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डॉ. शैलेश शुक्ला

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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
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मीनाक्षी डबास ‘मन’ की कविता – ‘स्त्रियों के बाल’

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स्त्रियों के बाल
कविता है स्वयं
जब सुलझाती उनको
मानो चुने जा रहे शब्द
एक-एक लट की तरह।

लहराते हैं जब
खुले बाल हवा के संग
मानो बहे जाते शब्द
छंद के नियम पर
कुछ कहे जाने को।

एक तारतम्यता में
बंधना बालों का
चोटी के अंग
मानो शब्द बहते हों
रस के आंगन।

वो जब बाँधती
जुड़ा उन्हें सहेजने को
न बिखरने देने को
मानो यति-गति से
बने शब्दों में संतुलन।

बालों को संवारती
सजाती बहुरंग
लिए बहु साधन
मानो शब्दार्थ सजे हों
अलंकार का ले आभूषण।

मीनाक्षी डबास “मन”
प्रवक्ता (हिन्दी), राजकीय सह शिक्षा विद्यालय पश्चिम विहार शिक्षा निदेशालय दिल्ली भारत

प्रकाशित रचनाएं – घना कोहरा,बादल, बारिश की बूंदे, मेरी सहेलियां, मन का दरिया, खो रही पगडण्डियाँ l
ईमेल पता : [email protected]

Last Updated on October 25, 2020 by adminsrijansansar

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