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इक अरसा हो गया तुम मुझसे मिले भी नहीं

इक अरसा हो गया तुम मुझसे मिले भी नहीं,
इस बार मिले भी तो तुम कुछ घुले-मिले नहीं,
न जाने ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कभी मिले ही नहीं।2
इक अरसा हो गया तुम मुझसे मिले भी नहीं,
इस बार मिले भी तो तुमने दरम्यान चिन रखी थी,
एक सख्त दीवार,
तुम्हारी आवाज़ भी कुछ फीकी सी लगी,
गले में घुल आयी शक्कर भी कुछ तीखी-सी लगी,
तुम पहली बार बैठे-बैठे थक से गए,
तुम इस बार मिले भी तो अधिक हिले-डुले भी नहीं,
न जाने ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कभी मिले ही नहीं।2
इक अरसा हो गया तुम मुझसे कभी मिले भी नहीं,
इस बार मिले भी तो तुमने जब्त कर रखीं थीं,
हल्क में ख्वाहिशें,
तुम्हारे पास ज़ज्बातों की भी कुछ कमी सी लगी,
आँखों में जज़्ब हो आए ख्वाबों में भी कुछ नमी-सी लगी,
तुम पहली बार भूल गए थे जिद्द करना,
तुम इस बार मिले भी तो अधिक मिले-जुले भी नहीं,
न जाने ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कभी मिले ही नहीं।2
इक अरसा हो गया तुम मुझसे मिले भी नहीं,
इस बार मिले भी तो तुमने पहली बार बाँध रखी थी,
कलाइ पर घड़ी,
तुम्हारे पास वक्त की भी कुछ कमी सी लगी,
दिल की जमीं पर उग आए अरमानों की सांसें भी कुछ थमीं-सी लगीं,
तुम पहली बार भूल गए थे मुझसे उलझना,
तुम इस बार मिले भी तो मुझसे किए शिकवे-गिले भी नहीं,
न जाने ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कभी मिले ही नहीं।2
इक अरसा हो गया तुम मुझसे मिले भी नहीं,
इस बार मिले भी तो तुम कुछ घुले-मिले नहीं।

Last Updated on January 19, 2021 by rajnichanchal10

  • डॉ. रजनी कुमारी
  • सहायक प्राध्यापक
  • राजकीय महाविद्यालय बिलाबर
  • [email protected]
  • राजकीय महाविद्यालय बिलाबर, कठुआ, जम्मू, जम्मू कश्मीर-184204
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