न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता

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-सृजन आस्ट्रेलिया ई पत्रिका(प्रेम कविताएँ)
-यही आस अंतिम बाक़ी-
प्यार किया जाता है कैसे,मिले जो तुमसे सीख गए
मोहनी मूरत साँवली सूरत,पर हम तेरी रीझ गए

बच्चों जैसी बातें तेरी,मीठी-मीठी सी मुस्कान
देख सुन लट्टु हो जाए,अलबेला राही अनजान

साहस और हिम्मत है तुझमें,पुरुषों से भी बढ़-चढ़कर
तुमसे मिलकर हमने जाना,प्यार न होता है डरकर

अब तो दिल चाहता है केवल,तेरे संग में ही रहना
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में,बीते अब ये दिन रैना

आओ मिलकर आज करें हम,इक दूजे से ये वादा
शरीर भले ही बिछुड़ें अपने,दिल न होंगे कभी जुदा

प्रेम कहानी लिख जाएँगे,लैला मजनूँ की भाँति
वफ़ा हमारी याद करें सब,यही आस अंतिम बाक़ी।
पूर्णतःस्वरचित मौलिक
राजपाल यादव,गुरुग्राम
9717531426

सृजन आस्ट्रेलिया ई पत्रिका(प्रेम कविताएँ)
-पागलपन-
चाहता हूँ मैं तुमको साथी,मित्र घनिष्ठ बनाना
अपने दिल की गहराइयों में,मूरत तेरी सजाना

मिले मीत ग़र तुम जैसा,मन की बात बतायें
मिल-जुलकर सुख-दुख बाँटे,
एक-दूजे को हर्षायें

अहं मेरा आड़े आता है,तो बेशक आ जाए
किंतु तेरी भोली सूरत, मन-मंदिर बस जाए

तेरा यह व्यक्तित्व निराला,और सुमधुर भावनाएँ
मुझको तो अच्छी लगती हैं,तेरी सभी अदायें

चाहता तो हूँ तुझको अपनी,पलकों बीच बिठाना
तेरी स्मृतियों के साये में,स्वप्न सेज सजाना

चाहने से होता ही क्या है,जब तक तुम ना मानो
मेरी स्वप्निल नगरी को,नहीं जब तक तुम पहचानो

डर लगता है अगर कहीं,तुम बुरा मान जाओगे
इस पागल के ‘पागलपन’ पर,तरस नहीं खाओगे !!
पूर्णतःस्वरचित मौलिक
राजपाल यादव,गुरुग्राम

सृजन आस्ट्रेलिया ई पत्रिका (प्रेम कविताएँ)
-हमें बुला लेना-
जब दिल हो कभी उदास तो हमें बुला लेना
अकेलेपन का हो अहसास तो हमें बुला लेना

सोचता हूँ दिन-रात तेरे भले के लिए
जब कोई ना हो पास तो हमें बुला लेना

भरी जवानी में हुस्न के हज़ारों हैं तामीरदार
ढलती उम्र का हो अहसास तो हमें बुला लेना

मुश्किल है मिलना आज भरोसे का आशियाँ
जब किसी पे ना हो विश्वास तो हमें बुला लेना

इस दौर में रिश्ते निभाना काँटों भरा है ताज
रिश्तों में आ जाए खटास तो हमें बुला लेना

यह उम्र हसीन ख़्वाबों तमन्नाओं की नहीं
फिर भी रखते हो आस तो हमें बुला लेना

ज़िंदगी यूँ अंधेरों में नहीं काटना आसाँ
यदि डर का हो आभास तो हमें बुला लेना

ग़र ज़िंदगी रही तो मिलेंगे ज़रूर
हो कहीं भी तेरा वास हमें बुला लेना
पूर्णतः स्वरचित मौलिक
राजपाल यादव,गुरुग्राम

Last Updated on January 12, 2021 by rajpalyadavcil

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