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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

मनीष खारी की नई कविता -मेरे बच्चों के लिए

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जिस दिन तुम खुद को अकेला पाओ,

घबराओ ,डर जाओ और

उसका सामना ना कर पाओ।

उस दिन एक बार हिम्मत करके

अपने माता -पिता के पास जाना

हो सकता है तुम्हें थोड़ा -सा अजीब लगे

लेकिन उनके गले लग जाना।

तुम्हारा माथा सहलाएंगे,

सब समझ जाएंगे

जिस दिन असफल हो जाओ , 

फिर से खड़े ना हो पाओ

पूरी दुनिया को अपने खिलाफ पाओ,

उस दि न हिम्मत करके, स्कूल चले जाना

हो सकता है तुम्हें थोड़ा -सा अजीब लगे

लेकिन टीचर से मिलना ,दोस्तों को याद करना,

बचपन जहाँ बिताया उस नर्सरी विंग में जाना

ढूँढना अपने सबसे प्यार शिक्षक को,

 उसके सामने खड़े हो जाना

वो थपथपाएगा तुम्हारी पीठ ,तुम्हें देगा शाबाशी 

और सब ठीक हो जाएगा।

जिस दिन कुछ समझ ना पाओ ,हँसते -हँसते रोने लग जाओ

आँखों के सामने सिर्फ़ अँधेरा ही पाओ

उस दिन हिम्मत करके अपने भाई -बहन के पास जाना 

हो सकता है तुम्हें थोड़ा -सा अजीब लगे

लेकिन,उनके साथ बचपन याद करना ,

कैसे लड़ते थे ,खेलते थे ,गिरते थे , सब सुनना सुनाना

 तुम्हारे कंधे पर उनका हाथ होगा,

और देखना सब बदल जाएगा।

जिस दिन तुम हारना चाहो , किसी से मिलना ना चाहो

और हमेशा के लिए गुम हो जाना चाहो

उस दिन हिम्मत करके ,शीशे के सामने खड़े हो जाना

हो सकता है तुम्हें थोड़ा -सा अजीब लगे

लेकिन

खुद से आँखें मिलाना ,आँसू बहाना

दिल खोल कर बातें करना खुद से

चाहे तो झूठे दिलासे देना ,कोई भी हथकंडा अपनाना

लेकिन

खुद को एक बार ज़रूर मनाना।

दिल को मजबूत करना और फिर से बाहर आना

मेरे बच्चों हो सकता है तुम्हें अजीब लगे

लेकिन एक बार यह जरूर आज़माना

 

-मनीष खारी

Last Updated on November 30, 2020 by sukhbirduhantosham

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