सुनहरी सजीली भोर, सुहानी नहीं आई,
तरुणों में उत्साह की, रवानी नहीं आई।
नवयुवक को नभ देख रहा है आशा से,
जिंदगी चलने लगी, जिंदगानी नहीं आई।।
लिखनी तुम्हें अपनी, कहानी नहीं आई,
चादर प्रेम – स्नेह की, बिछानी नहीं आई ।
निसंदेह हुए हो सम्मुख, तुम इस वतन से,
आबरू तुम्हें वतन की, बचानी नहीं आई ।।
हृदय की प्रबल अनल, जलानी नहीं आई,
सत्य चक्षुजल की धारा, बहानी नहीं आई ।
विस्मृत कर दिया, जनहित इस समाज से,
जवान तो हो गए, पर जवानी नहीं आई ।।
देशद्रोह की जड़ें, हिलानी नहीं आई,
विद्रोह की चट्टानें, गिरानी नहीं आई ।
अविराम प्रवाहित, रक्त-धारा धरा से,
लुटना सीख गये, कुर्बानी नहीं आई।।
लेखक – उमेश पंसारी, सीहोर, मध्यप्रदेश
Last Updated on May 6, 2021 by umeshpansari123
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