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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

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दशानन का उभरा दर्द, ऐसे कौन जलाता है भाई…

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सुशील कुमार ‘नवीन’

शहर का एक बड़ा मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल। रोजाना की तरह मरीजों की आवाजाही जारी थी। प्रसिद्ध ह्रदयरोग विशेषज्ञ डॉ.रामावतार रामभरोसे ओपीडी में रोजाना की तरह मरीजों को देखने में व्यस्त थे। अचानक इंटरकॉम की बेल बजती है। ये बेल हमेशा आपातकालीन अवस्था में ही बजती है। डॉक्टर साहब ने समय को गम्भीरता को जान तुरन्त रिसीवर उठाया। रिसीवर उठते ही घबराई सी आवाज सुनाई पड़ी। डॉक्टर साहब! मैं चन्द्रकिरण आईसीयू फर्स्ट से बोल रही हूं। पेशेंट नम्बर दस सीरियस हैं। सांस बार-बार टूट रहीहै। एमओ डॉ. लक्ष्मण साहब ने आपको जल्द बुलाया है। बात सुन डॉक्टर साहब ने उसे कुछ इंजेक्शन तैयार रखने को कहा और ओपीडी बीच में ही छोड़कर वे आईसीयू की तरफ दौड़ पड़ें। 

        आईसीयू फर्स्ट कोरोना के सीरियस मरीजों के लिए विशेष तौर पर बनाया हुआ था। यहां तीन विदेशी मरीज एडमिट थे। एक भारी भरकम मदमस्त कुम्भकर्ण की दो दिन पहले मौत हो चुकी थी। दूसरे अंहकारी इंद्रजीत ने कल रात दम तोड़ दिया था। दोनों के शव कोरोना नियमों के तहत पैक कर मोर्चरी में रखे हुए थे। तीसरे मरीज अभिमानी दशानन की हालत भी खराब ही थी। रात से ही वह वेंटिलेटर पर था। उसी की हालत खराब होने पर डॉक्टर को बुलाया गया था। 

      आईसीयू के बाहर ही वार्डबॉय पीपीटी किट लिए तैयार खड़ा था। डॉक्टर ने फौरन पीपीटी किट के साथ हाथों में दस्ताने पहने। मुंह पर मास्क के साथ फेसशील्ड को धारण किया। संक्रमण से बचाव के लिये ये आभूषण अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बने हुए है। बीपी इतना लो हो चुका था उसके अप होने की उम्मीद अब कम ही थी। हार्टबीट शून्यता की ओर  लगातार बढ़ रही थी। डॉक्टर ने नर्स को एक इंजेक्शन और लगाने को कहा। इंजेक्शन लगाते ही मरीज में एक बार हलचल सी हुई। पर अगले ही पल वेंटिलेटर मॉनीटर से लम्बी बीप शुरू हो गई। बीप की आवाज डॉक्टर के साथ अन्य स्टाफ को मरीज के प्राण छोड़ने का संकेत दे चुकी थी।

    डॉक्टर ने पेशेंट डायरी में ‘ही इज नो मोर’ लिखा और वहां से निकल गए। स्टाफ ने शव को प्लास्टिक कवर से पूरी तरह पैक कर उसे भी दो मॉर्चरी में भिजवा दिया। अब तीनों शवों का एक साथ ही हॉस्पिटल स्टाफ की देखरेख में ही अंतिम संस्कार किया जाना था। परिजन शव ले जाना चाहते थे परन्तु संक्रमण के डर के कारण ये अलाउड नहीं था। 

   परिजनों ने अंतिम संस्कार उनके नियमों के तहत ही करने की प्रार्थना की। उन्होंने बताया कि शवों का अंतिम संस्कार लेटाकर नहीं खड़े कर किया जाए। इसके अलावा प्रत्येक शव के साथ 20 से 25 किलो पटाखे या विस्फोटक सामग्री रखी जाए। शवों को अग्नि तीर के माध्यम से ही जाए। विदेशी थे तो सम्मान स्वरूप डॉक्टर ने उनकी इस मांग को स्वीकार कर लिया। एक बड़ी एम्बुलेंस में तीनों शवों को सीधे श्मशान घाट ले जाया गया। वहां पहले तीनों शवों को रस्सियों के सहारे सोशल डिस्टेंस के साथ खड़ा किया गया। दशानन का शव मेघनाथ और कुम्भकर्ण के बीच मे खड़ा किया गया। डॉक्टर लक्ष्मण ने मेघनाथ के शव को तीर के माध्यम से अग्नि दी। पटाखों की आवाज जोर-जोर से शुरू हो गई। कुछ देर के अंतराल में डॉक्टर रामभरोसे ने पहले कुम्भकर्ण और बाद में दशानन पर तीर छोड़ उन्हें विदाई दी। 

    अचानक लगा कि जैसे पटाखों के बीच से कोई बोल रहा हो। डॉक्टर रामभरोसे ने ध्यान दिया तो दशानन बोलता सुनाई पड़ा। कह रहा था- मैं कॉमनमैन नहीं हूं। दशानन हूं, दशानन। जला तो सम्मानपूर्वक देते।।न घास है न फूस। आदमी भी गिनती के चार आये हो। पटाखों में सुतली बम तो है ही नहीं।  थोड़ा बजट और बढ़ा देते या चंदा करवा लेते। भारी मन से कहा-ऐसे कौन जलाता है भाई। डॉक्टर रामभरोसे ने उसकी बात को गम्भीरता से सुना। उसे यह कहकर सांत्वना दी। कोरोना काल में तो इसी तरह विदाई मिलेगी। ये तो हमारा भला मान कि हमने महामारी के इस दौर में भी तुम्हारा दहन कर दिया। अन्यथा किसी मोर्चरी में पड़े-पड़े सड़ जाते। बाद में कमेटी वाले आते और एक गड्डा में तुम्हें खोद गाड़ जाते। फिर हो जाता सम्मान। यहां रोजाना हजारों मर रहे है। तुम कोई अकेले थोड़ ही हो।रावण कुछ बोलने ही वाला था अचानक पत्नी की आवाज सुनाई पड़ी। उठ जाओ। रावण दहन शाम को है। पता नहीं नींद में बड़बड़ाने की तुम्हारी आदत कब छूटेगी। उसकी वाकचपलता लगातार जारी थी। मैं चुपके से उठ बाहर निकल गया। दशानन की आवाज़ अभी भी गूंज रही थी-ऐसे कौन दहन करता है भाई। 

(नोट: लेख मात्र मनोरंजन के लिए है। इसे किसी के साथ व्यक्तिगत रूप में न जोड़ें।)

लेखक: 

सुशील कुमार ‘नवीन’

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद है।

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Last Updated on October 27, 2020 by hisarsushil

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