न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

संघर्ष : संकल्प (भाग ५)

Spread the love
image_pdfimage_print

संकल्प…!!!

रात के अंधेरे में उम्मीद की कोई रोशनी अगर दिखाई ना दे…तो अंधेरे की कालिमा और बढ़ जाती है। सामान्य सी रात भी अमावस की रात का रूप ले लेती है। निगाहें सूर्य की उस किरण की राह तकती रहती हैं…जिससे इतनी उम्मीद तो रहती है कि थोड़ी सी राह तो दिखेगी…लेकिन रात बीतती ही नहीं।

संघर्ष से भरी हुई वो रातें भी राधेश्याम के जीवन से समाप्त होने का नाम नहीं ले रही थी। रोज़ रात में लिए गए उसके संकल्प, अगले ही दिन सच्चाई के धरातल पर आते ही अपना दम तोड़ देते थे।

राधेश्याम की तबीयत आज कुछ ठीक नहीं थी। काम से लौटते लौटते आज काफी देर भी हो चुकी थी।

“कहां रह गए थे…??आज इतनी देर कैसे हो गई..?? तबीयत तो ठीक है…??” कुसुम ने पानी का लोटा राधेश्याम को देते हुए पूछा।

“कुछ नहीं…ठीक है सब…!! जा रहे हैं छत पर…सोने..! बच्चे सो गए सब क्या…???” राधेश्याम कहते कहते ही छत की ओर जाने लगा।

“खाना नहीं खाएंगे…..??” कुसुम ने पूछा।

“नहीं…भूख नहीं आज…!” मानों राधेश्याम को आभास था पहले से ही… कि आज तो अनाज का एक कण भी नहीं था घर में। बना ही क्या पाई होगी वो…खाने में आज। पिछले छह महीने से कुसुम की तनख्वाह भी नहीं मिल रही थी। पता नहीं बच्चों को क्या खिलाया होगा उसने। राधेश्याम चुप चाप छत पर जा कर लेट गया।

“सुनिए…सुनिए जी…चलिए खाना खा लीजिए…!” कुसुम राधेश्याम का हांथ हिला हिला कर उसे उठा रही थी।

“चलिए ना…बच्चे भी कुछ नहीं खाए अभी तक…आपके इंतज़ार में। कभी कभी  तो सब साथ बैठ कर खा सकते हैं। चलिए उठ जाईए। चूरमा बनाए हैं। आज सब साथ में ही खाएंगे।” कुसुम, राधेश्याम का हांथ पकड़ कर उसे रसोई में लिए जा रही थी।

रोहन और छोटी पहले से ही थाली की ओर अपनी कातर निगाह दिए बैठे थे। एक ही थाली लगी थी आज। राधेश्याम और कुसुम भी बैठ गए वहीं।

राधेश्याम कुसुम की ओर देखे जा रहा था।

“अब मुझसे और नहीं होता ये सब। ठकुराइन के यहां से आज आधा किलो आंटा ले कर आए थे। कितना जलील किया उन्होंने। बच्चों का मुंह देख के ले आना पड़ा। आखिर कब तक एक एक मुट्ठी के लिए ऐसे ही तरसते रहेंगे। मैं आपसे एक बात कहूं…??” कुसुम ने अपना सर नीचे कर के कहा।

“हां…बोलो…!”

” मैंने खाने में ज़हर मिला दिया है…!! क्या फायदा ऐसे जीवन का।” कुसुम कहते कहते रो पड़ी।

राधेश्याम की आंखे फटी की फटी रह गई।

“हे भगवान…ये क्या दिन दिखा रहे हो..?? अपने हांथों से कोई अपने परिवार को ही ज़हर कैसे दे सकता है। कितना ज्यादा अपमानित महसूस किया होगा कुसुम ने आज..?? तभी तो ऐसा निर्णय लेने के लिए मजबूर हुई वो। क्या आत्महत्या ही एक रास्ता बचा है अब..??” राधेश्याम सोचता ही जा रहा था।

“हां…शायद यही एक रास्ता है अब। ना जीवन शेष रहेगा…ना ही ये दिन देखना पड़ेगा। ये दो चार पांच सौ रुपए में क्या कर पाएंगे हम लोग। बेवजह रोज़ की जलालत से एक पल में छुटकारा मिल जाएगा।”

राधेश्याम ने थाली से पहला निवाला उठाया और खा लिया। रोहन और छोटी को भी अपने हांथ से खिलाया। कुसुम की आंखों से मानों आसूं रुक ही नहीं रहे थे। कुसुम ने भी निवाले का पहला कौर खा लिया। रोहन और छोटी दोनों टूट पड़े थे थाली पर। राधेश्याम और कुसुम दोनों रोए जा रहे थे।

थोड़ी देर में ही…सब के सब जमीन पर शिथिल पड़ गए। पेट की जलन से तड़पने लगे। रोहन दर्द के मारे चिल्ला रहा था। छोटी भी खूब रोए जा रही थी। कुसुम ने गिलास में पानी लिया और तुरंत छोटी और रोहन को पानी पिलाया। राधेश्याम जोर जोर से चिल्लाने लगा।

“हे…भगवान…ये क्या किया मैंने…??? क्या किया भगवान…??”

कुसुम, रोहन और छोटी जमीन पर छटपटाते पड़े हुए थे। राधेश्याम सभी को गले से लगाए रोए जा रहा था।

“भगवान…माफ कर दो मुझे…!! माफ़ कर दो भगवान…!!”

“क्या हुआ…आपको…काहे इतना चिल्लाए जा रहे हैं…काहे की माफी मांग रहे भगवान से महाराज…???” कुसुम ने जोर से राधेश्याम को झकझोरा।

राधेश्याम का चेहरा पसीने से लथ पथ था। एक बुरे स्वप्न से जाग गया था वो। उठते ही सबसे पहले वो भागा…रोहन और छोटी के पास। दोनों सोते हुए बच्चों के सर को चूम लिया उसने।

“नहीं…हम लोग आत्महत्या नहीं कर सकते कभी। कोई भी परिस्थिति आ जाए…हमें लड़ना होगा। ये समय है…गुजर ही जाएगा। आज अभाव ना हो तो…कोई संघर्ष ही क्यूं करेगा। क्यूं कोई भगवान को याद करेगा। ये जीवन अमूल्य है। ऐसे कायरों की तरह मैं हार नहीं मान सकता। और ज्यादा मेहनत करूंगा। जीवन में अपने बच्चों को इस काबिल बनाऊंगा कि कम से कम उन्हें ये दिन ना देखना पड़े।” राधेश्याम एक नए संकल्प के बंधन में बंध चुका था।

अगले दिन ही उसने कापी किताब की एक दुकान खोलने का संकल्प लिया। अपने मित्र की एक पुरानी टपरी में पुरानी किताबों और कापियों की एक दुकान खोल ली थी राधेश्याम ने।

Last Updated on January 22, 2021 by rtiwari02

  • ऋषि देव तिवारी
  • सहायक प्रबंधक
  • भारतीय स्टेट बैंक
  • [email protected]
  • L-4, NAI BASTI RAMAI PATTI MIRZAPUR UTTAR PRADESH BHARAT DESH PIN 231001
Facebook
Twitter
LinkedIn

More to explorer

123

हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष : भोपाल में जुटेंगे देश-विदेश के मनीषी, समकालीन चुनौतियों और भविष्य पर होगा व्यापक विमर्श

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष : भोपाल में जुटेंगे देश-विदेश के मनीषी, समकालीन चुनौतियों

Leave a Comment

error: Content is protected !!