न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

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2025.06.06 - यूके में हिंदी-विविध आयाम - श्री तेजेंद्र शर्मा जी से संवाद --.jpg - light
साक्षात्कार
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‘यूके में हिंदी: विविध आयाम’ विषयक वार्ता का भव्य आयोजन 6 जून को

हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह-2025 के अंतर्गत ‘यूके में हिंदी:

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संगोष्ठी
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025 का भव्य शुभारंभ : राजदूत अखिलेश मिश्रा के आशीर्वचनों से होगा भव्य उद्घाटन

अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025 का भव्य शुभारंभ : राजदूत अखिलेश मिश्रा के आशीर्वचनों से होगा भव्य

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संगोष्ठी
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025 : वैश्विक स्तर पर हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का भव्य आयोजन

अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025 : वैश्विक स्तर पर हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का भव्य आयोजन

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पुस्तक समीक्षा
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श्रेष्ठ इक्यावन कविताएँ : हिन्दी कविता का वैश्विक प्रतिबिम्ब – डॉ सम्राट् सुधा

भारत -रत्न , पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर गत वर्ष आयोजित अंतरराष्ट्रीय अटल

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शोध पत्र
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मोहन राकेश के नाटकों में अभिनेयता

मोहन राकेश ने नाटकों में ‘रंगमंच संप्रेषण’ का पूरा ध्यान रखा है। नाट्य लेखन में राकेश ने नए-नए प्रयोग किए है। जैसे- दृश्यबंध, अभिनेयता, ध्वनियोजना, प्रकाश योजना, गीत योजना, रंग-निर्देश के साथ-साथ भाषा के स्तर पर परिवर्तन के कारण नाटक को सजीव रूप मिला है। इसी कारण नाटकों में अभिनेयता अधिक रूप में फली फुली है। राकेश ने उपन्यास, कहानी संग्रह, नाटक, निबंध, एकांकी आदि विधाओं में कलम चलाई है। लेकिन नाट्य साहित्य में जो प्रसिद्धि मिली शायद किसी नाटककारों को मिली होगी। इसमें ‘आषाढ़ का एक दिन’ (1958), ‘लहरों के राजहंस’ (1963) और ‘आधे अधूरे’ (1969) में अभिनेयता को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।

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