स्मृति अब अवशेष नहीं,
स्मृति अब अवशेष नहीं…!!!
सृजित हुई यादें तेरी,
इक पल में भी इक काल सदृश,
घोर शीत के ऋतु के मध्य,
थी जैसे कोई शाल सदृश,
मैं चकोर सा व्याकुल,
मुख मंडल तेरा चन्द्र सदृश,
भ्रमर सदृश मैं मंडराता,
तुम जैसे कोई पुष्प अदृश्य,
प्रेम पुष्प के उपवन में,
सुगंध कोई निःशेष नहीं,
स्मृति अब अवशेष नहीं,
स्मृति अब अवशेष नहीं…!!!
इक प्रश्न करूं…? उत्तर दोगे…??
क्यूं उदासीन हो मेरे प्रति…?
या खिन्न भाव से प्रेरित,
बोलो इसका प्रत्युत्तर दोगे…??
या कहो भला किस बात की खातिर,
तुमने है मौन को अपनाया,
मेरे प्रेम को ठुकराकर,
खुद से खुद को क्यूं झुठलाया…??
विश्वास नहीं होता अब क्युं,
क्युं मुझसे प्रेम अशेष नहीं,
स्मृति अब अवशेष नहीं,
स्मृति अब अवशेष नहीं…!!!
दो शब्द हमारे सुन लो,
क्या कुछ और कभी अभिलाषा की,
अपनी मुस्कान का ढांढस दो,
कुछ और कभी क्या आशा की,
मैं याचक सा तुझ ओर खड़ा,
दो क्षण का ही तो वक़्त मिले,
तुम देख तो लो इक बार सही,
सांसों को थोड़ी सांस मिले…!!
मैं दिवा स्वप्न में डूबा सा,
अब कोई प्रेम विशेष नहीं,
स्मृति अब अवशेष नहीं,
स्मृति अब अवशेष नहीं…!!!
©ऋषि देव तिवारी
Last Updated on January 22, 2021 by rtiwari02
- ऋषि देव तिवारी
- सहायक प्रबंधक
- भारतीय स्टेट बैंक
- [email protected]
- L-4, NAI BASTI RAMAI PATTI MIRZAPUR UTTAR PRADESH INDIA PIN 231001







