पिता…!!!
विघ्न चुन लिए सभी,
पथ सुपथ भी कर दिया,
कठिनाइयों की चादरों को,
खुद वरण ही कर लिया…!
स्वयं को अभाव दे,
हमें संवारते रहे,
खुद के मन को मारकर,
हमें जीवंत कर दिया…!
विलाप खुद को सौंप कर,
प्रसन्न मुख हमें दिए,
लड़े स्वयं ही मुश्किलों से,
हमें यूं मुक्त कर दिया…!
सुदृढ़ अटल प्राचीर से,
हमें वो घेर कर खड़े,
कष्ट रूपी आंधियों से,
हमें सबल भी कर दिया…!
पितृ भाव अतुल्य है,
एहसास है जिन्हे नहीं,
हर एक भाव है अर्थहीन,
जो पिता को रूष्ट कर दिया…!
प्रभु हैं तेरे सामने,
पिता सा रूप ले खड़े,
तू मंदिरों में ढूंढ़ता,
समय भी व्यर्थ कर दिया…!
पितृ ऋण के बंधनों से,
कभी ना मुक्त हो सकूं,
हृदय के इस, प्रण को अब,
हृदय प्रधान कर दिया…!
हृदय के इस, प्रण को अब,
हृदय प्रधान कर दिया…!!
सादर,
Last Updated on January 22, 2021 by rtiwari02
- ऋषि देव तिवारी
- सहायक प्रबंधक
- भारतीय स्टेट बैंक
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