हरिराम भार्गव “हिन्दी जुड़वाँ” की दो कविताएं
1 एक बार तुम नदी बन जाना बड़ी मासूम हैं मन की हसरतें कभी कहती नहीं सुनती भी नहीं पर बयां कर देती है दिल की सारी बातें फिर […]
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अरमानों की गाँठ (एक स्त्री का सामाजिक जीवन परिवार की जिम्मेदारियों के सान्निध्य में घिरा होता है, स्त्री अपने पारिवारिक सदस्यों के अरमानों को सजाने के लिए निस्वार्थ लाभार्थी
प्रिय मैं तुमसे भिन्न हूँ कहाँ (प्रत्येक प्रियतमा अपने प्रियतम की छवि होती है, अपने प्रियतम में सागर की जल धारा बनकर संग -संग चलती है, इसी संदर्भ में प्रस्तुत
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