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संतोष कुमार झा की कविता ‘पिताजी का कोट’

पिताजी का कोट
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पिताजी का कोट

सन्तोष कुमार झा
अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक
कोंकण रेलवे

पिता का कोट पहनते ही
जाने क्या हो जाता है।
सर तना, कदम तेज़
होंठों पर मुस्कान ,
आँखों में चमक
और कंधे सीधे ,
लेकिन हो जाते हैं,
बेहद बोझिल।

पहनते ही कोट बाबूजी का
भर जाता हूँ चिन्ताओं से,
दुनियाभर के।
बोझ अनुभवों के उतर
आते हैं मस्तिष्क से कन्धों पर।
एहसास ज़िम्मेदारियों का
तारी होता जाता है,
होता जाता हूँ
कुछ ही अन्तराल में
बेटे से पिता
खोता जाता हूँ
अल्हड़पन, लड़कपन
होता जाता हूँ
एक बच्चे से आदमी।

गौण होते जाते हैं
अपने सपने, अपनी खुशियाँ,
अपनी आज़ादी, अपने अनमोल पल
अपना एकान्त, अपना अस्तित्व।

होते जाते हैं महत्वपूर्ण
परिवार और दुनियादारी
पत्नी के सुख दुख की परवाह ,
माँ की बीमारी की चिन्ता
घर का लोन,
बच्चों की पढ़ाई
रिश्तों को सहेजने की चिन्ता,
और न जाने क्या कुछ।

अचरज की बात है
फिर भी तैरती रहती है
चेहरे पर दिव्य मुस्कान
और संतोष की ख़ुशी
पिता का कोट पहनते ही।

पहनते ही बाबूजी का कोट
भर जाता हूँ
अनकहे प्रेम से
वात्सल्य से और
आश्चर्यजनक खुशी से।
बच्चों की खुशी में खुशी,
पत्नि की मुस्कान में खुशी,
माँ के आशीर्वाद में खुशी,
ज़िम्मेदारियाँ निभाने में खुशी,
तंगहाली में खुशी
खुशहाली में खुशी।

पहनते ही पिता का कोट
भर जाता हूँ अदम्य साहस से
कर जाता हूँ सामना
किसी भी आपदा से
ढूँढ लेता हूँ हल
हर समस्या का,
जूझ लेता हूँ
किसी भी त्रासदी से।

निकाल फ़ेकना चाहता हूँ
कई बार
पिता का कोट
और हो जाना चाहता हूँ
स्वतंत्र और उन्मुक्त
भाग जाना चाहता हूँ अतीत में
यार दोस्तों के संग
काॅलेज के मौलसरी के पेड़
के नीचे चबूतरे पर
या फिर खुले आसमान के तले
नहर की पुलिया के मुंडेर पर।

पर न जाने क्या हो जाता है
नहीं फ़ेक पाता हूँ
बाबूजी का कोट ।

बावज़ूद तमाम ज़िम्मेदारियों के
अनायास ही,
बस मुस्कुराता रहता हूँ
पहनकर पिताजी का कोट।

Last Updated on March 27, 2026 by srijanaustralia

  • सन्तोष कुमार झा
  • अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक
  • कोंकण रेलवे
  • [email protected]
  • कोंकण रेलवे, मुंबई
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