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सुखबीर दुहन की नई कविता- हालात-ए-किसान

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हालात ए किसान

यह जो तेरे घर में अन्न आया है।
जरा सोचो किसने पसीना बहाया है।
चाह मिटायी , चिन्ता पाई , चैन की नींद ना आई,
तुझे दिया, खुद न खाया, बासी रोटी से भूख मिटाई।
भोर उठा , मुंह न धोया ,मिट्टी से सनी काया ,
फटे कपड़े टूटी चप्पल ,आदर भी ना पाया।
दीनहीन लगता रहता, हाथ में न कमाई,
खेत-खलिहानों में ही पूरी जिंदगी बिताई।
थका मांदा लगा रहता ,इसने ना चैन पाया,
कभी सूखा ,कभी बाढ़, ओलों ने बड़ा सताया।
जलती धूप , चमकती बिजली, ठंड इसे काम से न रोक पाई,
स्वयं ना बचे भले तूफानों से, मगर अपनी फसल बचाई ।
यह जो तेरे घर में अन्न आया है,
एक किसान ने पसीना बहाया है।

-डॉ. सुखबीर दुहन, हिसार

Last Updated on December 4, 2020 by hisarsushil

  • डाॅ. सुखबीर दूहन
  • सहायक प्रोफेसर ,
  • SRIJAN AUSTRALIA
  • [email protected]
  • राजकीय स्नातोकोत्तर महावि़द्यालय,हिसार ,हरियाणा
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