न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

देखा है मैंने …!

Spread the love
image_pdfimage_print

 

देखा है ? मैंने देखा है

लोगों को करीब से बदलते देखा है…!

 

जो लोग बातों – बातों में ही अपना

हाल – ए दिल बयां करते थे..!

 

आज उनके कानों में जूं तक नहीं रेंगती …!

गम – ए हाल कम के नहीं, सबके यही हैं..!

 

ये समय भी तो है, पर ये तो समय है

इसको तो करवट लेते देखा है पर लोगों का क्या..!

 

देखा है? हाँ मैंने देखा है

लोगों को ही करीब से बदलते देखा है..!

 

देखा है मैंने समुद्र की लहर लपटों

को भी देखा है पर कुछ न कुछ लाते देखा है..!

 

ये नजरिया है देखने की वरना इनको

नव आशियां को भी उजाड़ते देखा है..!

 

कभी कुछ तो कभी बहुत कुछ हो तुम

ऐसा कहते देखा है…!

 

बातों – बातों में ही सबकुछ भी कहते देखा है

देखा है? हाँ हुजूर मैंने ..

 

देखा है लोगों को, बड़े करीब

से बदलते देखा है…!

 

देखा है? मैंने देखा है..!

कभी हर मर्ज की दवा हो तुम

 

ऐसा भी कहते देखा है…!

देखा है मैने लोगों को करीब से बदलते देखा है

 

कभी अपना तो कभी अपनापन

सब काम पड़ने पर दिखाते देखा है…!

 

कभी दिल, तो कभी जान हो तुम कहते देखा है

देखा है? हाँ मैंने लोगों को

 

बहुत करीब से बदलते देखा है…!

 

कभी दुःख – दर्द तो कभी आंखों

में आंसू को भी बरसते देखा है…!

 

देखा है मैंने लोगों को ,

करीब से बदलते देखा है..!

 

देखा है? हाँ मैने देखा है

इश्क़ में लोगों को जान भी

 

देते देखा है! पर जिसके लिए जान

दी उसे उफ्फ तल्क नहीं आती …!

 

ऐसा दिल भी देखा है..!

 

पर ऐसा करने वालों को रात की नींद

और दिन का चैन भी छीनते देखा है ..!

 

देखा है? हाँ मैने ही देखा है

लोगों को बड़े करीब से बदलते देखा है..!

 

जब सफल होता है व्यक्ति तो उसका

गुनगान भी करते देखा है…!

 

पर मैंने एक सफल व्यक्ति की पहचान को भी

मिटते देखा है..!

 

अब देखने को क्या ही रह गया है? हाँ

मैं ही वो शख्स हूँ जो यह सब मिटते देखा है!

 

देखा है मैंने लोगों को

बडे़ करीब से बदलते देखा है..!

 

पर इतना सब देखने के बाद ये कहता हूँ

जो बहरूपियें हैं वो बदले अपने आप को..!

 

मैं न तब ही बदला था न अब ही बदला हूँ और

न बदलूंगा

ये बातें बड़े ही ईमान से कहता हूँ ..!

 

 

 

Last Updated on February 14, 2021 by rahulkiran733

  • Rahul
  • Kiran
  • शिक्षित बेरोजगार
  • [email protected]
  • S/o Ramashish sharma at madhurapur 1 po madhurapur 3 ps teghra dist begusarai pin 851113
Facebook
Twitter
LinkedIn

More to explorer

प्रतीकात्मक छवि

साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिद्वन्द्विता की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार बनाने का उपक्रम है यह सम्मेलन-डॉ विकास दवे

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱 साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिद्वन्द्विता की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार बनाने का उपक्रम

प्रतीकात्मक छवि

मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा साहित्यिक पत्रिकाओं

प्रतीकात्मक छवि

जरूरी और उपयोगी है संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर प्रशिक्षण और संपादकों के बीच आपसी विमर्श – डॉ. शैलेश शुक्ला

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱 जरूरी और उपयोगी है संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर प्रशिक्षण और संपादकों के

Leave a Comment

error: Content is protected !!