न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु , “स्त्री जीवन का सफर”

Spread the love
image_pdfimage_print

“स्त्री जीवन का सफर”

पलकों के झपकने में

जितना वक्त लगता है

उतना ही वक्त लगता है

एक स्त्री की जिंदगी को

मौत तक पहुँचने में

देखिए जरा

उसकी हत्या 

कितनी बार होती है? 

और कहाँ कहाँ से? 

एक स्त्री जब माँ के गर्भ में पलती है

तकनीक उसकी जाँच करती है

गर्भ में पल रही बेटी के नाम पर

माँ फिर से मौत के दरवाजे देखती है

लड़ती है अपनी बेटी के लिए

घर परिवार से

समाज से

फिर हार जाती है

और उसके गर्भ में पल रही बेटी 

मार दी जाती है

यहाँ स्त्री एक बार फिर से

काल के गोंद में चली जाती है

पैदा हुयी स्त्री

जब अपने नवयौवन तक पहुँचती है

समाज की नजरों में

एक बार फिर से मर जाती है

उनके कटार जैसे शब्दों से कटती है

अपनी इज्जत बचाती है

और अपने आपमें एक स्त्री

फिर से मर जाती है

पिता और भ्राता की अंकुश को तोड़कर

अपने दायरे से बाहर

जब निकलती है स्त्री

तो एक बार फिर से मर जाती है

प्रेम की गहराई में

जब डूबती है स्त्री

अपने प्रेमी को जाहिर

करती है स्त्री

तो एक बार फिर से मर जाती है

उसके अन्तर्मन को जाने बिना

एक मन्त्र के माध्यम से

पराये के घर में फेंकी जाती है स्त्री

तो एक बार फिर से मर जाती है

उस पति के इशारे पर नाचती स्त्री

आवाज उठाती है अगर

विरोध करती है स्त्री 

तो समाज की नजर में

एक बार फिर से मर जाती है

और किसी कारण बस

पति की मौत हो जाए 

तो मृत पति के चिता पर

जलायी जाती है स्त्री

वहाँ एक बार फिर से मर जाती है

विधवा स्त्री अगर जिंदा है

तो समाज के हर कोने -कोने में 

उसकी शून्यता बरकरार है

स्त्री होकर भी वो मर गयी है

अपने अस्तित्व को खोकर रह गयी है

स्त्री के नाम पर

उसके सफर की घड़ी

यहीं आकर रूक गयी है |

 

  के.एम.रेनू

  शोधार्थी

 हिंदी विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय

 

 

 

 

Last Updated on January 7, 2021 by renujnu2016

  • के.एम.रेनू
  • शोधार्थी
  • दिल्ली विश्वविद्यालय
  • [email protected]
  • vill-arangi,post-oini mishra,dist-sonbhadra (U.P) 231216
Facebook
Twitter
LinkedIn

More to explorer

प्रतीकात्मक छवि

साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिद्वन्द्विता की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार बनाने का उपक्रम है यह सम्मेलन-डॉ विकास दवे

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱 साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिद्वन्द्विता की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार बनाने का उपक्रम

प्रतीकात्मक छवि

मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा साहित्यिक पत्रिकाओं

प्रतीकात्मक छवि

जरूरी और उपयोगी है संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर प्रशिक्षण और संपादकों के बीच आपसी विमर्श – डॉ. शैलेश शुक्ला

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱 जरूरी और उपयोगी है संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर प्रशिक्षण और संपादकों के

Leave a Comment

error: Content is protected !!