पूरब से पश्चिम तक
उत्तर से दक्षिण तक
सबको पिरोती एक डोर में
इसलिए सूत्रधार बनके चमकेगी हिंदी की बिंदी।
अलग-अलग जाति, धर्मों के लोग यहाँ
भिन्न-भिन्न प्रांतों के भिन्न त्योहार यहाँ
इतनी विविधता होने पर
एकता बनके चमकेगी हिंदी हिंदी की बिंदी।
जन-जन के भावों को दर्शाती
राष्ट्र को एक पहचान दिलाती
यह मधुर-मनमोहन, यही मनभाती
इसलिए मातृभाषा बनके चमकेगी हिंदी की बिंदी।
बचपन से बच्चे की बोली बन जाती
नैतिक मूल्य भी यही सिखाती
सबके ज्ञान में वृद्धि कर जाती
इसलिए शिक्षा बनके चमकेगी हिंदी की बिंदी।
प्रेमचंद, भारतेंदु, अज्ञेय, चौहान और त्रिपाठी
तत्सम, तद्भव, देशी, विदेशी सबको अपनाती
आदि से अब तक का इतिहास बताती
इसलिए साहित्य बनके चमकेगी हिंदी की बिंदी।
आओ मिलकर इसको फैलाएँ
विश्व में इसका नगाड़ा बजाएँ
इसे जन-जन की आवाज़ बनाएँ
तभी तो सूरज बनके चमकेगी हिंदी की बिंदी।
Last Updated on November 30, 2020 by srijanaustralia
- पूनम शर्मा
- हिंदी शिक्षिका एवं लेखिका
- स्वतंत्र
- [email protected]
- केंगेरी, बेंगलुरू, कर्नाटक, भारत







