मेरे हमसफ़र
मैं तेरी जीवनसंगिनी तू मेरे सिर का ताज
कल की विपदा सोच क्यों खोये हो आज
साथी हूँ तेरे पथ की हरपल चलूं तेरे संग
कौन झूठलाए प्रेम बंधन जो तेरा मेरे संग
प्रेम चाह में जलना, पतंगा शम्मा में जल जाए जैसे
प्रेम हो भंवरे का मिलना फूलों में सिमट जाए जैसे
प्रेम अमर है मुझसे तेरा, फिर खो ना दूं क्यों लगता है ?
अटूट विश्वास तुझ पर,फिर ना जाने मन क्यों डरता है ?
ओ मेरे हमसफ़र तेरे कदमों पर चलना चाहूं
तुझ में खोकर तेरी होकर रहना चाहूं
भूल गई सब साथी संगी, जब हुआ तेरा दीदार
एक तरफ दुनिया के सारे सुख, दूजी ओर तेरा प्यार
जी चाहता है जीवनभर प्रेम ज्योति जलाऊं
तेरे प्रेम की धुन में मग्न हो, कोई गीत गुनगुनाऊंँ
तू मेरे मन की संवेदना, लिखना चाहूं शब्द नहीं है इतने
सोच ना पाओगे तुम, मुझमें बसे हो तुम कितने?
तुझ संग जीवन, तुम बिन तड़पन
सुख पाऊं तुमसे सारे, तुझको जीवन अर्पण
मुख जब भी देखूँ मेरे प्रिय को, मानो सूर्य का तेज
तुझ में बसै ज्यों सांवरा, मेरे मन बसे पिया रंगरेज
कवयित्री
पिंकी ‘हरि’ भार्गव
माता पिता- श्रीमती सुमित्रा, श्री मनीराम भार्गव
हिंदी भवन
कराला दिल्ली
Last Updated on April 4, 2021 by bhargavahari22
- पिंकी 'हरि' भार्गव
- गृहणी
- स्वतंत्र कवयित्री
- [email protected]
- हिंदी भवन कराला दिल्ली








3 thoughts on “मेरे हमसफ़र”
बहुत अच्छा लगे रहो
Woe
बहुत सुंदर प्रेम पर लिखी कविता 🙏👍👍