न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

चाँदनी समर की कहानी – ‘अपना-अपना चाँद’

Spread the love
image_pdfimage_print

उस बड़े से बँगले के बाहर वो रोड लैम्प। जिसके नीचे रोज़ ही झोपड़पट्टी का एक बच्चा आ बैठता है। मगर आज वहाँ एक और बच्चा है। पहले बच्चे ने उसे आश्चर्य से देखा- आह! कितना सुंदर है ये। लगता है किसी दूसरी दुनिया से आया है। उसने सुंदर कपड़े पहन रखे थे। आँखों में सम्पन्नता और चेहरे पर थोड़ा सा क्रोध। झोपड़पट्टी का बच्चा उसे यूँ ही ताकता रहा, कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई। पता नहीं वो उसकी भाषा समझ भी पायेगा या नहीं। सुंदर बालक भी उसे आश्चर्य से देख रहा था। फटे कपड़े, नंगे पांव, आँखों मे दरिद्रता । कुछ देर गौर से उसे देखते हुए पूछा कौन हो तुम??
जी, मैं विकास हूँ। ग़रीब लड़के ने थोड़ा झिझकते हुए कहा
कहाँ रहते हों? सुंदर बालक ने पुनः पूछा
जी, मैं सड़कों पे रहता हूँ। मेरा मतलब है सड़क किनारे झोपड़पट्टी में । तुम कौन हो? कहाँ रहते हो?  ग़रीब लड़के ने भी पूछा
मैं, मैं स्वप्न हूँ। बंगले में रहता हूँ।
अच्छा .. तुम्हें पहले कभी यहाँ नहीं देखा। विकास ने पूछा
मैं यूँही सड़को पर नहीं निकलता। अपने बँगले में ही रहता हूँ। स्वप्न ने उत्तर दिया।
अच्छा तो आज यहाँ कैसे??
बस छुप के भाग आया हूँ। मम्मी खाने के पीछे पड़ी रहती है। भला कितना खाउँ । स्वप्न ने मुँह फुलाते हुए कहा।
अच्छा ! तुम्हें बहुत खाने को मिलता है? विकास चकित होकर पूछा
हाँ, बहुत….
क्या क्या…
ब्रेड, बटर, पिज़्ज़ा, पास्ता, मिल्क, फ्रूट, चिकन, बिरयानी
विकास आश्चर्य से उसका मुँह ताक रहा था। कुछ ना समझ कर उसने सीधे पूछा-रोटी मिलती है क्या?
रोटी? हाँ। मगर मैं रोटी नहीं खाता। मुझे पसंद नहीं।
क्या.. विकास की आँखें आश्चर्य से फटी रह गई।
हाँ। इतना खाना भला कौन खा सकता है… मोटा हो जाऊँगा । मेरे स्कूल में वो बंटी है ना, बहुत मोटा है वो। वैसा नहीं बनना चाहता। सोचता हूँ चाचू के साथ जिम ज्वाइन कर लूँ। कुछ बॉडी बन जाएगी।
स्वप्न अपनी धुन में अपने मन की बात सुनता रहा जबकि विकास का ध्यान तो अब भी रोटी पर थ| सुबह से एक भी जो न मिली थी। कुछ देर बाद जब स्वप्न चुप हुआ तो विकास सन्न था
उसे तो उसकी कोई बात समझ न आई सो वो कुछ न बोला।
फिर दोनोंबच्चे चाँद की ओर देखने लगे ।
मम्मी कहती है मुझे चाँद को पाना है। मुझे भी चाँद बहुत पसंद है। एकदिन मैं चाँद को पा के रहूँगा।। स्वप्न ने प्रसन्नता भरे स्वर में कहा।
विकास भी चाँद को देख रहा था खोये स्वर में बोला
हाँ मुझे भी चाँद चाहिए। पर आधा नहीं पूरा। मां जब तवे पर पकाती है तो कितना सुंदर लगता है ना। फूली- फूली ,गोल-गोल। मगर आधा ही देती है। आधा छुटकी को दे देती है।
कितना सुंदर है ना ये चाँद।
एक दिन मैं ऐस्ट्रोनेट बनूँगा और तब इसे पा लूंगा। स्वप्न ने दृढ़ता भरे स्वर में कहा
हाँ,मुझे भी चाँद चाहिए। फूली फूली गोल गोल। विकास खोए खोए स्वर में बोला ।
दोनों अपने-अपने चाँद को देख रहे थे | सामने के बँगले से चौकीदार निकला
बाबा, आप यहाँ बैठे हैं। मैडम जी आपको कबसे ढूंढ रही हैं। चलिए घर चलिए।
स्वप्न उठा। उसने विकास को अपने साथ चलने को कहा तो वाचमैन ने टोका
नहीं बाबा, ये आपके साथ नहीं चल सकता। आप दोनों के रास्ते अलग हैं।
फिर दोनों अपने-अपने रास्ते निकल गए। स्वप्न बँगले की ओर, और विकास सड़कों की ओर।

-चाँदनी समर

Last Updated on October 21, 2020 by srijanaustralia

Facebook
Twitter
LinkedIn

More to explorer

fafa

हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक विस्तार: विरासत, विकास और भविष्य का विराट विमर्श

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक विस्तार: विरासत, विकास और भविष्य का विराट विमर्श डॉ. शैलेश

123

हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष : भोपाल में जुटेंगे देश-विदेश के मनीषी, समकालीन चुनौतियों और भविष्य पर होगा व्यापक विमर्श

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष : भोपाल में जुटेंगे देश-विदेश के मनीषी, समकालीन चुनौतियों

Leave a Comment

error: Content is protected !!