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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

डॉ. नानासाहेब जावळे की कविता – “समाज और व्यक्ति”

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व्यक्ति और समाज का संबंध

है पेड़ और भूमि जैसा 

व्यक्तित्व रूपी पेड़ समाज रूपी भूमि पर

खूब फूलता-फलता हो जैसा। 

व्यक्ति और समाज 

हैं दोनों पारस्परिक 

एक दूसरे के बिना 

हैं दोनों का अस्तित्व मुश्किल। 

नहीं होता व्यक्ति के बिना 

समाज का कोई अस्तित्व अपना 

और नहीं रह सकता है व्यक्ति 

समाज के बिना कभी सुरक्षित। 

व्यक्ति के अपने दो हाथों के सिवा 

होते हैं उसके पीछे खड़े हजारों हाथ 

वे व्यक्ति का जीवन हैं संवारते

उसका जीवन स्वस्थ बनाते। 

सुबह से लेकर देर रात तक 

करते हैं जो हमारी आवश्यकता पूर्ति 

वही समाज के देनदार 

सही मायने में हमारे समधी। 

होगा कोई डॉक्टर, पुलिस या सैनिक 

अथवा होगा दूधवाला, सब्जीवाला या दुकानदार 

अगर बंद कर दे यह सारे अपना काम

इनके बिना जीवन होगा दुश्वार। 

जीवन एक शास्त्र, कला और धर्म है 

उसे जीते-जीते हम सीख जाते हैं 

जियो और जीने दो के तत्वानुसार 

हम सुखी-समृद्ध जीवन बनाते हैं। 

व्यक्ति बना रहे इंसान 

अन्यों से बनाए रखे सुसंवाद 

जनहित देखे स्वांत सुख के परे 

तब कहलाए वह नर का नारायण। 

लेकिन व्यक्ति, खोकर अपनी विवेक शक्ति 

हो धर्मांध या घिनौनी राजनीति से प्रभावित 

कार्य करें मानवता विरोधी 

तब कहलाए वह स्वार्थी-पाखंडी। 

अनेक बार निष्ठा के नाम पर व्यक्ति 

गिरवी रखकर अपनी प्रज्ञा शक्ति 

छोड़ दे राह इंसानियत की 

खूब हानि होती है मानवता की। 

निश्चित ही व्यक्ति 

इकाई है, समाज की 

फिर भी स्वाभाविक विशेषताएं उसकी 

बनाती है पहचान उसके अस्तित्व की। 

भूल न जाए व्यक्ति अपना स्वत्व 

खो न दे वह अपना अस्तित्व 

कर जीवन मूल्यों का स्वीकार 

करता रहे मानवता का प्रचार-प्रसार।

लेकिन आज समाज में 

व्यक्ति का आदर होता है तब तक 

उसके पास बहुत सारा 

पैसा होता है जब तक। 

अतः अब व्यक्ति का लक्ष्य 

बन गया है मात्र पैसा 

भौतिक संपन्नता के पीछे 

देखो भाग रहा है, वह कैसा? 

आज पैसा ही समाज का 

ईश्वर बन जाने के कारण 

सच्चे समाज हितैषी, जीवन मूल्यों के निर्माता 

उपेक्षित बन गए हैं, यह सब जन।

समाज जिसे आदर्श मानेगा 

व्यक्ति उसका अनुसरण करेगा 

मानवता की भलाई के लिए 

दोनों को ही बदलना होगा।

अतः स्वार्थ, धर्मांध, कूटनीतिज्ञों से बचकर 

हमें मानव बने रहना होगा 

व्यक्तिगत लाभ-हानि का त्यागकर 

मानवता को महत्व देना होगा।

सहयोगी प्राध्यापक, सुभाष बाबुराव कुल कला, वाणिज्य व विज्ञान महाविद्यालय केडगांव, तहसील – दौंड, जिला – पुणे, महाराष्ट्र, भारत

संपर्क : E-mail- [email protected]दूरभाष 7588952404

Last Updated on October 20, 2020 by srijanaustralia

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