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हरिराम भार्गव “हिन्दी जुड़वाँ” की दो कविताएं

1 एक बार तुम नदी बन जाना

 

बड़ी मासूम हैं 

मन की हसरतें

कभी कहती नहीं 

सुनती भी नहीं

पर बयां कर देती है

दिल की सारी बातें

फिर दूरियों की 

परिधि खत्म कर

होता है मिलन

निर्झर का नदी से

इसी जलधार की

शीतलता में 

नाद होता है

गुनगुनाने लगती है

नदी, प्यार की 

गहराई नापती हुई

कहती है फिर

निर्झर से,

एक बार तुम 

नदी बन जाना

एक बार फिर से

पहली बार की तरह

मेरी सांसों में घुल जाना

बस एक बार तो

तुम भी नदी बन जाना

 

2 अस्तित्व

 

मेरे होने न होने का 

कहा नहीं जा सकता

पर तेरे होने से ही

मेरे होने का अस्तित्व है

 

मैं खुश हूँ या उदास

पता नहीं पर 

सत्य है तेरी ख़ुशी ही

मेरी खुशियों का अस्तित्व है

 

मैं लिखने लगा कविताएँ

आजकल पर 

पर तेरे लिखने में ही

मेरे शब्दों का अस्तित्व है

 

तुम्हें नींद कहाँ आती है

मेरे बिना, अकेले

पर किसी के साथ हूँ अकेला

तेरा साथ ही अस्तित्व है

 

होगी मतलबी दुनिया सारी

हो जाती हो तुम भी निराश

पर मैं न मतलबी हूँ न निराश

मुझमें तो तेरा ही अस्तित्व है

 

बात सुकून की करते हैं तो

सुकून तुझ पर ठहर जाता है

तेरा मेरा क्या है,पर

तेरा सुकून ही मेरा अस्तित्व है

 

 

 

कवि परिचय

 

हरिराम भार्गव “हिन्दी जुड़वाँ”

 

हिन्दी शिक्षक, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली

9829960782 [email protected]

माता-पिता- श्रीमती गौरां देवी- श्री कालूराम भार्गव 

प्रकाशित रचनाएं- 

जलियांवाला बाग- दीर्घ कविता (द्वय लेखन जुड़वाँ भाई हेतराम भार्गव के साथ- खंड काव्य)

मैं हिन्दी हूँ- राष्ट्रभाषा को समर्पित महाकाव्य (द्वय लेखन जुड़वाँ भाई हेतराम भार्गव के साथ- -महाकाव्य)

साहित्य सम्मान – 

स्वास्तिक सम्मान 2019 – कायाकल्प साहित्य फाउंडेशन नोएडा, उत्तर प्रदेश 

साहित्य श्री सम्मान 2020- साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्थान, मुंबई महाराष्ट्र 

ज्ञानोदय प्रतिभा सम्मान 2020- ज्ञानोदय साहित्य संस्था कर्नाटक 

सृजन श्री सम्मान 2020 – सृजनांश प्रकाशन, दुमका झारखंड

कलम कला साहित्य शिरोमणि सम्मान 2020 – बृज लोक साहित्य कला संस्कृति का अकादमी आगरा

 

आकाशवाणी वार्ता – सिटी कॉटन चेनल सूरतगढ, राजस्थान भारत 

काव्य संग्रह शीघ्र प्रकाश्य- 

वीर पंजाब की धरती (द्वय लेखन जुड़वाँ भाई हेतराम भार्गव के साथ- – महाकाव्य)          

तुम क्यों मौन हो (द्वय लेखन जुड़वाँ भाई हेतराम भार्गव के साथ- -खंड काव्य)  

उद्देश्य– हिंदी को सरकारी कार्यालयों में लोकप्रिय बनाना।




अरमानों की गाँठ

 

अरमानों की गाँठ

(एक स्त्री का सामाजिक जीवन परिवार की जिम्मेदारियों के सान्निध्य में घिरा होता है, स्त्री अपने पारिवारिक सदस्यों के अरमानों  को सजाने के लिए निस्वार्थ लाभार्थी बनकर तत्पर  लगी रहती है, अपने अरमानों की गाँठ समेटे हुए हैं । सभी स्त्रियों को समर्पित हैं – अरमानों की गाँठ)

 

हर बार बाँध लेती

पल्लू में गाँठ अपने

समेट रही हो जैसे

आधे अधूरे सपने

 

खुल न जाए गाँठ कभी

इस कदर उसको कसती है

एक छोटी सी गाँठ में

अरमान छिपाए रखती है

 

सुबह से लेकर रात ढले

घर भर को जीवन देती है

अपने बच्चों कि खातिर

खुद को तर्पण करती है

 

अपनों के जब हो सपने

हो परेशान जब उनके अपने

घर भर की ले जिम्मेदारी

शिकायत कभी न करती है

 

उठती सबसे पहले घर में

देर तक फिर जगती है

सबकी सुविधाओं को देखे

गाँठ फिर जोर से कसती है

 

अपना माथा तप रहा

ध्यान कहाँ ही रखती है

कर्तव्य मार्ग बढ़ती जाती

ममता से सबको ढकती है

 

बाबा की बिटिया ने भी

कुछ ख्वाब संजोए थे अपने

याद कभी जो आए तो

निहार वो घर को लेती है

 

हर पल सबको तैयार खड़ी

मुँह आह कभी न सुनती है

मन कभी जो भटके भी तो

फिर गाँठ बाँधकर चलती है

 

कवयित्री परिचय –

 

मीनाक्षी डबास “मन”

प्रवक्ता (हिन्दी)

राजकीय सह शिक्षा विद्यालय पश्चिम विहार, शिक्षा निदेशालय राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली भारत

Mail Id

[email protected]

 

माता -पिता – श्रीमती राजबाला श्री कृष्ण कुमार

 

प्रकाशित रचनाएं –  घना कोहरा, रिमझिम  मोबाइल देवता,4 नया सवेरा (हाईकू), 5 बादल, 6 मेरी सहेलियां भाग -1, 7 शब्द संसार, 8 मेरी सहेलियां भाग- 2, 9 पगडंडियां, 10 मजदूरों की मजदूरी, 11 सीढ़ी, 12 धागा, 13 स्त्रियों के बाल, 14 रेखाओं में मजदूर, 15 वीर राणा प्रताप, 16 भारत के पूत, 17 नवजीवन वरदान, 18 कोरोना काल, 19 गढ़वाल राइफल का वीर 20 मृग तृष्णा,21 बन शक्ति,22 शाख से छूटा पत्ता,23 लो थाम प्रिय, 24 बेटी,  25 मुझे उस ओर जाना है, 26 कौन हो तुम, 27 प्रिय छवि, 28 कुछ कोलाब, 29 मेरे राम, 30कौन दिसा के वासी तुम?,31 अरमानों की गाँठें,32नेता जी

 

उद्देश्य – सरकारी कार्यालयों में कामकाज की प्राथमिक भाषा बनाने हेतु हिंदी का प्रचार – प्रसार l




प्रिय मैं तुमसे भिन्न हूँ कहाँ

प्रिय मैं तुमसे भिन्न हूँ कहाँ

(प्रत्येक प्रियतमा अपने प्रियतम की छवि होती है, अपने प्रियतम में सागर की जल धारा बनकर संग -संग चलती है, इसी संदर्भ में प्रस्तुत है – “प्रिय मैं तुमसे भिन्न हूँ कहाँ “)  

प्रिय मैं तुमसे भिन्न हूँ कहाँ
तुम जहाँ चले मैं हूँ वहाँ

तुम जो गहरा सागर विशाल
मैं तुमसे मिलती जल की धार
हृदय तुम्हारा अनंत असार
मैं उठती उसमें लहर सितार

तुम बदरा के गहराते घन
मैं तुझ में व्याप्त बन बूँद साकार
तुम चले दिशा अनंत विस्तार
मैं बनी हवा तुम संग संसार

तुम उपवन से भरे बिखरते
मैं समा रही बन तंतु आकार
सुरभित फूलों से जो रंगाकार
खुशबू तुम्हारी काम मैं आधार

तुम सूर्य से उदित आकाश
मैं फैली बन किरणों का जाल
तुम कमल दल श्वेत वितान
मैं जुड़ी रहूं बन तुझमें नाल

तुम पूर्णमासी के पूर्ण चंद्रमा
मैं शीतलता बनी पंख पसार
घटते बढ़ते तुम पाते पार
सिमटती तुझमें ले रूप आकर

तुम पर्वत सम कठोर समान
मैं नदी बन भेदती बन हृदय हार
चोटियां तेरी गगन विस्तार
हिम बन बरसती मैं हर बार

तुम वसुधा वत्सल दामन
मैं बीज तेरा गर्भ संसार
जीवनदायी देते तुम सब रस
बन पौध मैं फूटी लघुकार

प्रिय मैं तुमसे भिन्न हूँ कहाँ
तुम जहाँ चले मैं हूँ वहाँ

कवयित्री परिचय –

मीनाक्षी डबास “मन”
प्रवक्ता (हिन्दी)
राजकीय सह शिक्षा विद्यालय पश्चिम विहार, शिक्षा निदेशालय ,राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली भारत
Mail Id
[email protected]

माता -पिता – श्रीमती राजबाला श्री कृष्ण कुमार

प्रकाशित रचनाएं – घना कोहरा, रिमझिम मोबाइल देवता,4 नया सवेरा (हाईकू), 5 बादल, 6 मेरी सहेलियां भाग -1, 7 शब्द संसार, 8 मेरी सहेलियां भाग- 2, 9 पगडंडियां, 10 मजदूरों की मजदूरी, 11 सीढ़ी, 12 धागा, 13 स्त्रियों के बाल, 14 रेखाओं में मजदूर, 15 वीर राणा प्रताप, 16 भारत के पूत, 17 नवजीवन वरदान, 18 कोरोना काल, 19 गढ़वाल राइफल का वीर 20 मृग तृष्णा,21 बन शक्ति,22 शाख से छूटा पत्ता,23 लो थाम प्रिय, 24 बेटी, 25 मुझे उस ओर जाना है, 26 कौन हो तुम, 27 प्रिय छवि, 28 कुछ कोलाब, 29 मेरे राम, 30कौन दिसा के वासी तुम?,31 अरमानों की गाँठें,32नेता जी

उद्देश्य – सरकारी कार्यालयों में कामकाज की प्राथमिक भाषा बनाने हेतु हिंदी का प्रचार – प्रसार