न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

त्योहार परम्परा

Spread the love
image_pdfimage_print

त्योहार परम्परा…
“अरे! यहाँ तो आज सुबह से बच्चे लोहड़ी मांगने ही नहीं आए| मैं तो बच्चों को पंजाब में लोहड़ी कैसे मनाते हैं, दिखाने लाई थी” सिमरन बोली| “इंग्लैंड में अपने बचपन के कईं किस्से इन बच्चों को सुनाए थे तो इन्होंने पंजाब में लोहड़ी मनाने की जिद्द की| मैं तो बच्चों के सामने झूठी पड़ जाऊँगी”, उसने अपनी भाभी से कहा|
भाभी ने कहा अब तो शहरों के ही नहीं, गाँव में भी बच्चे लोहड़ी मांगने को भीख मांगने जैसा समझ शर्म महसूस करते हैं| परंतु चिंता मत करो| हमारी सोसाइटी में लोहड़ी मनाने का कार्यक्रम रखा गया है, बच्चों को वही दिखा देना|
तभी दरवाजे पर सोसाइटी के गार्ड ने घंटी बजाई| उसने दरवाजा खोला गार्ड ने एक छपा हुआ निमंत्रण उसके हाथ में पकड़ा दिया साथ ही दो हज़ार रुपये लोहड़ी मनाने के लिए ले गया| बच्चों ने पूछा तो उस ने उन्हें बताया कि सोसाइटी में नये तरीके से लोहड़ी मनाते हैं इसलिए अभी तो यही देखो|
अगले दिन अपनी भाभी से कहा कि कल शाम को भांगड़ा , गाना -बजाना सब हुआ| पंजाबी भोजन भी स्वादिष्ट था, परंतु कहीं कुछ कमी थी तो पुराने विरसे की कमी थी| यहाँ तो न लोहड़ी में सुंदर- मुंदरिये गाती टोलियाँ दिखाई दी, न ही गली -गली बजते ढ़ोल और जलती होलिका दिखाई दी| लोग एक दूसरे को घर- घर बधाइयाँ देने जाते या लोहड़ी बांटते भी नहीं नज़र आए|
भाभी बोली सही कहती हो, यहाँ कुछ क्लब, सोसाइटी वाले अपने -अपने क्षेत्रों में मिल कर त्योहार मना लेते हैं, घरों में कुछ लोग ज़रूर अपनी परम्परा निभाते हैं, कुछ लोग तो मूंगफली -रेवड़ियाँ खरीद कर खाकर फेसबुक, इंस्टाग्राम और वाट्सऐप पर डाल कर लोहड़ी की शुभकामनाओं का आदान- प्रदान करके त्योहार मना लिया करते हैं|
सिमरन सोच में पड़ गई….”प्राचीन परम्पराओं को आधुनिकता का आवरण धीरे -धीरे एक नया रूप दे रहा है डर है कि हमारे बचपन की यादें भी इसमें कहीं खो न जाएं|”
… प्रेम लता कोहली

Last Updated on January 13, 2021 by premlatakohli

  • प्रेम लता कोहली
  • शिक्षिका
  • प्रणेता साहित्य संगठन
  • [email protected]
  • 123 हिमालय लोक जे. वी. टी. एस. छत्तरपुर नयी दिल्ली
Facebook
Twitter
LinkedIn

More to explorer

प्रतीकात्मक छवि

साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिद्वन्द्विता की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार बनाने का उपक्रम है यह सम्मेलन-डॉ विकास दवे

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱 साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिद्वन्द्विता की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार बनाने का उपक्रम

प्रतीकात्मक छवि

मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा साहित्यिक पत्रिकाओं

प्रतीकात्मक छवि

जरूरी और उपयोगी है संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर प्रशिक्षण और संपादकों के बीच आपसी विमर्श – डॉ. शैलेश शुक्ला

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱 जरूरी और उपयोगी है संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर प्रशिक्षण और संपादकों के

Leave a Comment

error: Content is protected !!