न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

एल सी कुमार की पाँच कविताएँ

lc kumar
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           1 मैं कौन हूं

मैं अजनबी हूं लिखना मेरा शौक है

लोग कहते हैं मैं कवि हूं

सुबह उठ कर धोता हूं अंधकार

किरणों से करता हूं प्रकाश

लोग कहते हैं मैं रवि हूं

यूं तो करता हूं मैं मदद अक्सर

लोगो लोगों के बीच फंसकर

करता हूं समस्याओं का समाधान अक्सर

लोग कहते हैं मैं अनुभवी हूं

कौन कहता है आसान है जिंदगी

बड़े संभाल कर करनी होती है बंदगी

सही मायनों में परेशानी से जूझता है इंसान

शायद इसी को कहते हैं असली जिंदगी

जी तो लेता मैं भी अगर आसान होता

जर जमीन कारवां आम होता

लगती है चीजें सवारने को

बन जाता नवाब अगर साजू समान होता

सोच कर उठता हूं रोज कि आज क्या करें

जिए नई जिंदगी या रोजमर्रा की तरह मरे

कर लूंगा काम मेहनत से सभी

फिर भी ऐसो आराम है मुझ से परे

क्यों होना परेशान जब कोई काम नहीं आसान

चलो चलें, करले मेहनत इसी दरमियान

करेंगे काम मेहनत ईमानदारी से

बस यही तो है मेरा अरमान

काट लेंगे बची कुची जिंदगी को

भूलकर द्वंद्व शर्मिंदगी को

छूकर उम्मीदों की बुलंदगी को

कर लो जीवन अपनी मुट्ठी में

अब बचा नहीं कुछ आसान

क्या हुआ, कुछ समझे मेहरबान

 

    2 सरकारी नौकरी

 

बढ़ती जा रही है बेकारी

नौकरी चाहिए सरकारी

घट रही है शिक्षा बढ़ रही है भिक्षा

शिक्षा पाना नहीं काम आसान

जाने कितने कोशिश करते

लिखते पढ़ते मेहनत करते

पर सब को नहीं मिलता शिक्षा ज्ञान

जब पड़ जाते हैं बच्चे

ख्वाब देखते अच्छे-अच्छे

कि बस मिल जाए नौकरी सरकारी

कहलायेंगे फिर सरकारी कर्मचारी

लेकिन ख्वाब नहीं थे सच्चे

नहीं आए दिन अच्छे अच्छे

भटक रहे हैं लिख पढ़ बच्चे

लेकर अरमान नौकरी पाने की

जिद है कुछ कर जाने की

जलवा जोश दिखाने की

अपना टैलेंट दिखाने की

यहां बड़ी है मारामारी

बस मिल जाए नौकरी सरकारी

मोल नहीं है ज्ञान का

युग कहते विज्ञान का

घूमने दुनिया सारी

बन बैठे सब व्यापारी

नहीं मिली नौकरी सरकारी

अब चलो निजी क्षेत्र में जाएंगे

वहां अपना लक आजमा आएंगे

और अपने टैलेंट के बल पर यहां तो नौकरी पाएंगे

घरवालों की दो रोटी का शायद इंतजाम कर पाएंगे

यहां पड़े हैं बंद सब काम

नहीं कोई नया निर्माण

मालिक भी अब कर्मचारी

नहीं मिली नौकरी सरकारी

कैसे मिलता हमको काम

 

Entrepreneur भी बेकार पड़े हैं

नौकरी की इंतजार में खड़े हैं

नहीं मिलेगा अब कोई काम

सब तो निजीकरण के पीछे पड़े

और हम भी बेरोजगार हैं

इसीलिए कंपनी के बाहर खड़े हैं

कर लेते व्यापार अगर पैसे होते

बन जाता साधन एरनिंग का

अपना बहुमूल्य समय हम ना खोते

और चल जाता व्यवसाय हमारा

हम ने किसी से कम होते

देखे थे हमने सपने कभी

हम भी उन में से चुन लेते

करके तिरस्कार नौकरी का

अपने सपनों को बुन लेते

यह जीवन है चलते जाने का

पथ पर आगे बढ़ने का

आएंगी मुसीबतें रुक रुक कर

ठहर नहीं जाना पर पथ पर

पा लेना विजय इन सब पर

क्योंकि नया समय अब आने का

छोड़ ना तू कुछ अब कल पर

 

       3 जनप्रतिनिधि

 

चाहिए ऐसा बंदा जिसमें शराफत कम हो

डर की कमी हो और बाजुओं में दम हो

लड़ सके सभी के लिए ना किसी से कम हो

समझ सके सभी को और समझाने का दम हो

सुलझा सके उलझनों को ना कोई भ्रम हो

चाहिए ऐसा बंदा जिसमें शराफत कम हो

और बाजुओं में दम है

कह सके अपनी बात उतना बंदे में दम हो

उलझाएगी दुनिया तुम्हें समझाएगी दुनिया हमें

बात पर टिक जाए जो बंदे में ऐसा फन हो

वजूद ना हो पाए अपना दिखा पाए सबको सपना

निकालें काम अपना राम नाम जपना

ऐसा बंदे का मन हो

चाहिए ऐसा बंदा जिसमें शराफत कम हो

डर की कमी हो और हुनर में दम हो

 

    4 जिंदगी

 

हंसना ना कम कीजिएगा

गमों को कम पीजिएगा

हंसना अगर सीख लिए

जिंदगी मजे से जी लीजिएगा

आ जाए गमों का सैलाब कितना

हंसते हंसते सभी सह लीजिएगा

मुकद्दर में सभी के लिखा है हंसना

जिंदगी के पेचों वह झांसे में नहीं फसना

यह उलझाइगा गमों के दरिया में

किनारों को अपना घर बनाए रखना

मुश्किलें आती,जाती रहती हैं

हंसते हंसते इन्हें अपनी बनाए रखना

छूट जाए गर किनारा हंसने का

दोस्तों से संपर्क बनाए रखना

 

    5 मां की ममता

 

तेरा आंचल मां अलबेला है

मेरा जीवन इसमें खेला है

तू ममता की मूरत है श्याम सलोनी सूरत है

मैं जागूं तू जागे है मेरे पीछे पीछे भागे

तू ऐसी देवी मूरत है

मां तू ममता की सूरत है

मैं रोउ रो तो तू हंसती है

मेरे कन कन में तू बसती है

तू है तो मैं जिंदा हूं

तेरे रहते मैं एक परिंदा हूं

तू मेरा शुभ मुहूर्त है

मां तू ममता की मूरत है

जी चाहे तो उड़ जाऊं

मनचाहे मैं जो खाऊं

तेरा आंगन का मैं नन्ना हूं

कोरे जीवन का एक पन्ना हूं

मुझे तेरी बहुत जरूरत है

मां तू ममता की मूरत है

मेरे दिल में तू मेरे मन में तू

मेरा मान भी तू अभिमान भी

तू देवी मां की मूरत है

मां तू ममता की सूरत है

सब कुछ तो तुमसे सीख लिया

गिर गिर कर चलना सीख लिया

अब घर कोई नया बनाना है

मां तुझको वही बसाना है

तेरे साथ रहूं मैं जीवन भर तक

नहीं लगती ऐसी कोई सूरत है

मां तू ममता की मूरत है,

मां तू ममता की मूरत है

Last Updated on July 30, 2025 by srijanaustralia

  • एल सी कुमार
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