चलो मिलते हैं
चलो कहीं मिलते हैं, पल दो पल की ज़िन्दगी जीते हैं । कुछ तुम कहो , कुछ हम कहें , ज़माने की अनसुनी करते हैं । हाथों में हाथ लिए […]
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ग़ज़ल,,,,, जीवन के संदर्भ बड़े गंभीर हुए।। हम कमान पर चढ़े हुए बिष तीर हुए।। मृगतृष्णा केभ्रम में उलझे मृग मानव। विधवा की सूनी आंखों का नीर हुए।।
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तुमने ही हृदय बिछाया…. तुम धूप हो, तुम छाँव होपसरी हुई निस्तब्धता मेंजीवंत हुआ-सा ठाँव हो ।घिर-घिरकर जब आया तमतुमने ही दीया जलायाजब-जब हाथों से छूटे हाथ तुमने ही हृदय
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पर्व… अखंड भारत वर्ष को हमारा कोटि- कोटि नमन, जहाँ कई प्रकार के रंग- बिरंगे मौसम आते- जाते हैं| गरमी, सरदी या बरसात, पतझड़ हो या बसंत- बहार, हर मौसम
प्रेम-काव्य प्रतियोगिता हेतु रचना तुमने ही हृदय बिछाया…. तुम धूप हो, तुम छाँव होपसरी हुई निस्तब्धता मेंजीवंत हुआ-सा ठाँव हो ।घिर-घिरकर जब आया तमतुमने ही दीया जलायाजब-जब हाथों से
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उड़ान… सुनो! भारी हो गए हैं तुम्हारे पंख झटक दो इन्हें एक बार उड़ान से पहले इनका हल्का होना बहुत आवश्यक है इन पर अटके हैं कुछ पूर्वाग्रह कुछ कुंठाएँ
महामारी का समय …. यह महामारी का अपना समय हैसमय सबका होता हैसबका ‘नितांत ‘अपनाकभी पूर्ण पाश्विकता काकभी अदेखी मानवता काऔर कभी..दोनों ही में एक ही अनुपात में उलझायहाँ ‘नितांत
होली उसे कहो….! जब रंग रमे रस अंग-अंग भींगेतब होली उसे कहोजब हृदय हरित-हरित हो फिर तब होली उसे कहोजब फागुन वही बयार बहेतब होली उसे कहोजब प्रिय का फिर
लगभग तीन वर्षों के बाद मैं रीवगंज गई थी। रीवगंज से मेरा परिचय हमारे विवाहोपरांत पतिदेव ने ही करवाया था। प्रकृति का समूचा आशीर्वाद मानो इस नन्हे से आँगन में
रफ़ीक ऐसा नहीं था… Read More »
कहानी- डिवाइडररात के अंधकार में रिमझिम बारिश की फुहार पड़ रही थी। एक वृद्धा अपने आप को समेटे डिवाइडर पर विराजमान थी। कहा गया है ,कि, जीवन का आवागमन मोक्ष