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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

“प्रेम-काव्य प्रतियोगिता”

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प्रेम
— — — —
प्रीत पुरातन रीत रही मन मीत नही जग है दुखदाई।
खोल कहे मन की जिस बात को प्रेम बिना नजदीक न आई।।
प्रेमविहीन जिको उर जानहुँ बंजर खेत समान कहाई।।।
प्रेमबिना जग में कछु नाहिन वो दिल पत्त्थर रूप अंगाई।।1।।

जानहुँ वेश आभूषण धारहुं भाल न जा लग काढत टीका।
नैन न फाबत काजल के बिन बैन न मृदुल भाव सलीका।।
नेह बिना निज गेह जंचे किमि स्वाद न देवहि भोज न तीखा।।।
प्रेम बिना सब शून्य बराबर मानुस जीवन लागत फीका।।2।।

तात स्वभाव उग्र दिखही मन भीतर प्यार उबाल भरे हो।
मात सदा ममता दरसावत ले सुध सार-संभाल करे हो।
भ्रात कहे भगिनी बतलावत भ्रात को भ्रात हि ख्याल करे हो
प्यार पितामह बेहद राखत प्रेम प्रिया को बेहाल करे हो।।3।।

प्रेम रूलावत प्रेम हंसावत प्रेम दिखावत रूप जु नाना।
प्रेम बुलावत औ अकुलावत प्रेम सदा बुनवै मन ताना।।
प्रेम हिये सुर तान अलापत गावत है मन ही मन गाना।।।
प्रेम बिना सब नीरस लागत प्रेम ही भक्ति रूप रिझाना।।4।।

नौकर-चाकर औ सुविधा सब देख नही मन को हर्षावै।
कार मकान दुकान सबै लख-कोटिन संपत्ति धूल कहावै।।
प्राण प्रिया बिन ये जियरा तड़पे पल एक न चैन न पावै।।।
जोहत बाटन आंख तकी रह घेर वियोग की पीड़ सतावै।।5।।

संगत की उखड़े सब रंगत यो मनडो फिर कै विधि लागै।
बात-चर्चा कछु और करे पर प्रेम नही मन दूरहि भागै।।
आदर के बिन हाथ बढ़ेय न भोज बत्तीस रखे भल आगै।।।
प्रेमहि है अनमोल सबै कहि प्रेम यकायक प्रेम हि मांगै।।6।।

प्रेम बिना असरंग जंचे न धमाल संगीत न ताल-तरानों।
बेसुर लागत गायक- पायक मंच-पंडाल सबैहि बिरानों।।
औपत-सौपत नाहिं नजारन नृतक को नव नृत दिखानो।।।
प्रेम बयार चलै न जहाँ उस ठौर न भूल करैय न जानो।।7।।

प्रेम लुटे धन प्रेम लुटे मन प्रेम लुटे तन संपति सारी।
प्रेम बंसी सुन मोहि सबै ब्रज-गोकुल गांवन की नर-नारी।।
प्रेम अगाध सपूत वियोग उच्चारत राम को प्राण गंवारी।।।
प्रेमन के वस वा चकवी रह जाग्रत रैन बिताय बिखारी।।8।।

बारन बार न मानुस जीवन है अनमोल जु प्रेम-खजाना।
संत भक्त बिरला बस प्रेम की कीमत प्रेयसि-प्रेमिहि जाना।।
प्रेम कराय सर्वस्व अर्पण पराजय होत महाबलवाना।
प्रेम निगाह डिगाय हियो बस मार प्रभावहि भान भुलाना।।9।।

प्रेम अगाध सदा हर को अमिया बिन ना पल एक रहाई।
गोपिन के बिन कृष्ण रह्यो कद याद करी मुरली धुन गाई।।
विष्णु रह्यो न रमा बिन देखहुँ है चित्र पाँव पखारति पाई।।
नाम नरायन की रट टेरत नारद के मन प्रेम समाई।।10।।

प्रेम वही मन पाक सदा अरु वंचकता रति अंश नहीं हो।
भ्रात,पिता,पुत्र मातुल कोउक आदत को बस कंस नही हो।।
काक स्वभाव लगार न भावहि हो गुणवान तो हंस कही हो।।
मीत वही दिल मानवता बस दानववृति का वंश नही हो।।11।।

नैन लुभावन बैन सुहावन चैन नहीं जियरा कलपावै है।
प्राण प्रिया हर प्राण गयी गत मीन समी जल हीन कहावै।।
याद सतावत नींद न आवत मोहनि मंत्र विधा गई बावै।।।
खान न पान न अंग न लागत प्राण प्रिया बिन नाहि सुहावै।।12।।

— जबरा राम कंडारा

Last Updated on January 16, 2021 by jabraramkandarasaheb

  • सदस्य
  • जबरा राम कंडारा
  • शिक्षक संघ,राजस्थान
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