का जूनून होता।।

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर
[2/4, 10:25 PM] Pitamber: वक्त की क्या बात
अच्छों अच्छो की
दिखा देता औकात
पल भर में रजा रंक
फकीर वक्त की तस्वीर।।
वक्त किसी का गुलाम नही
वक्त संग या साथ नही
वक्त किसी का शत्रु मित्र नही
वक्त तो भाग्य भगवान् फकीर।।
वक्त दीखता नही दामन में
सिमटता नही आग में जलता नही
सागर की गहराई में डूबता नही वक्त कायनात का राहगीर।।
समय काल आवर दिवस माह
वर्ष युगों युगों से अपनी गति
चाल के संग भूत् वर्तमान अतीत।।
वक्त तारीख का पन्ना नही
वक्त तारीख का पन्ना सिर्फ
कायनात की यादों की जमीन।।
वक्त रुकता नही चलता जाता
लाख जतन कर ले कोई लौट
कर नही आता वक्त जज्बा जमीर।।
वक्त के अपने रंग रूप
कही दिखता है चमन बहार में
खुशियों की कायनात में प्रेम मुस्कान में वक्त ही करम करिश्मा तकदीर।।
वक्त आसुओं की धार विरह
वियोग संजोग मिलन जुदाई
वक्त रिश्तों की डोर का छोर
वक्त कब्रिस्तान श्मशान वफ़ा
बावफ़ा बेवफाई।।
वक्त किस्मत वक्त काबिलियत
वक्त सस्ता वक्त महंगा वक्त जख्म
वक्त मरहम वक्त मजबूर वक्त मशहूर वक्त खुदा खुदाई।।
वक्त जागीर नही वक्त जागीर का
जन्म दाता हद हैसियत बनाता मिटाता वक्त आग वक्त ओस
वक्त शोला आग रुसवाई।।
वक्त औकात वक्त ताकत
वक्त कमजोर की हिमाकत
वक्त अर्थ को अर्थहीन
बेमोल को बेशकीमती बानाता
वक्त से ही नाम बदनाम
वक्त ना दोस्त ना भाई ।।
वक्त नही बदलता बदलता
सिर्फ वक्त का मिज़ाज़ वक्त
मौसम चोली दामन का
साथ वक्त बेरबम हरज़ाई।।
वक्त मजलूम
वक्त ही दिखाता हर दर द्वार
वक्त को कोई पार न पाया
वक्त ना अपना पराया वक्त
शौर्य समशीर।।
वक्त वाकया वक्त फ़साना
अफ़साना वक्त कीमती
वक्त दुनियां की दौलत
वक्त गवाह वक्त गुनाह
वक्त मुज़रिम वक्त मजलिस
वक्त मुंसिफ मुसाफिर बाज़
दगाबाज़ मौका मतलब धोखा
सौदा सौदाई।।
[3/18, 6:51 PM] Nandlal Mani Tripathi: ——इश्क का चाँद —

अरमानों निकला चाँद हलचल दुनियां में भाग्य भगवान जैसा।।
जग मग तारे दीप प्रेमी
प्रेम की चाहत जैसा।
सुंदर चाँद कि हद इश्क चाँदनी जैसा।।
उड़ती हवाओ में केशुओ में चाँद सा चेहरा छिपा सावन कि घटाओ में छुपे चाँद के जैसा।
आँखों का काजल सावन का बादल शर्म से आंखे झुक जाना चाँद के शर्माने जैसा!!
हर तरफ प्रेम की मल्लिका कि खुशबु
चाँद कि चांदनी में कलियों के खिलने जैसा ।।
चाँद का प्यार सागर की प्रेम गहराई जैसा ।।
चाँद से दुनियां में चॉदनी प्रेम का चाँद दिल में हो उजियार जैसा।।
चाँद का दाग हुस्न के गालो पे काला तील जैसा ।।
चाँद सा हुस्न का मुस्कुराना दिलों पे बिजली गिरना चमक चाँद के जैसा।!
निकलते चाँद कि लाली लवो के हुस्न कि लाली चाहत के पैमाने जाम जैसा।!
चाँदी जैसा रंग हुस्न का चाँद कि चाँदनी जैसा ।।
हुस्न कि हद हकीकत चाँद जैसा।।

चाँद का सबाब लम्हा लम्हा हुस्न इश्क के अफ़साने जैसा।।
चाँद का शाम ढ़ले आना चाँद का हुस्न इंतज़ार तराने जैसा।।
ढलती रात में चाँद का सुरूर हुस्न कि तपिस में परवानो के जल जाने जैसा।।
सर्द चाँदनी रातों में टपकती ओस कि बूदें सबनम के गिरने बिखरने जैसा।।
दूज का चाँद ,चौदवीं का चाँद, ईद का चाँद ,पूर्णवासी का चाँद प्यार हुस्न इश्क के नज़राने जैसा।।
मोहब्बत है नशा ,इश्क जुनुन ,हुस्न मैखाने जैसा ।
हुस्न दीवानो कि तमन्ना, चाँद जहां कि आरजू जैसा।।
हुस्न ,का इश्क इबादत ,चाँद कि चाहत दीदार प्यार यार जैसा।।

नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर

Last Updated on March 18, 2021 by nandlalmanitripathi

  • नंन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर
  • प्राचार्य
  • भारतीय जीवन बीमा निगम
  • [email protected]
  • C-159 दिव्य नगर कॉलोनी पोस्ट-खोराबार जनपद-गोरखपुर -273010 उत्तर प्रदेश भारत
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