प्रेम की परिभाषा
प्रेम की पवित्रता परखना हो तो
भगवान की सूरत से परखों
प्रेम छोडने के लिए नहीं
पाने के लिए किया जाता है ।। 1 ।।
प्रेम की आंंधी इन्सान को
राजा से रंक भी बना सकती है
प्रेम तो दो आत्माओं का पवित्र मिलन है
प्रेम ही सच्चा रिस्ता है जिसमें प्यार ही प्यार हैै ।। 2 ।।
प्रेम को पाने के लिए जान की आहुती तक देनी पडती है
तब कोई प्रेम की ज्योती जगमगाती है
प्रेम की गहराई सात समुंदर से गहरी है और हिमालय से भी उॅँँची है
प्रेम काेे गर सच्चा प्रेम मिले तो जीवन स्वर्ग ही स्वर्ग बन जाता हैै ।। 3 ।।
Last Updated on January 11, 2021 by msk6009
- महादेेेव एस कोलूर
- निवृृृृत्त राजभाषा अधिकारी एवं सदस्य सचवि नराकास बागलकोट
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