शहीद की माँ
इक बुढ़िया आँसुओं से
आँगन लीप रही थी,
आसमान रो रहा था
धरती काँप रही थी।
बेजान लाश बनी वह
खुद को ढो रही थी,
न जाने धरती में वह
किसको ढूँढ रही थी।
आहट पर मेरी उसने
दो नयन जो उठाये
उन कश्तियों में मानों
पूरी दुनिया डूब रही थी।
इन सरहदों ने उसका
सब कुछ निचोड़ लिया था,
बुत-सी बनी वह
किसकी बाट जोह रही थी।
एक माँ की लाज खातिर
दूजी माँ व्याकुल हो रही थी,
न जाने कितने लहुलुहान चेहरे
वो इन आँसुओं में
धो रही थी।
Last Updated on January 12, 2021 by shabnamsharma2006128
- आचार्य शबनम
- शर्मा
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- अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.A मोब. – 9816838909







