निंदित कर्मों के बीच फंसे,
सत्कर्मों के अभिराम बनो,
तुम राम नहीं बन सकते तो,
कण के इक भाग सा राम बनो।
पर निंदा की तुम धारा में,
बहते ही बहते जाओगे,
कलुषित मन के दुर्भावों पर,
पर्वत सा पूर्ण विराम बनो,
तुम राम नहीं बन सकते तो,
कण के इक भाग सा राम बनो।
नीति अनीति के सागर में,
नाविक तो तुम अब बन बैठे,
लहरों से क्यूं भयभीत हुए,
इक सत्यनिष्ठ संग्राम बनो,
तुम राम नहीं बन सकते तो,
कण के इक भाग सा राम बनो।
आराध्य नहीं हो सकते तुम,
जब तक ना अहम का त्याग करो,
जलधि सदृश तुम हठी नहीं,
निर्मल जल सा अविराम बनो,
तुम राम नहीं बन सकते तो,
कण के इक भाग सा राम बनो।
शत्रु भाव परिलक्षित हो,
तुम मित्र भाव ही दर्शाओ,
निंदक की निन्दा को तुम,
प्रेम भाव से भर जाओ,
श्रीकृष्ण सा इक प्रेमी बनकर,
तुम सबल एक बलराम बनो,
तुम राम नहीं बन सकते तो,
कण के इक भाग सा राम बनो।
सादर🙏🙏
Last Updated on January 22, 2021 by rtiwari02
- ऋषि देव तिवारी
- सहायक प्रबंधक
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