न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

हालात क्यों बिगड़े ये न पूछें, ये बताएं कि हमने इसके लिए क्या किया…

Spread the love
image_pdfimage_print

सुशील कुमार ‘नवीन’

कोरोना ने फिलहाल देश के हालात खराब करके रख दिए हैं। समाज का हर वर्ग पटरी पर है। व्यापार-कारोबार सब प्रभावित। अस्पतालों में न वेंटीलेटर मिल पा रहे हैं न ऑक्सीजन। इलाज के लिए बेड मिलना तो दुरास्वप्न सा है। गण और तंत्र भले ही अपना पूरा जोर लगाए हुए हो, पर ‘सिचुएशन अंडर कंट्रोल’ सुनने को अभी कान तरस ही रहे हैं। खतरे को भांपने के बावजूद भयावह बनी इस स्थिति के लिए आखिरकार जिम्मेदार कौन है?

    सबका यही रटा रटाया जवाब मिलेगा। सरकारें नाकाम हैं। प्रशासन की लापरवाही है। प्रबन्धों की कमी है। इतिहास गवाह है। अमूमन हर विकट परिस्थिति के पैदा होने पर यही जवाब सुनने को मिलता आया है। पर क्या इन्हें ही दोषी ठहराते हुए अपने आप से पल्ला झाड़ लेना उचित रहेगा ?

  कोरोना की दूसरी लहर लगातार चरमोंत्कर्ष पर है। रोजाना किसी न किसी परिचित के कोरोना संक्रमण के चलते मृत्युलोक गमन के समाचार मन ही मन महामारी की भयावहता को और बढ़ा रहे हैं। रही सही कसर ये युट्यूबिया चैनल लाइव परफोरमेंस से नहीं छोड़ रहे हैं। जितना कोरोना नहीं डरा रहा उससे ज्यादा ये डराने पर तुले हैं। कोरोना मरीजों के लिए बुरी खबर, शहर के सभी अस्पतालों में नहों है कोई बेड खाली। ऑक्सीजन की कमी पर अस्पतालों ने किए हाथ खड़े। आदि टैगलाइन दिल की धड़कनें और बढ़ा जाती हैं। 

     खैर छोड़िए, ये रोना। अब बात इन हालातों की जिम्मेदारी की। समझदार लोगों का मानना है कि इसके लिए चुनाव और रैलियां सबसे बड़ी जिम्मेदार हैं। भलेमानसों, जब पता है कि सामने शेर मुहं बाए खड़ा है तो पास जाने का खतरा मोल ही क्यों लो। नेताओं की ती रोजीरोटी ही अंधभक्त जनता है। ‘ बुलाने का है, पर जाने का नहीं’ बार-बार सुना और पढ़ा होगा। फिर इन पर दोष क्यों मढ रहे हो। बुलाने का उनका कर्म था, जो उन्होंने किया। खतरा भांप नहीं जाने का, तुम्हारा कर्म था, जिससे तुम पीछे हट गए। जलते अंगारों पर पहलवानी का शौक तुम्हें ही था। झुलसोगे ही।

    और सुनो। एक साल से लगातार ‘कोरोना महामारी है, ध्यान रहे, मास्क हटे नहीं, दो गज की रखे दूरी’ के लिखे सन्देश पढ़े नही तो सुने तो होंगे। चालान काट-काटकर तुम्हे आगाह भी किया, पर क्या तुम माने। वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो..की लय में लगातार लापरवाही की सीढ़ियां तुमने ही चढ़ीं हैं। अब बात ज्यादा बढ़ गई तो जिम्मेदार और हो गए।

 चलो मान लेते हैं कि हम जिम्मेदार नहीं। पर क्या हमनें जिम्मेदारी निभाई। वैक्सीन तक को चुरा रहे हैं। कालाबाजारी करने वाले क्या कोई दूसरे थोड़े ही है, हमारे ही भाई-बन्धु हैं। शर्म की बात है श्मशान तक में रेट लिस्ट चस्पा हो गई है। एम्बुलेंस के लिए मनमाने चार्ज वसूले जा रहे हैं। ऑक्सीजन सिलेंडर हजारों देने के बाद भी बमुश्किल प्राप्त हो पा रहा है। लोकडाउन की संभावना के चलते जरूरत की चीजों की जमाखोरी तक हम शुरू कर चुके हैं। ठेकों के आगे भी लंबी लाइन लगाने वाले कोई और थोड़े ही है। इसके लिए किसे दोषी ठहराओगे। 

सीधी सी बात है कि इस महमारी के फैलाव में गण और तंत्र का बराबर योगदान है। तूफान से पहले की खामोशी को समझ नहीं पाए। मन ही मन इसे विदाई पार्टी दे चुके थे। पर ये फिर लौट आया। फिलहाल समय बहसबाजी छोड़ एकजुटता के साथ इससे लड़ने का है। संयम रखें। हौसला रखें। एक-दूसरे के सहयोगी बनें। हड़बड़ाहट मत करें। नियमों का पालन करें। पहले भी इससे निपटे थे, अब भी निपट लेंगे। 

लेखक: 

सुशील कुमार ‘नवीन’, हिसार (हरियाणा)

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद है।

96717-26237

 

Last Updated on April 27, 2021 by hisarsushil

  • सुशील कुमार 'नवीन'
  • Deputy Editor
  • सृजन ऑस्ट्रेलिया
  • [email protected]
  • hisar
Facebook
Twitter
LinkedIn

More to explorer

fafa

हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक विस्तार: विरासत, विकास और भविष्य का विराट विमर्श

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक विस्तार: विरासत, विकास और भविष्य का विराट विमर्श डॉ. शैलेश

123

हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष : भोपाल में जुटेंगे देश-विदेश के मनीषी, समकालीन चुनौतियों और भविष्य पर होगा व्यापक विमर्श

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष : भोपाल में जुटेंगे देश-विदेश के मनीषी, समकालीन चुनौतियों

Leave a Comment

error: Content is protected !!