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देशभक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता

शहीद की माँ

इक बुढ़िया आँसुओं से

आँगन लीप रही थी,

आसमान रो रहा था

धरती काँप रही थी।

बेजान लाश बनी वह

खुद को ढो रही थी,

न जाने धरती में वह

किसको ढूँढ रही थी।

आहट पर मेरी उसने

दो नयन जो उठाये

उन कश्तियों में मानों

पूरी दुनिया डूब रही थी।

इन सरहदों ने उसका

सब कुछ निचोड़ लिया था,

बुत-सी बनी वह

किसकी बाट जोह रही थी।

एक माँ की लाज खातिर

दूजी माँ व्याकुल हो रही थी,

न जाने कितने लहुलुहान चेहरे

वो इन आँसुओं में

धो रही थी।