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डॉ. शैलेश शुक्ला

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मुझको देखोगे जहां तक, मुझको पाओगे वहां तक, मैं ही मैं हूं, मैं ही मैं हूं दूसरा कोई नहीं…

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सुशील कुमार ‘नवीन’

कोरोना की दूसरी लहर में देश के हालात दिनों-दिन बद से बदतर होते जा रहे हैं। सरकारी दावे और चिकित्सा व्यवस्था की धज्जियां उड़ रही है। हर सुबह किसी न किसी जानकार की विदाई की सूचना मिल रही है।’ कोरोना कोई बीमारी थोड़े ही है’ कहने वाले अपनों के लिए ऑक्सीजन के सिलेंडर, वेंटीलेटर युक्त बेड तलाशते फिर रहे हैं। ‘किसी भी तरह जुगाड़ करा दो’ कहना सामान्य बोलचाल में शामिल हो गया है। कोरोना से रिकवर हुए लोगों को प्लाज्मा डोनेट करने के लिए मान-मनुहार करते देखा जा सकता है। अभी तो शुरुआत बताई गई है, पीक तो आनी बाकी है। ये कोरोना न जाने आगे और क्या-क्या दिखाएगा।

 2020 को विदाई देते हुए इस बार खुशहाली के साल की कामना सभी ने की थी। ये 2021 तो 2020 को भी माफ करते चला जा रहा है। इस बार तो वो देखने को मिल रहा है, जो आंखें कभी नहीं देखना चाहेंगी। एक भाई को डॉक्टरों के आगे गिड़गिड़ाते देख लिया। एक बेटी को तड़पते भाई के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए लोगों से गुहार लगाते देख लिया। फुटपाथों पर दाह संस्कार के लिए इंतजार करती डेड बॉडी के अंबार देख लिए। श्मशान घाट के बाहर रेट कार्ड देख लिए। अपनेपन का दम्भ भरने वाले ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। बुजुर्ग कंधे बेटों के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर ढोहते फिर रहे हैं। इससे भी ज्यादा और क्या देखें। एम्बुलेंस के अभाव में रेहड़ी, ऑटो की छत तक पर शव ले जाए जा रहे हैं।  शव रखे बेड पर ही जीवित महिला को इलाज के लिए इंतजार करते देख लिया। जौनपुर वाले बाबा को लू के थपेड़ों के बीच साइकल पर अपनी जीवन संगनी के शव को ढोहते देख लिया। 

अस्पतालों के बाहर कोविड मरीजों के लिए बाकायदा रेट चार्ट चस्पा कर रखे हैं। जो फाइव स्टार-सेवन स्टार होटलों के चार्ज को भी माफ कर रहे हैं। वो भी सहजता से नहीं मिल रहे, इसके लिए भी सिफारिशों का अहसान लेना पड़ रहा है। दूसरी तरफ जरूरी दवाइयों और उपकरणों की कालाबाजारी हो रही है। रोजाना कोरोना से होने वाली मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। श्मशान घाटों में शवों के दाह संस्कार के लिए जगह कम पड़ने लग गई है। यहां भी वेटिंग लिस्ट बनने लगी है। इससे बुरी विडम्बना और क्या होगी। शवों को भी दाह संस्कार के लिए कतारबद्ध होना पड़ रहा है। घंटों इंतजार करना पड़ रहा है।

कहना गलत नहीं होगा कि हालत बुरी है। दूसरों की मौत का समाचार सुनाने वाले पत्रकार खुद समाचार बन रहे हैं। दिल उदास है, आंखें नम है। हिम्मत जवाब देने लगी है। आंखों से बेबसी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। हर रात के बाद नई सुबह का इंतजार जरूर कर रहे हैं पर वो सुबह आने का नाम ही नहीं ले रही। उधर कोरोना बेफिक्री और मस्ती में गुनगनाते चला जा रहा है- 

मुझको देखोगे जहां तक, मुझको पाओगे वहां तक।

रास्तों से कारवां तक, इस ज़मीं से आसमां तक

मैं ही मैं हूं,मैं ही मैं हूं दूसरा कोई नहीं……|

 

लेखक: 

सुशील कुमार ‘नवीन’, हिसार (हरियाणा)

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद है।

96717-26237

Last Updated on May 1, 2021 by hisarsushil

  • सुशील कुमार 'नवीन'
  • Deputy Editor
  • सृजन ऑस्ट्रेलिया
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