न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

तथ्यों की यात्रा को सत्य की परिणति तक पहुँचाना ही शोध है : प्रो. हरीश अरोड़ा

harish arora
Spread the love
image_pdfimage_print

तथ्यों की यात्रा को सत्य की परिणति तक पहुँचाना ही शोध है : प्रो. हरीश अरोड़ा

‘तथ्य अनंत हो सकते हैं किंतु वास्तविक तथ्यों की यात्रा को सत्य की परिणति तक पहुँचाना ही शोध का अभीष्ट है।’ ये विचार ‘वाङ्मय विमर्श’ द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला के अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हरीश अरोड़ा ने ‘शोध प्रविधि और प्रक्रिया’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहे। उन्होंने इस विषय पर अपने व्याख्यान में शोध के दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों के मध्य सामंजस्य स्थापित करते हुए कहा कि ‘ज्ञान के पीछे की प्रत्येक दिशा की ओर पुनः लौटकर ज्ञान के विस्तार की संभावनाओं को निरंतर बनाए रखना ही शोध का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।’ उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल तथ्यों का संकलन कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनमें निहित नवाचार को खोजना और उसे समाज के लिए उपयोगी बनाना शोधार्थी का प्राथमिक उत्तरदायित्व है।

‘वाङ्मय विमर्श’ के तत्वावधान में आयोजित व्याख्यानमाला शृंखला की पाँचवीं कड़ी में देश के प्रख्यात विद्वान कवि और लेखक तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हरीश अरोड़ा ने शोधार्थियों को संबोधित किया। ‘शोध प्रविधि और प्रक्रिया’ विषय पर केंद्रित इस आभासी सत्र में शोध की वैज्ञानिकता और उसकी सामाजिक प्रासंगिकता पर गहन विमर्श किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ शुभम शास्त्री द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। इसके पश्चात वाङ्मय विमर्श’ के संरक्षक डॉ. राजकुमार उपाध्याय ‘मणि’ ने अपने स्वागत वक्तव्य में इस अकादमिक प्रकल्प के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह प्रकल्प शोधार्थियों के बौद्धिक संवर्धन हेतु निरंतर क्रियाशील है। डॉ. ‘मणि’ ने मुख्य वक्ता प्रोफेसर अरोड़ा का अभिनंदन करते हुए इस महत्वपूर्ण विषय पर मार्गदर्शन हेतु उन्हें धन्यवाद एवं बधाई दी।

प्रो. अरोड़ा ने अपने व्याख्यान में शोध के विभिन्न प्रतिमानों पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने समकालीन शोध के नवीन आयामों जैसे पारिस्थितिकीय साहित्य एवं पाठालोचन की महत्ता को भी रेखांकित किया। उन्होंने शोध के विभिन्न चरणों की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए एक आदर्श रूपरेखा निर्मित करने के व्यावहारिक सूत्र साझा किए व्याख्यान के उपरांत एक संवादात्मक सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें शोधार्थियों द्वारा पूर्व में ‘गूगल फॉर्म’ के माध्यम से प्रेषित जिज्ञासाओं का प्रो. अरोड़ा ने अत्यंत विद्वतापूर्ण ढंग से समाधान किया। अंत में उन्होंने इस शृंखला के अनवरत संचालन हेतु अपनी शुभकामनाएँ भी प्रदान कीं।

कार्यक्रम का अत्यंत गरिमापूर्ण एवं सुस्पष्ट संचालन साक्षी सिंह द्वारा किया गया। सत्र के समापन पर हंसिका ने मुख्य वक्ता, आयोजक मंडल एवं सहभागी शोधार्थियों के प्रति औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अकादमिक अनुष्ठान को सफल बनाने में संयोजक अविरल अभिलाष, समन्वयक प्रवीण त्रिपाठी, सह-समन्वयक सोमेश पाण्डेय एवं समस्त शोधार्थियों का सक्रिय सहयोग रहा। प्रतिभागियों के उत्साहवर्धन हेतु आयोजकों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए।

Last Updated on March 15, 2026 by srijanaustralia

  • पूनम चतुर्वेदी
  • संस्थापक-निदेशक
  • अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन
  • [email protected]
  • आशियाना, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
Facebook
Twitter
LinkedIn

More to explorer

प्रतीकात्मक छवि

साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिद्वन्द्विता की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार बनाने का उपक्रम है यह सम्मेलन-डॉ विकास दवे

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱 साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिद्वन्द्विता की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार बनाने का उपक्रम

प्रतीकात्मक छवि

मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा साहित्यिक पत्रिकाओं

प्रतीकात्मक छवि

जरूरी और उपयोगी है संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर प्रशिक्षण और संपादकों के बीच आपसी विमर्श – डॉ. शैलेश शुक्ला

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱 जरूरी और उपयोगी है संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर प्रशिक्षण और संपादकों के

Leave a Comment

error: Content is protected !!