न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सुभाष चंद्र झा ‘अकेला’ की कहानी – ‘कोरोना और मध्यम वर्ग’

Spread the love
image_pdfimage_print

” सुनो जी ! आटा खत्म हो गया है। चावल भी दो दिन और चलेंगे। राशन लाना ही पड़ेगा अब तो। कब तक ऐसा चलेगा। ताज़ी हरी सब्जियां तो लाते नहीं, चार-पाँच आलू बचे हैं , वो भी नाश्ते में पूरे हो जाएंगे।और मकान मालिक ने कल किराए के लिए फोन किया था। बोल रहा था, पिछले पांच महीने का किराया देना पड़ेगा। मकान खाली करने की धमकी दे रहा था। सुन रहे हो ना। “

रसोई से आ रही पत्नी सुलेखा की आवाज़ रमेश को विचलित कर रही थी । बिस्तर पर बार-बार करवट ले रहा था । चाहकर भी अनसुना नही कर सकता था सुलेखा की बातों को । लगातार बोले जा रही थी ।

” अरे हाँ , बच्चे कह रहे थे कि मोबाइल का नेट पैक भी आज पूरा हो जाएगा। फिर ऑनलाइन क्लास भी बंद हो जाएंगी । बाजार जाते समय रिचार्ज करवा देना। स्कूल की फीस भी जमा करनी है दो दिनों में । “

रमेश को समझ नही आ रहा था कि क्या करे । पूरी रात सो नही पाया था । बुखार और बदन दर्द ने आंखों से नींद गायब कर दी थी। दिनभर के काम-काज से थकी पत्नी की नींद में खलल नही डालना चाहता था इसलिए उसे बताया नही था ।

” अब उठोगे भी या पलंग हीं तोड़ते रहोगे। बस एक हीं काम रह गया है तुम्हारा। खाओ और पड़े रहो । लॉकडाउन क्या हुआ , तुम लोगों के तो मौज हो गई । नौकरानी की तरह सुबह से उठकर काम करती रहती हूँ । पूजा-पाठ , नहाना-खाना भी सही समय पर नही कर पाती हूँ । दिनचर्या हीं बदल कर रख दी है इस कोरोना ने।”

पिछले चार-पाँच महीनों से कोई भी दिन ऐसा ना गया होगा कि सुलेखा ने इन बातों को दोहराया ना हो । रमेश के कान भी आदी हो गए थे सुन-सुनकर । बात भी सही थी । जब से कोरोना महामारी के कारण सम्पूर्ण देश में सरकार द्वारा लॉकडाउन लगा था , सुलेखा की दिनचर्या सच में अस्त-व्यस्त हो गई थी । सुबह उठते ही घर के काम-काज में लग जाती थी और आराम तो सच में हराम हो गया था उसका । स्कूल बंद हो जाने के कारण अब तो सारा समय बच्चे भी घर पर ही थे । दिनभर उनकी फरमाइशें। । रमेश की भी नौकरी छूट गई थी लॉकडाउन में तो ऐसे में समय घर में ही गुजरता था । सुलेखा का काम तो बढ़ हीं गया था । ऐसे में खाने-पीने का कोई निश्चित समय नही था । थकान भी साफ-साफ झलकती थी चेहरे पर । डाइबिटीज़ की दवा भी तो खतम हो गई थी दो महीने पहले । लॉकडाउन से कुछ दिन कुछ दिन पहले हीं अचानक तबियत खराब हो गई तो डॉक्टर के पास गई थी । कुछ जाँच भी लिखी थी डॉक्टर ने। उसी जाँच में डाइबिटीज़ की पुष्टि हुई थी । पहले तो बच्चों के स्कूल और रमेश के नौकरी पर चले जाने के बाद सुलेखा को थोड़ा बहुत आराम करने का समय मिल भी जाता था ।

रमेश ने करवट बदला देखा तो सुलेखा कमरे में झाड़ू लगा रही थी और पता नही साथ हीं धीमे स्वर में कुछ बड़बड़ाती जा रही थी । एक बार तो रमेश के मन में ये बात आई कि सुलेखा से कह दे कि उसे बुखार है।आज उसे ऐसे ही लेटे रहने दे। मग़र अगले हीं पल उसे लगा कि बेवज़ह परेशान हो जाएगी। सुलेखा ने सोने के कंगन निकालकर ड्रेसिंग टेबल पर रख दिए । आभूषण के नाम पर केवल एक जोड़ी कंगन ही रह गए थे सुलेखा के खजाने में । पिछले महीने हीं तो बेटी की कॉलेज फीस भरने के कारण आभूषणों का खज़ाना खाली हो गया था । कितना प्यार था उसे अपने गहनों से मग़र मजबूरी में बेचना पड़ा था ।

” उठो अब ! दस बज रहें हैं । नहा लो । नाश्ता बना कर रख दिया है । बाजार भी जाना है ना तुम्हें । दो दिन से पूजा-पाठ भी ना कर पाई हूँ । कपड़े भी धोने हैं।आज कुछ ज्यादा हीं थकान लग रही है। शायद शुगर लेवल बढ़ गया है। अब उठो भी।”

सुलेखा की बातों पर प्रतिक्रिया देना रमेश के बस में ना था । बुखार से शरीर तप रहा था फिर भी बिना कुछ कहे वह उठा और बरामदे में लगी कुर्सी पर बैठ गया। अचानक से उसे चक्कर सा महसूस हुआ था । शायद प्रेशर के कारण । रमेश ब्लड प्रेशर का मरीज़ था । उसकी भी दवा खत्म हो गई थी दस दिन पहले । सुलेखा उसे रोज़ हीं याद दिलाती रहती थी दवा लाने के लिए मग़र रमेश हर बार टाल जाता था । 

बुखार के कारण शरीर भी साथ नही दे रहा था । रमेश को कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या करे । सुलेखा ने जरूरतों के लिस्ट में इतना कुछ गिना दिया था। जो भी जमा-पूंजी थी निकल गई थी । आज तो फूटी कौड़ी भी नही थी जेब में। पिछले महीने तो कर्ज लिया था वो भी निकल गया घर खर्च के नाम पर । फिर कुछ सोचते हुए रमेश उठा और बाथरूम की तरफ धीरे-धीरे चल पड़ा । कुछ ना कुछ तो चल रहा था उसके दिमाग में ।

नाश्ता खत्म करने के बाद बुखार के लिए दवा ली फिर तैयार होने लगा बाजार निकलने के लिए । कमरे में अकेला हीं था इस वक़्त । ड्रेसिंग टेबल के पास खड़े होकर बाल ठीक करते-करते , उसकी निगाहें वहाँ पड़े सोने के कंगन पर जमी हुई थी । फिर अचानक से झुका और दोनों कंगन उठाकर जेब में रख लिया । रमेश जब भी घर से बाहर जाता था सुलेखा को आवाज़ देकर हीं निकलता था मग़र आज उसने ना सुलेखा को पुकारा ना हीं बच्चों से दरवाज़ा बंद करने को कहा । चुपचाप निकल पड़ा । चेहरे पर बहुत दिनों के बाद चमक झलक रही थी। कंगन उसे हर मर्ज की दवा से लगे। कम से कम एक महीने का घर खर्च तो इससे निकल हीं जाएगा। आगे की आगे सोचेंगे। मध्यम वर्ग से था ना, उसे वर्तमान में जीना था, भविष्य तो उसके लिए सपना भर ही था। जिसे रोज देख रहा था सुबह टूटते हुए।

-सुभाष चंद्र झा ‘अकेला

Last Updated on October 21, 2020 by srijanaustralia

Facebook
Twitter
LinkedIn

More to explorer

fafa

हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक विस्तार: विरासत, विकास और भविष्य का विराट विमर्श

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱 हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक विस्तार: विरासत, विकास और भविष्य का विराट विमर्श डॉ.

123

हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष : भोपाल में जुटेंगे देश-विदेश के मनीषी, समकालीन चुनौतियों और भविष्य पर होगा व्यापक विमर्श

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱 हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष : भोपाल में जुटेंगे देश-विदेश के मनीषी, समकालीन

Leave a Comment

error: Content is protected !!