देश भक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता के लिए प्रेषित कविताएं
1.कविता का शीर्षक :- लोकततंत्र
लोकतंत्र की राजनीति में,
‘लोक’ खो गया ‘तंत्र’ बाकी हैं।
लोक इधर-उधर धक्के खा रहा हैं…!
तंत्र अपनी ही मोझों में उड़ा जा रहा हैं ।।
लोक से तंत्र का बिछुड़ कर चलना
अपनों पर बड़ा सितम ढा रहा
जिसमें…
जन सामान्य मरा जा रहा हैं।
फिर भी तंत्र को कोई साध कर
सही दिशा क्यों नहीं दिखा रहा हैं ?
इसी चिंता में घुट-घुटकर…
प्रबुद्ध से सामान्य वर्ग तक पीसा जा रहा।
बाक़ी इसके अतिरिक्त सब
ठीक-ठाक चलता जा रहा….!
यह कैसा वक्त आ रहा …?
अपना अपनों के लिए ही
घातक बनता जा रहा।
गीदड़ शेर का चोला पहन कर-
मोज मना रहा
इस शेर से डर कर मानव समाज
जीवन बिता रहा।।
कैसा हुआ ये जमाना…?
ये लोकतंत्र कहाँ से कहाँ… जा रहा ?
वह तो बस अपनी ही मौज़ों में
बहता जा रहा
बस…जा रहा
2. कविता का शीर्षक : – वो देश है…मेरा..!!
देश हमको…
क्या -क्या नहीं देता ?
रहने को जो भूखंड देता
वो मात्र भूमि का टुकड़ा नहीं ?
हमारे जीवन का आधार, सुमधुर स्वप्नों का संसार
हमारी मातृ भूमि और जीवन में …
खुशहाली फैलाने का सु-संगम ।
यहाँ की नदियाँ …
पवित्रता और जीवन का आधार।
उत्तर में गंगा-यमुना-सरस्वती और ब्रह्मपुत्र,
मध्य में नर्बदा-ताप्ती-चम्बल और महानदी,
दक्षिण में गोदावरी-कृष्णा-कावेरी और पेन्नार
भारत भूमि में शिराओं और धमनियों सम
प्रवाहित हो कर भू को हराभरा और संपन्न बनाती।
उत्तर में हिमालय भारत का शीश मुकुट,
अरावली की सुमधुर छटाएँ।
मध्य में विंध्य,सतपुड़ा और अजंता,
संस्कृति के विविध रूप दिखाए।।
पूर्वोत्तर की घनगौर बरसातें और
विविध लोक-संस्कृतियों में प्राण फूंकती
सुरम्य संयोजन की छटाएँ
मन को आनंद विभौर कर जाए।
दक्षिण में नीलगिरि-अन्नामलाई-बाबाबूदन
इलायची,शिवराय,वेंलिकोंडा पहाड़ियों के
बनिवासियों की निश्छलताएँ सहज ही मन को भाए।।
पूर्वोत्तर में गारो-खासी-जयंतिया की पहाड़ियाँ
मानसून का आधार,
हरीतिमा की रवानी,
संस्कृति की जिंदगानी
निरंतर खुशियाँ बाँटती
सब के मन में प्यार जगाती
पश्चिम में थार मरु की संस्कृति
रेत के धोरों की निश्छलता
सहज ही मन को लुभाती
ये विविधताएँ ही भारत को …भारतीय बनाती
उत्तर में हिमालय, दक्षिण में हिन्द महासागर
दक्षिण-पूर्व में बंगाल की खाड़ी,
दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर,
उत्तर पश्चिम में थार मरुस्थल
निरंतर जिसकी शोभा बढ़ाता
वो देश है…मेरा..!!
यहाँ की सांस्कृतिक विविधता,
जलवायु भिन्नता, खानपान-रहन सहन के
विविध सतरंगी रंग सबके मन को भाते।
भारत भूमि सब रतनन को उपजावती
देश प्रेमी जो मातृ भूमि पर
सब कुछ न्यौछावर करती जाती
बड़े-बड़े उद्योगपति,जो विदेशों में भारत की शान बढ़ाते
बड़े डॉक्टर और इंजीनियर
जिनका लोहा और गुणगान
अमेरिका और विकसित देश भी मानते
जोहरी,तपस्वी इसी भू की देन
जब कोई इस भू-पर आँख उठाता
तो हमारी भारतीय सेना
उसका मुँह तोड़ जवाब देने में
तनिक भी विचलित न होती
भारत जन भी तन-मन-धन से
इनका साथ निभाते
कभी न अपने पाँव पीछे हटाते।
देश ने जो हमको दिया …
उसका कितना फ़र्ज़ हमने अदा किया?
लिया बहुत-बहुत और दिया कम-कम
देश दिन पर दिन कहाँ से…
कहाँ पहुँचने लगा ?
जाने कितनों के सपनें पूर्ण हुए
तो कितनों के चकनाचूर ?
देश को देने के बाद जो दाय हमको मिला
वो कितना और कैसा लगा?
यह चिंतन-मनन-मंथन का विषय है,
देश किस-किस को क्या-क्या दे रहा?
कहीं रेवड़ बाँटने के चक्कर में
क्वालिटी से कॉम्प्रोमाइज की यह नीति
कहीं घातक सिद्ध ना हो जाए ?
गधे गुलाब जामुन खाए और
घोड़ों को घास खाने के भी लाले पड़ जाए
बेड़ा ग़र्क होने से फिर कौन देश को बचाए?
3.कविता का शीर्षक :- वक्त पे संभालने वालों..!!
वक्त ने ..
बे वक्त ही
ये कैसे घाव दिये?
अपने ही भीतर घात से
हम तार-तार हुए।
देश को स्वार्थियों से
सजग रहना होगा ।
वार्ना…?
अपनी ही हदों और चौहद्दियों को
उम्रभर सहना होगा ।
वक्त रहते हम ना बोल पाये तो..?
जीवनभर ऐसे ही सितम सहना होगा।
देश की सीमाओं के
सजग पहरे दारों..
अपनी सहादत से माटी का
कर्ज़ चुकाने वालों
ये देश तुमको कभी भी
भुला ना पायेगा..
वक्त-वक्त की नज़ाकत को
वक्त पे संभालने वालों..!!
देश का सीना
फ़क्र से ऊँचा करने वालों
हे वीर जवानों..!!
अपनी वीरता के परचम को
जन-मन में जगाने वाले
हे वीर जवानों..!!
देश को भीतर- भीतर से
खोकला करने वालों को
अगर वक्त रहते
बेनकाब ना कर पाये तो..?
हमारा देश किस हाल में होगा..?
हाल बेहाल होगा..!!
अपनों का क्या हाल होगा?
देश ले भीतरी गद्दारों को
अगर..
वक्त बेवक्त ना ढूंढ़ निकाला तो
मेरा देश कहाँ जायेगा?
बवतन कहाँ जायेगा?
माटी का कर्ज कौन चुकायेगा?
मातृभूमि को अपने लहू से
सींचने वालों..
ये देश हमेशा तुम्हारा
कर्ज़दार हो..
तुम्हारे फ़र्ज़ को ना कोई भूल पायेगा
हर वक्त जो फ़र्ज़ के लिये जिये..
अपने वतन के लिए जिये..
ये वतन आज़ाद रहे..
ये देश आबाद रहे..
ये लोकतंत्र और संविधान आबाद रहे..!
हम रहे या ना रहे
हमेशा ये मेरा हिन्दुस्तान आबाद रहे..!!
डॉ. मुकेश कुमार शर्मा (‘सुदीप’)
असिस्टेंट प्रोफेसर स्नातकोत्तर हिंदी विभाग
महात्मा गांधी सरकारी आर्ट्स कॉलेज, चालक्करा, माही (U.T. पुदुच्चेरी)भारत
पिन कोड 673311
मोबाईल – 09660325669
ईमेल- [email protected]
Last Updated on January 10, 2021 by sharmamk1985
- डॉ० मुकेश कुमार शर्मा 'सुदीप'
- असिस्टेंट प्रोफेसर स्नातकोत्तर हिंदी विभाग
- महात्मा गांधी सरकारी आर्ट्स कॉलेज, चालक्करा, माही (UT पुदुच्चेरी)-673311
- [email protected]
- डॉ. मुकेश कुमार शर्मा ('सुदीप'),असिस्टेंट प्रोफेसर स्नातकोत्तर हिंदी विभाग, महात्मा गांधी सरकारी आर्ट्स कॉलेज, चालक्करा, माही (UT पुदुच्चेरी)भारत पिन कोड 673311 मोबाईल - 09660325669 ईमेल- [email protected]







